ज़मानत बॉन्ड भरने के बाद भी व्यक्ति को जेल में रखा गया: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने गैर-कानूनी हिरासत के लिए दिया ₹25,000 का मुआवज़ा

Update: 2026-07-29 04:18 GMT

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक व्यक्ति को ₹25,000 का मुआवज़ा देने का आदेश दिया। इस व्यक्ति के संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत आज़ादी के अधिकार का उल्लंघन हुआ था, क्योंकि एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट के निर्देशानुसार ज़मानत बॉन्ड भरने के बावजूद उसे न्यायिक हिरासत में रखा गया। कोर्ट ने कहा कि जिस व्यक्ति को केवल शक के आधार पर गिरफ्तार किया गया हो और जिस पर कोई संज्ञेय (cognizable) या गैर-ज़मानती अपराध का आरोप न हो, उसे न्यायिक हिरासत में नहीं भेजा जा सकता और उसे कानून के अनुसार ज़मानत पर रिहा किया जाना चाहिए।

चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रवींद्र कुमार अग्रवाल की डिवीज़न बेंच उस रिट याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें एक व्यक्ति ने अपनी कथित गैर-कानूनी हिरासत के लिए मुआवज़े की मांग की। याचिकाकर्ता के अनुसार, एक शिकायत के बाद उसे पुलिस स्टेशन बुलाया गया, जहां उस पर शिकायतकर्ता के साथ समझौता करने का दबाव डाला गया। इनकार करने पर उसे भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धाराओं 170, 126 और 135(3) के तहत गिरफ्तार कर लिया गया; आरोप था कि उसके व्यवहार से शांति भंग होने की संभावना थी। एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट ने ₹1 लाख का ज़मानत बॉन्ड भरने पर उसे रिहा करने का आदेश दिया। हालांकि याचिकाकर्ता ने ज़रूरी ज़मानत बॉन्ड भर दिया था, लेकिन अधिकारियों ने उसे वेरिफ़िकेशन के लिए भेज दिया, उसे जेल भेज दिया और चार दिन बाद रिहा किया।

याचिकाकर्ता का तर्क था कि ज़मानत आदेश का पालन करने के बावजूद उसे जेल में रखने से अनुच्छेद 21 का उल्लंघन हुआ और वह मुआवज़े का हकदार है। राज्य ने तर्क दिया कि हिरासत न्यायिक आदेश के तहत थी, इसलिए इसे गैर-कानूनी नहीं माना जा सकता।

कोर्ट ने कहा कि BNSS की धारा 35 (जो CrPC की धारा 41 के समान है) के तहत गिरफ्तारी की शक्ति निवारक (Preventive) प्रकृति की है। इसका इस्तेमाल सामान्य तौर पर नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने पाया कि राज्य ऐसा कोई सबूत पेश करने में विफल रहा, जिससे यह साबित हो सके कि याचिकाकर्ता ने कोई संज्ञेय अपराध किया, इसलिए उसकी रिहाई के लिए सुरक्षा (ज़मानत) की मांग करने का कोई औचित्य नहीं था।

कोर्ट ने आगे कहा कि मजिस्ट्रेट किसी व्यक्ति को बिना सोचे-समझे हिरासत में नहीं भेज सकता और उसे खुद को इस बात से संतुष्ट करना होगा कि कोई गैर-ज़मानती अपराध हुआ है और हिरासत में रखना वास्तव में ज़रूरी है। कोर्ट ने ज़ोर दिया कि अनुच्छेद 21 के तहत आज़ादी में अपमान, अनावश्यक गिरफ्तारी और मनमानी हिरासत से आज़ादी भी शामिल है।

कोर्ट ने कहा,

“भारत के संविधान के आर्टिकल 21 के तहत नागरिक के जीवन और आज़ादी की गारंटी में सम्मान के साथ जीने और सम्मान के साथ आज़ादी का अधिकार शामिल है। आज़ादी का मतलब है अपमान और बिना वजह/झूठी/गलत नीयत से की गई गिरफ़्तारी से आज़ादी; अधिकारियों द्वारा अपमानजनक व्यवहार में किसी मामले में पुलिस की ज़्यादतियां भी शामिल हो सकती हैं।”

बेंच ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर ज़ोर दिया कि सिर्फ़ इसलिए गिरफ़्तारी नहीं की जानी चाहिए कि ऐसा करना कानूनी है, बल्कि पुलिस अधिकारियों को पहले यह सोचना चाहिए कि क्या गिरफ़्तारी सच में ज़रूरी है। कोर्ट ने फिर से कहा कि संवैधानिक अदालतों के पास मुआवज़ा देने का अधिकार है, जब सरकारी अधिकारियों की गैर-कानूनी कार्रवाई से मौलिक अधिकारों का उल्लंघन होता है।

यह मानते हुए कि कोर्ट के आदेशानुसार ज़मानत बॉन्ड भरने के बावजूद याचिकाकर्ता को हिरासत में रखना उसके जीवन और व्यक्तिगत आज़ादी के मौलिक अधिकार का उल्लंघन था, हाईकोर्ट ने ₹25,000 का मुआवज़ा देने का आदेश दिया और राज्य सरकार से कहा कि वह यह रकम तीस दिनों के भीतर चुकाए।

Case Title: Ashraf Beg v. State of Chhattisgarh & Ors. [WPCR No. 564 of 2025]

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