ऐसे पुजारी की प्रार्थना कौन भगवान स्वीकार करेगा? पुजारी द्वारा किशोरी का बार-बार रेप किये जाने पर केरल हाईकोर्ट ने जताई नाराजगी

Update: 2021-09-24 05:41 GMT

एक युवा लड़की के यौन उत्पीड़न के आरोपी एक पुजारी द्वारा दायर आपराधिक अपील पर सुनवाई करते हुए, केरल हाईकोर्ट ने गुरुवार को परित्यक्ता महिलाओं, विशेष रूप से असहाय बच्चों की बदनसीबी पर अपनी चिंता व्यक्त की।

"जब कोई पुरुष अपनी पत्नी और बच्चों को छोड़ देता है, तो मंडराते गिद्ध न केवल परित्यक्त महिला, बल्कि असहाय बच्चों को भी अपना शिकार करने के लिए इंतजार करते हैं। इस मामले में, हमारे समक्ष एक 'पुजारी'/'कोमाराम' (मंदिर में दैवज्ञ) है, जिसने परित्यक्त महिला और उसके तीन बच्चों को अपने पास इसलिए रखा था कि वह केवल बड़ी लड़की के साथ बार-बार छेड़छाड़ करना चाहता था और वह भी उसके भाई-बहनों की उपस्थिति में। हमें आश्चर्य है कि कौन भगवान ऐसे पुजारी की पूजा और प्रसाद स्वीकार करेगा या उसे माध्यम बनाएगा? "

यह टिप्पणी एक ऐसे मामले में आई जहां एक मंदिर पुजारी ने एक परित्यक्त महिला और उसके तीन बच्चों को अपने पास इसलिए रख लिया था कि वह बड़ी लड़की का बार-बार शोषण कर सके और वह भी उसके भाई-बहनों की उपस्थिति में।

पृष्ठभूमि:

यह घटना तब सामने आई जब बच्चे लगभग पागल हो चुकी मां के साथ सड़कों पर घूमते हुए पाए गए। चाइल्ड-लाइन कर्मियों ने तुरंत उनकी सूचना निकटतम वनिता प्रकोष्ठ को दी और उन्हें तुरंत ले जाया गया।

पूछताछ करने पर पता चला कि महिला में गंभीर मानसिक बीमारी के लक्षण दिखाई दिए और हिंसक प्रवृत्ति दिखाई दी। इसलिए उसे सबसे छोटे बच्चे के साथ मानसिक स्वास्थ्य केंद्र ले जाया गया।

यह तब हुआ जब बड़ी लड़की ने खुलासा किया कि अपीलकर्ता-आरोपी ने एक साल तक उसका यौन शोषण किया था। उसे तुरंत पुलिस के पास ले जाया गया और अपीलकर्ता के खिलाफ अपराध दर्ज किया गया।

अपने बयान में पीड़िता ने ग्राफिक विवरण के जरिये आरोपी के दरवाजे पर दस्तक देने, अंदर प्रवेश करने, उसके मुंह में कपड़े ठूसने, उसके कपड़े फाड़ने और उसके साथ बलात्कार करने तथा दो छोटे भाई-बहन डर के मारे कमरे के कोने में छिपने जैसे उदाहरणों के साथ बार-बार किए गए कुकृत्यों के बारे में बताया।

उसने यह भी बताया कि हालांकि उसने अपनी मां से इसकी शिकायत की थी, लेकिन उसे ये जुल्म बर्दाश्त करने के लिए कहा गया, क्योंकि आरोपी हमेशा नशे में घर आता था।

स्कूल जाने वाली बच्ची ने यह भी खुलासा किया कि आरोपी ने उसे धमकी दी थी कि अगर उसने अपने बारे में कुछ बताया तो वह उसे जान से मार देगा।

अपराध का गवाह रहे उसके छोटे भाई ने भी पीड़िता द्वारा उपलब्ध कराए गए सबूतों के अनुसार ही बात की।

उठाई गई आपत्तियां:

अपीलकर्ता के अधिवक्ता केएम फिरोज ने आरोप के माध्यम से अदालत को यह इंगित करने का प्रयास किया कि आरोपों का एक गलत संयोजन किया गया है।

वकील ने दलील दी कि POCSO अधिनियम 14.11.2012 से लागू किया गया था और जिस घटना पर पहला आरोप लगाया गया है वह POCSO अधिनियम से पहले की थी और इसलिए Cr.P.C के तहत एक प्रतिबद्ध कार्यवाही की आवश्यकता है।

अपीलकर्ता ने प्रस्तुत किया कि उसी के कारण उसे बहुत पूर्वाग्रह का शिकार होना पड़ा।

इसके अलावा, POCSO अधिनियम के तहत अभियोजन पक्ष द्वारा पीड़िता की उम्र साबित नहीं की गई थी।

मुख्य निष्कर्ष:

कोर्ट ने पाया कि कथित अपराध के खिलाफ प्रतिबद्ध कार्यवाही की अनुपस्थिति के आधार को कायम नहीं रखा जा सकता है।

इसने कहा,

"जब एक ही कृत्य से उत्पन्न होने वाले अपराधों का एक साथ विचारण किया जाता है और पीड़िता की उम्र साबित नहीं होती है, तो ऐसा नहीं है कि आरोपी के खिलाफ आरोपित आईपीसी के तहत अपराध इसलिए धराशाई हो जाएगा क्योंकि सीआरपीसी के तहत कोई प्रतिबद्ध कार्यवाही नहीं हुई है।"

कोर्ट ने आगे कहा,

"पॉक्सो अधिनियम के तहत एक आरोप का संज्ञान लेते समय, नामित विशेष न्यायालय को उसी मुकदमे में आरोपित किसी भी अपराध की सुनवाई करने का अधिकार है। अन्यथा, पॉक्सो अधिनियम के तहत प्रत्येक मुकदमे को प्रतिबद्ध कार्यवाही समाप्त होने तक इंतजार करना होगा और वह अधिनियम के मूल उद्देश्य को विफल करने के समाना होगा, जो मामलों के त्वरित निपटान की परिकल्पना करता है। यह स्थिति भी नहीं हो सकती है कि उम्र साबित नहीं होने के कारण, आईपीसी की धारा 376 के तहत अपराध सिर्फ इसलिए विफल हो जाएगा, क्योंकि सीआरपीसी के तहत कोई प्रतिबद्ध कार्यवाही नहीं की गई है। POCSO अधिनियम ऐसे अन्य अपराधों को बिना किसी प्रतिबद्ध कार्यवाही के मुकदमा चलाने में सक्षम बनाता है यदि इसे उसी मुकदमे में सुनवाई की जानी है। पूर्वाग्रह का आधार इस कारण से भी विफल हो जाता है कि यह केवल काल्पनिक है। हम उपरोक्त तर्क के आधार पर इसे शुरू में ही अस्वीकार करते हैं।"

पीठ ने यह भी कहा कि आरोप स्पष्ट है और उस अभियुक्त द्वारा पीड़िता के साथ लगातार यौन संबंध बनाये जाने का आरोप है, जो उसके अभिभावक की स्थिति में था।

"आरोप में अनियमितता के कारण मात्र से ही अभियुक्त के प्रति तब तक पूर्वाग्रह नहीं होता जब तक कि वह इस बात से अवगत था कि बचाव के लिए क्या अपेक्षित था।"

इसके अतिरिक्त, कोर्ट ने कहा कि चिकित्सा साक्ष्य स्पष्ट रूप से इस बात का सबूत देते हैं कि पीड़िता के साथ यौन संबंध बनाए गए थे।

इसके अलावा, यह पाया गया कि आरोपी ने धारा 313 के तहत मां और बच्चों के साथ संयुक्त आवास से भी पूरी तरह इनकार कर दिया था। हालांकि, मकान मालिकों के बयान ने विशेष रूप से इस तथ्य को स्थापित किया।

"धारा 313 के तहत आरोपी द्वारा जानबूझकर कहा गया यह झूठ उसकी मिलीभगत की ओर इशारा करता है और दोषी मन को प्रकट करता है। आरोपी ने कहा कि वह पीड़िता की मां को नहीं जानता है, जबकि इस बात के पर्याप्त सबूत हैं कि आरोपी अपने बच्चों के साथ-साथ पीड़िता, उसके भाई-बहन और उसकी मां के साथ एक परिवार के रूप में रहता है।"

कोर्ट ने इसे आरोपी के खिलाफ एक अतिरिक्त परिस्थिति माना।

पीठ ने अपने आदेश में पीड़िता की मां के साथ भी सहानुभूति जताई है।

"माँ की मानसिक स्थिति, समाज के लिए शर्म की बात है, क्योंकि तीन बच्चों और भोजन या आश्रय का कोई साधन नहीं होने और परित्यक्ता होने का तनाव काफी समझ में आता है, जिसके लिए अकेले उस बच्ची को शारीरिक, मानसिक और यौन प्रताड़ना का शिकार होना पड़ा। कोई भी मां उक्त परिस्थितियों में मानसिक तौर पर ठीक नहीं रह सकती।"

अंत में, कोर्ट ने POCSO अधिनियम और आईपीसी की धारा 376(2) के तहत अपीलकर्ता की दोषसिद्धि को खारिज करते हुए अपीलकर्ता को आंशिक राहत प्रदान करते हुए अपील की अनुमति दी, क्योंकि पीड़िता की उम्र साबित नहीं हुई थी।

हालाँकि, चूंकि बलात्कार का अपराध साबित हो गया था, ऐसे में आरोपी को धारा 376 (1) के तहत दोषी ठहराया गया।

आरोपी के पीड़िता के साथ विशेष संबंध और अभिभावक की स्थिति को देखते हुए, कोर्ट ने अपीलकर्ता को अधिकतम आजीवन कारावास की सजा सुनाई।

ऐसे पुजारी की प्रार्थना कौन भगवान स्वीकार करेगा? पुजारी द्वारा किशोरी का बार-बार रेप किये जाने पर केरल हाईकोर्ट ने जताई नाराजगी

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