तत्काल टिकटों का 'मायाजाल': करोड़ों यात्रियों की जेब खाली, रेलवे की चांदी!
भारतीय रेलवे में सफर करने वाले आम आदमी के लिए तत्काल टिकट एक 'जरूरत' भी है और एक 'जुए' जैसा भी। हाल ही में आरटीआई (RTI) से प्राप्त चौंकाने वाले आंकड़ों ने यह साफ किया कि तत्काल बुकिंग के नाम पर यात्रियों को कितनी बड़ी आर्थिक चोट लग रही है। पिछले 5 वर्षों में तत्काल टिकटों की बुकिंग में 1000% से अधिक की वृद्धि हुई है, लेकिन साथ ही रिफंड न मिलने के कारण करोड़ों रुपये रेलवे के खजाने में जा रहे हैं।
यह महत्वपूर्ण जानकारी एडवोकेट सचिन तिवारी द्वारा दायर की गई RTI के माध्यम से सामने आई। एडवोकेट तिवारी द्वारा मांगी गई जानकारी के जवाब में IRCTC ने स्वीकार किया कि रेलवे के पास इस बात का कोई रिकॉर्ड नहीं है कि 'नो-रिफंड' नीति के कारण आम जनता पर कितना वित्तीय बोझ पड़ रहा है। साथ ही पिछले 10 वर्षों में इस कठोर नियम को बदलने के लिए किसी भी प्रस्ताव पर विचार नहीं किया गया।
बुकिंग में भारी उछाल, लेकिन यात्री परेशान
आंकड़ों के अनुसार, वित्त वर्ष 2020-21 में जहां केवल 78.89 लाख तत्काल टिकट बुक हुए, वहीं 2024-25 तक यह संख्या बढ़कर 9.23 करोड़ हो गई। यह वृद्धि दर्शाती है कि ट्रेनों में नियमित सीटों की भारी कमी है, जिसके कारण यात्री मजबूरन तत्काल कोटे का सहारा ले रहे हैं।
रिफंड का 'शून्य' नियम: करोड़ों रुपये स्वाहा
सबसे बड़ा विवाद तत्काल टिकट के रिफंड नियमों को लेकर है। रेलवे के कमर्शियल सर्कुलर (नंबर 59/2011) के मुताबिक, अगर आपका तत्काल टिकट कन्फर्म है और आप उसे कैंसिल करते हैं, तो आपको एक भी पैसा वापस नहीं मिलता।
आंकड़े बताते हैं कि साल 2024 में ही लगभग 71.89 लाख टिकट (तत्काल और प्रीमियम तत्काल मिलाकर) आंशिक रूप से कैंसिल (Partially Cancelled) किए गए। चूंकि इन पर कोई रिफंड नहीं मिलता, इसलिए अनुमान लगाया जा रहा है। चूंकि इन पर कोई रिफंड नहीं मिलता, इसलिए अनुमान लगाया जा रहा है कि रेलवे हर साल सैकड़ों करोड़ रुपये केवल उन टिकटों से कमा रहा है, जिन पर यात्रियों ने सफर ही नहीं किया।
आंकड़ों की जुबानी: 5 साल का सफर
| वर्ष (FY) | कुल तत्काल बुकिंग | आंशिक कैंसिलेशन (तत्काल) |
| 2020-21 | 78.89 लाख | 6.72 लाख |
| 2021-22 | 4.04 करोड़ | 26.63 लाख |
| 2022-23 | 7.63 करोड़ | 56.66 लाख |
| 2023-24 | 8.37 करोड़ | 70.54 लाख |
| 2024-25 | 9.23 करोड़ | 71.24 लाख |
सिस्टम की विफलता और शिकायतों का अंबार
सिर्फ रिफंड ही नहीं, बुकिंग के दौरान होने वाली तकनीकी दिक्कतों ने भी यात्रियों का जीना दूभर कर रखा है। आरटीआई के जवाब में बताया गया कि तत्काल बुकिंग के समय वेबसाइट क्रैश होने और बुकिंग फेल होने की शिकायतें 2020 की तुलना में तीन गुना बढ़ गई हैं।
अधिकारियों का पल्ला झाड़ना
हैरानी की बात यह है कि IRCTC ने आरटीआई में स्पष्ट किया है कि रेलवे बोर्ड के पास इस बात का कोई रिकॉर्ड नहीं है कि 'नो-रिफंड पॉलिसी' के कारण जनता पर कितना वित्तीय बोझ पड़ रहा है। IRCTC का कहना है कि वे केवल एक 'सर्विस फैसिलिटेटर' हैं और रिफंड की नीतियां बनाना पूरी तरह से रेल मंत्रालय और रेलवे बोर्ड का काम है।
निष्कर्ष: एक तरफ रेलवे आधुनिकता और वंदे भारत जैसी ट्रेनों की बात कर रहा है, वहीं दूसरी ओर तत्काल के नाम पर यात्रियों से वसूला जा रहा पैसा और सख्त रिफंड नियम एक बड़े नीतिगत सुधार की मांग कर रहे हैं। क्या रेलवे कभी आम यात्रियों की इस 'वित्तीय प्रताड़ना' पर विचार करेगा?
लेखक- एडवोकेट सचिन तिवारी, लाइवलॉ हिंदी के लिए।