क्या बहू के खिलाफ ससुराल वालों द्वारा दायर किए गए कब्जे के मुकदमे की की सुनवाई फैमिली कोर्ट द्वारा ही की जाएगी? दिल्ली हाईकोर्ट की बड़ी बेंच करेगी फैसला

Update: 2023-06-06 11:23 GMT

Delhi High Court

क्या किसी वाद संपत्ति, जिसके एक मात्र माल‌िक ससुराल के लोग हैं, के लिए उन्हीं की ओर से बहू के खिलाफ दायर किए गए कब्जे या निषेधाज्ञा के वाद को फैमिली कोर्ट एक्ट, 1984 के तहत स्‍थापित फैमिली कोर्ट में ही चलाया जाना चाहिए? दिल्ली हाईकोर्ट ने इस मुद्दे को विचार के ‌लिए बड़ी बेंच को संदर्भित किया है।

जस्टिस नवीन चावला की एकल पीठ ने वादी की ओर से अपनी बहू के खिलाफ स्थायी निषेधाज्ञा के लिए दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए बड़ी पीठ का संदर्भ दिया, जिसमें वादी को सूट की संपत्ति पर जाने या प्रवेश करने से रोकने की मांग की गई थी।

अदालत ने पाया कि फैमिली कोर्ट एक्ट की धारा 7 (1), जो फैमिली कोर्ट के अधिकार क्षेत्र से संबंधित है, स्पष्टीकरण (डी) में प्रदान करती है कि "वैवाहिक संबंध से उत्पन्न होने वाली परिस्थितियों में एक आदेश या निषेधाज्ञा के लिए एक मुकदमा या कार्यवाही ” फैमिली कोर्ट के अधिकार क्षेत्र में आएगा।

यह नोट किया गया कि एक ओर अवनीत कौर बनाम साधु सिंह और अन्य, 2022/डीएचसी/2453 में और दूसरी ओर, मनिता खुराना बनाम इंद्र खुराना, 2010 एससीसी ऑनलाइन डेल 225, और मीना कपूर बनाम आयुषी रावल और अन्य, 2020 एससीसी ऑनलाइन डेल 2481 में अधिनियम की धारा 7(1) के स्पष्टीकरण (डी) की व्याख्या के बीच एक स्पष्ट विरोध है।

पीठ ने कहा कि हाईकोर्ट और जिला न्यायालयों के समक्ष कई मुकदमे लंबित हैं, जिनमें क्षेत्राधिकार के समान प्रश्न शामिल होंगे और इसलिए, यह न्याय के हित में होगा कि इस मुद्दे को एक बड़ी पीठ द्वारा आधिकारिक रूप से तय किया जाए।

वादी का मामला था कि वह वाद संपत्ति की मालिक है और उसका बेटा, प्रतिवादी संख्या 2 संपत्ति पर उसके साथ रह रहा था। उसने कहा कि उसकी बहू समझौता ज्ञापन (एमओयू) का पालन करने में विफल रही, जिसके तहत बहू को वाद संपत्ति को खाली करने और वादी के स्वामित्व की दूसरी संपत्ति में स्थानांतरित होने को सहमत हुई थी।

वादी ने कहा कि बहू उसकी मर्जी के खिलाफ वाद संपत्ति का दौरा कर रही है और वहां तब तब बैठने की धमकी दे रही है, जब तक उसकी "अवैध मांगों" को पूरा नहीं किया जाता है।

प्रतिवादी बहू ने हाईकोर्ट के समक्ष वाद के सुनवाई योग्य होने को चुनौती दी ‌थी, उसने वाद की अस्वीकृति की मांग करते हुए नागरिक प्रक्रिया संहिता, 1908 (सीपीसी) के आदेश VII नियम 11 के तहत एक आवेदन दायर किया था।

उसने कहा कि वाद ने 'वैवाहिक संबंध से उत्पन्न परिस्थितियों में' एक निषेधाज्ञा की मांग की, यह फैमिली कोर्ट एक्ट की धारा 7 (1) के स्पष्टीकरण (डी) के संदर्भ में फैमिली कोर्ट में निर्णय का विषय है।

वादी ने तर्क दिया कि दावा वाद संपत्ति के अनन्य स्वामित्व पर आधारित है, केवल इसलिए कि कार्रवाई के कारण के लिए जिम्‍मेदार कुछ तथ्य प्रतिवादियों के वैवाहिक संबंध को संदर्भित करते हैं, यह सास द्वारा दायर मुकदमे को 'वैवाहिक संबंध से उत्पन्न परिस्थितियों में' केवल फैमिली कोर्ट द्वारा अधिनिर्णित किए जानी वाली निषेधाज्ञा नहीं बनाते।

अदालत ने बड़ी बेंच द्वारा निर्धारण के लिए निम्नलिखित मुद्दे तैयार किए-

"क्या प्रतिवादी के ससुराल वालों या उनमें से किसी एक ने खुद को या उनमें से किसी एक को उस संपत्ति का अनन्य स्वामी होने का दावा किया है, जिसके कब्जे की मांग की गई है, कब्जे / निषेधाज्ञा के लिए एक मुकदमा दायर किया है या जिसके संबंध में प्रतिवादी/बहू से या उसके खिलाफ निषेधाज्ञा की प्रार्थना की जाती है, विशेष रूप से परिवार न्यायालय अधिनियम के तहत स्थापित परिवार न्यायालय द्वारा विचार किया जाना है, और सिविल कोर्ट का अधिकार क्षेत्र वर्जित है।"

अदालत ने अदालत ने आगे इस मुद्दे को तैयार किया है कि क्या प्रतिवादी के पति/वादी के बेटे का पक्षकार बनना या न बनना सिविल कोर्ट के समक्ष इस तरह के मुकदमे के सुनवाई योग्य होने पर कोई प्रभाव रखता है?

केस टाइटल: जीए बनाम टीए और अन्य

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