BREAKING| NCERT मामले में 3 शिक्षाविदों को ब्लैकलिस्ट करने वाला आदेश वापस, सुप्रीम कोर्ट ने हटाईं प्रतिकूल टिप्पणियां

Update: 2026-05-22 07:52 GMT

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को अपना पिछला आदेश वापस ले लिया। इस आदेश में उन तीन शिक्षाविदों को ब्लैकलिस्ट कर दिया गया, जो न्यायपालिका में भ्रष्टाचार पर आधारित NCERT की कक्षा 8 के विवादित चैप्टर को तैयार करने में शामिल थे। उन्हें केंद्रीय या राज्य विश्वविद्यालयों और सार्वजनिक शिक्षण संस्थानों के शैक्षणिक प्रोजेक्ट्स से बाहर कर दिया गया।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि केंद्र और राज्य सरकारें इन शिक्षाविदों को शैक्षणिक प्रोजेक्ट्स में शामिल करने के संबंध में स्वतंत्र निर्णय ले सकती हैं।

कोर्ट ने 11 मार्च के अपने आदेश में की गई उस प्रतिकूल टिप्पणी को भी हटा दिया, जिसमें कहा गया कि तीनों शिक्षाविदों ने "जानबूझकर और जानते-बूझते हुए तथ्यों को गलत तरीके से पेश किया, ताकि कक्षा 8 के छात्रों के सामने भारतीय न्यायपालिका की एक नकारात्मक छवि प्रस्तुत की जा सके।"

चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस विपुल पंचोली की पीठ ने शिक्षाविदों प्रोफेसर मिशेल डैनिनो, सुवर्णा दिवाकर और आलोक प्रसन्ना कुमार द्वारा आदेश को वापस लेने की मांग करते हुए दायर आवेदनों पर विचार करने के बाद यह आदेश पारित किया। पीठ ने शिक्षाविदों द्वारा दी गई इस सफाई पर संतोष व्यक्त किया कि चैप्टर तैयार करने में कोई दुर्भावना नहीं थी। इसे एक सामूहिक निर्णय के बाद अंतिम रूप दिया गया था।

मिशेल डैनिनो की ओर से सीनियर एडवोकेट श्याम दीवान ने दलील दी कि 11 मार्च का आदेश उन्हें सुने बिना ही पारित कर दिया गया था। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह "व्यक्तिगत लेखन" का मामला नहीं था, बल्कि एक सामूहिक निर्णय था। उन्होंने कोर्ट के प्रतिकूल आदेश को निलंबित करने का अनुरोध करते हुए कहा कि इसके "दूरगामी परिणाम" हो सकते हैं।

आलोक प्रसन्ना कुमार की ओर से सीनियर एडवोकेट गोपाल शंकरनारायणन ने दलील दी कि न्यायपालिका पर आधारित कक्षा 8 का चैप्टर, कक्षा 6 और 7 के चैप्टर्स का ही एक विस्तार था। उन्होंने कहा कि कक्षा 8 की किताब में प्रशासन के अन्य क्षेत्रों को प्रभावित करने वाले मुद्दों पर भी चर्चा की गई। शंकरनारायणन ने कहा कि जब मीडिया में न्यायपालिका को प्रभावित करने वाले मुद्दों पर खुली चर्चा होती है, तो इसे छात्रों से छिपाया नहीं जा सकता। छात्रों को इस व्यवस्था की यथार्थवादी समझ के साथ बड़ा होना चाहिए, जिसमें इसकी "कमियां और खूबियां - दोनों" शामिल हों।

यह जोर देते हुए कि इसमें कोई दुर्भावनापूर्ण इरादा नहीं था, शंकरनारायणन ने कहा कि समाधान तभी निकलेंगे जब हम स्कूलों और विश्वविद्यालयों में मुद्दों पर खुलकर चर्चा करेंगे। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या शिक्षण संस्थानों को छात्रों के सामने "दोषमुक्त" (white-washed) करके ही पेश किया जाना चाहिए।

जस्टिस बागची ने कहा कि मुख्य मुद्दा यह था कि भ्रष्टाचार को केवल न्यायपालिका तक ही सीमित एक समस्या के रूप में प्रस्तुत किया गया।

जस्टिस बागची ने कहा,

"हमें यह देखना होगा कि क्या यह [प्रस्तुत जानकारी] संतुलित है। दूसरी ओर, भ्रष्टाचार को एक खास विशेषता के तौर पर उभारा गया। कानूनी सेवाओं तक पहुंच के बारे में एक भी शब्द नहीं है। कानूनी सेवाओं में जजों की भूमिका के बारे में भी कुछ नहीं कहा गया।"

शंकरनारायणन ने आगे कहा कि इसमें कुछ और हिस्से भी थे, जिनमें न्यायपालिका के योगदान पर चर्चा की गई।

सुपर्णा दिवाकर की ओर से पेश हुए सीनियर एडवोकेट जे. साई दीपक ने दलील दी कि उनके मुवक्किल की भूमिका बहुत सीमित थी। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश से उनके आजीविका के अधिकार पर असर पड़ेगा।

Tags:    

Similar News