केंद्र सरकार के अनुरोध पर जज का तबादला न्यायपालिका की स्वतंत्रता में हस्तक्षेप: सुप्रीम कोर्ट जज जस्टिस उज्जल भुइयां

Update: 2026-01-24 10:49 GMT

सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस उज्जल भुइयां ने हाल ही में कॉलेजियम के उस निर्णय पर सवाल उठाया, जिसमें केंद्र सरकार के अनुरोध पर एक उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के स्थानांतरण प्रस्ताव में संशोधन किया गया था।

उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि जजों के तबादले और नियुक्तियों के मामलों में कार्यपालिका की कोई भूमिका नहीं हो सकती और इस तरह का हस्तक्षेप न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर सीधा आघात है।

पुणे स्थित आईएलएस लॉ कॉलेज में “संवैधानिक नैतिकता और लोकतांत्रिक शासन” विषय पर आयोजित प्रिंसिपल जी.वी. पंडित मेमोरियल लेक्चर के दौरान जस्टिस भुइयां ने कहा कि कॉलेजियम द्वारा यह दर्ज किया जाना कि किसी न्यायाधीश का स्थानांतरण केंद्र सरकार के अनुरोध पर किया गया, “एक ऐसे संवैधानिक रूप से स्वतंत्र माने जाने वाले तंत्र में कार्यपालिका के स्पष्ट दखल को उजागर करता है, जिसे राजनीतिक प्रभाव से मुक्त रखने के लिए ही बनाया गया था।”

उन्होंने अक्टूबर 2023 की उस घटना का संदर्भ दिया, जब सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के जस्टिस अतुल श्रीधरन को छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट भेजने के अपने मूल प्रस्ताव में संशोधन करते हुए उन्हें इलाहाबाद हाईकोर्ट स्थानांतरित करने की सिफारिश की थी।

यह निर्णय इसलिए भी विवादों में आया क्योंकि कॉलेजियम के बयान में स्वयं यह दर्ज था कि यह संशोधन “सरकार द्वारा पुनर्विचार के अनुरोध” पर किया गया।

जस्टिस भुइयां ने बताया कि यदि जस्टिस श्रीधरन को छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट भेजा जाता, तो वे वहां कॉलेजियम के सदस्य बनते, जबकि इलाहाबाद हाईकोर्ट में उनकी वरिष्ठता काफी नीचे चली जाती। यह निर्णय इसलिए भी संदेह के घेरे में आया क्योंकि न्यायमूर्ति श्रीधरन को एक स्वतंत्र और निडर न्यायाधीश के रूप में जाना जाता है, जिसका उदाहरण वह सुओ मोटो मामला है, जो उन्होंने एक सांसद-मंत्री द्वारा कर्नल सोफिया कुरैशी पर की गई टिप्पणी के खिलाफ शुरू किया था। हालांकि, जस्टिस भुइयां ने अपने भाषण में न्यायमूर्ति श्रीधरन का नाम सीधे तौर पर नहीं लिया।

उन्होंने सवाल उठाया,

“क्या किसी न्यायाधीश को सिर्फ इसलिए एक हाईकोर्ट से दूसरे हाईकोर्ट में स्थानांतरित किया जाना चाहिए क्योंकि उसने सरकार के खिलाफ कुछ 'असुविधाजनक' आदेश पारित किए? क्या इससे न्यायपालिका की स्वतंत्रता प्रभावित नहीं होती?”

जस्टिस भुइयां ने जोर देकर कहा कि न्यायाधीशों का स्थानांतरण केवल “न्याय के बेहतर प्रशासन” के उद्देश्य से होना चाहिए, न कि सरकार को अप्रसन्न करने वाले फैसलों के लिए किसी न्यायाधीश को दंडित करने के साधन के रूप में।

उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा,

“अपने स्वभाव से ही केंद्र सरकार का उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों के तबादले और पोस्टिंग में कोई अधिकार नहीं हो सकता। यह पूरी तरह से न्यायपालिका का विशेषाधिकार है।”

उनका कहना था कि कॉलेजियम के प्रस्ताव में यह दर्ज होना कि केंद्र सरकार के अनुरोध पर किसी न्यायाधीश का स्थानांतरण बदला गया, कार्यपालिका के प्रभाव की स्पष्ट स्वीकारोक्ति है और यह कॉलेजियम प्रणाली की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल खड़े करता है।

जस्टिस भुइयां ने याद दिलाया कि कॉलेजियम प्रणाली को सुप्रीम कोर्ट ने न्यायपालिका की स्वतंत्रता की रक्षा के लिए विकसित किया था। यदि कॉलेजियम के सदस्य स्वयं कार्यपालिका के प्रभाव में आने लगें, तो यह इस प्रणाली के मूल उद्देश्य से विचलन होगा।

उन्होंने कहा,

“जब न्यायपालिका ने सरकार के कॉलेजियम प्रणाली को बदलने के प्रयास को अस्वीकार कर दिया है, तब यह और भी ज़रूरी हो जाता है कि कॉलेजियम पूरी तरह स्वतंत्र रूप से कार्य करे। कॉलेजियम प्रक्रिया की अखंडता को हर हाल में बनाए रखना होगा।”

उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि आज न्यायपालिका की स्वतंत्रता के लिए सबसे बड़ा खतरा “अंदर से” आ सकता है।

उन्होंने कहा,

“लोकतंत्र के लिए वह दिन बेहद दुर्भाग्यपूर्ण होगा, जब किसी मामले का फैसला सिर्फ यह जानकर अनुमानित हो जाए कि वह किस न्यायाधीश या पीठ के सामने है।”

न्यायपालिका की स्वतंत्रता को “अपरक्राम्य” बताते हुए जस्टिस भुइयां ने अपने संबोधन का समापन करते हुए कहा कि संविधान और लोकतंत्र की रक्षा की अंतिम जिम्मेदारी स्वयं न्यायाधीशों पर है।

उन्होंने कहा,

“यदि संविधान के साथ छेड़छाड़ होती है, तो संवैधानिक नैतिकता का उल्लंघन होता है। जैसा कि कैरोलिन कैनेडी ने कहा है, लोकतंत्र और विधि के शासन की रक्षा के लिए एक स्वतंत्र न्यायपालिका अनिवार्य है। इसके लिए ऐसे न्यायाधीशों की आवश्यकता है, जो समय की राजनीतिक हवाओं के सामने डटकर खड़े रह सकें।”

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