धारा 100 सीपीसी | "कानून का महत्वपूर्ण प्रश्न" वह है, जो पार्टियों के बीच मामले में निर्णय को प्रभावित करता है: गुवाहाटी हाईकोर्ट ने दूसरी अपील का दायरा समझाया

Update: 2022-05-18 06:46 GMT

Gauhati High Court

गुवाहाटी हाईकोर्ट ने हाल ही में माना कि दूसरी अपील उन मामलों में होगी, जिनमें कानून का महत्वपूर्ण प्रश्न शामिल हो।

कोर्ट ने समझाया कि 'कानून के प्रश्न' से पहले 'महत्वपूर्ण' शब्द मामले में शामिल हितों को संदर्भित नहीं करता, न ही सामान्य महत्व के कानून के प्रश्नों को संदर्भित करने करता, बल्‍कि पार्टियों के बीच मामले में निर्णय पर कानून के प्रश्न के प्रभाव या परिणाम को संदर्भित करता है।

जस्टिस देवाशीष बरुआ ने कहा,

''कानून का महत्वपूर्ण प्रश्न'' का अर्थ न केवल सामान्य महत्व का 'कानून का महत्वपूर्ण प्रश्न' है, बल्कि पार्टियों के बीच मामले से पैदा कानून का महत्वपूर्ण प्रश्न भी है। सीपीसी की धारा 100 के संदर्भ में, कानून का कोई भी प्रश्न, जो किसी मामले में अंतिम निर्णय को प्रभावित करता है, पार्टियों के बीच 'कानून का महत्वपूर्ण प्रश्न' है। कानून का एक प्रश्न जो संयोग से या संपार्श्विक रूप से पैदा होता है, जिसका अंतिम परिणाम पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है, वह कानून का महत्वपूर्ण प्रश्न नहीं होगा।"

मौजूदा मामले में अतिरिक्त जिला जज के फैसले के खिलाफ सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 की धारा 100 के तहत एक अपील दायर की गई थी। अतिरिक्त जिला जज ने अपीलकर्ता के मुकदमे को खारिज कर दिया था।

यह माना गया कि जहां सुप्रीम कोर्ट या इस न्यायालय ने भी 'कानून के प्रश्न' पर स्पष्ट और निश्चित घोषणा दी हुई है, यह नहीं कहा जा सकता है कि मामले में 'कानून का महत्वपूर्ण प्रश्न' शामिल है। ऐसा कहा जाता है कि कानून का एक महत्वपूर्ण सवाल तब उठता है, जब कानून का एक सवाल, जो अंततः तय नहीं हो पाया है, मामले में विचार के लिए उठता है।

फिर भी, इस कथन को सही परिप्रेक्ष्य में समझना होगा, जिसका अर्थ यह है कि जहां कानून की स्पष्ट घोषणा है और निचली अदालत ने कानून की ऐसी स्पष्ट घोषणा का पालन किया है या सख्ती से लागू किया है; जाहिर है, मामले को कानून के एक महत्वपूर्ण प्रश्न को जन्म देने के रूप में नहीं माना जाएगा, भले ही कानून का सवाल सामान्य महत्व का हो।

दूसरी ओर, यदि सुप्रीम कोर्ट या इस न्यायालय द्वारा स्पष्ट रूप से कानून की घोषणा की गई है, लेकिन निचली अदालतों ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा या इस अदालत द्वारा घोषित या प्रतिपादित कानून की अनदेखी की है, या गलत व्याख्या की है, या उसे गलत तरीके से लागू किया है तो यह एक अलग निर्णय की ओर ले जाएगा, और अपील में पार्टियों के बीच 'कानून का महत्वपूर्ण प्रश्न' शामिल होगा।

कोर्ट ने स्टेट बैंक ऑफ इंडिया और अन्य बनाम एसएन गोयल का संदर्भ दिया, जहां यह माना गया था कि सीपीसी की धारा 100 के तहत दूसरी अपील की सुनवाई करते समय तथ्य के समवर्ती निष्कर्ष आमतौर पर न्यायालय पर बाध्यकारी होते हैं।

हालांकि, यह माना गया कि कानून का यह नियम कुछ प्रसिद्ध अपवादों के अधीन है। तथ्यों पर किसी निष्कर्ष को दर्ज करना एक ट्राइट लॉ है ; ट्रायल कोर्ट को पार्टियों की दलीलों के आलोक में पूरे सबूत (मौखिक और दस्तावेजी) की सराहना करना आवश्यक है। इसी तरह, यह भी एक सामान्य कानून है कि अपीलीय न्यायालय को भी प्रथम अपील की सुनवाई के दरमियान सबूतों की सराहना करने का अधिकार है और वह या तो ट्रायल कोर्ट के निष्कर्ष की पुष्टि करता है या इसे उलट देता है।

हालांकि, जब दूसरी अपील में तथ्य के किसी भी समवर्ती निष्कर्ष को चुनौती दी जाती है तो अपीलकर्ता यह इंगित करने का हकदार होता है कि यह कानून में खराब है क्योंकि इसे दलीलों के दायरे से बाहर दर्ज किया गया है, या यह बिना किसी सबूत पर आधारित है, या भौतिक दस्तावेजी साक्ष्य को गलत तरीके से पढ़ा गया है, या इसे कानून के प्रावधानों के खिलाफ दर्ज किया गया है।

यदि कोई या अधिक आधार, जैसा कि ऊपर उल्लेख किया गया है, किसी उपयुक्त मामले में दलीलों और साक्ष्यों के आधार पर बनाया गया है, तो ऐसे आधार या कई आधार संहिता की धारा 100 के अर्थ के भीतर कानून का एक महत्वपूर्ण प्रश्न बन जाएंगे।

केस टाइटल: बनवारीलाल शर्मा बनाम कमला देवी अजितसरिया और अन्य

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