मनीष सिसोदिया की चुनाव जीत के खिलाफ याचिका खारिज: केवल FIR दर्ज होना आपराधिक इतिहास नहीं
दिल्ली हाइकोर्ट ने महत्वपूर्ण व्यवस्था देते हुए कहा है कि किसी चुनाव उम्मीदवार के खिलाफ केवल FIR दर्ज होने का मतलब यह नहीं कि उसके विरुद्ध कोई आपराधिक मामला लंबित है। अदालत ने स्पष्ट किया कि जनप्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 33ए के तहत किसी उम्मीदवार को अपने रिकॉर्ड का खुलासा करने की वैधानिक बाध्यता केवल तभी होती है, जब उस मामले में अदालत द्वारा आरोप तय कर दिए गए हों या अपराध का संज्ञान ले लिया गया हो।
जस्टिस जसमीत सिंह ने आम आदमी पार्टी (AAP) के नेता मनीष सिसोदिया की 2020 विधानसभा चुनाव में पटपड़गंज सीट से जीत को चुनौती देने वाली याचिका को पूरी तरह खारिज कर दिया।
यह याचिका सिसोदिया के खिलाफ चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवार प्रताप चंद्र ने दायर की। याचिकाकर्ता का आरोप था कि मनीष सिसोदिया ने मतदान से पहले के प्रतिबंधित 48 घंटों के दौरान चुनाव प्रचार जारी रखा और चुनावी सामग्री का प्रदर्शन किया। इसके अलावा, उन पर यह भी आरोप लगाया गया कि उन्होंने वर्ष 2013 में राष्ट्रीय सम्मान के अपमान निवारण अधिनियम के तहत दर्ज एक FIR की जानकारी छिपाई, जो कि तथ्यों को दबाने के समान है।
अदालत ने इन दलीलों को अस्वीकार करते हुए कहा कि केवल FIR दर्ज होने को जानबूझकर छिपाया गया तथ्य नहीं माना जा सकता, विशेषकर तब जब उस मामले में कोई आरोप तय न हुए हों।
जस्टिस सिंह ने अपने फैसले में रेखांकित किया कि आपराधिक इतिहास के खुलासे का उद्देश्य मतदाताओं को सूचित निर्णय लेने में मदद करना है, लेकिन यह खुलासा कानून के कड़े नियमों के अनुसार होना चाहिए। कोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता यह साबित करने में विफल रहा कि सिसोदिया को उस पुरानी FIR की कोई जानकारी थी।
अदालत ने यह भी कहा कि याचिका में लगाए गए आरोप बहुत ही सामान्य और अस्पष्ट थे। कानून के अनुसार, चुनाव याचिका में यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि किसी कथित उल्लंघन ने चुनाव के परिणाम को किस तरह प्रभावित किया, लेकिन इस मामले में ऐसे कोई ठोस साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किए गए।
अदालत ने याचिका की तकनीकी कमियों पर भी कड़ी टिप्पणी की।
जस्टिस सिंह ने कहा कि याचिकाकर्ता ने निर्धारित प्रारूप में हलफनामा पेश नहीं किया और न ही अपने आरोपों के स्रोतों की जानकारी दी। अदालत के अनुसार, ये कमियां केवल तकनीकी नहीं हैं बल्कि याचिका की विश्वसनीयता को ही खत्म कर देती हैं। अंत में हाइकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि अधिकारियों द्वारा कार्रवाई न करने या सामान्य आरोपों के आधार पर किसी निर्वाचित प्रतिनिधि की जीत को अवैध नहीं ठहराया जा सकता। इस निर्णय के साथ ही मनीष सिसोदिया के निर्वाचन को दी गई चुनौती समाप्त हो गई।