रि-एग्जामिनेशन का इस्तेमाल क्रॉस एग्जामिनेशन में दिए बयान को नष्ट करने और साक्ष्य में रह गई कम‌ियों भरने के लिए नहीं किया जा सकता: दिल्ली हाईकोर्ट

Update: 2022-06-06 07:38 GMT

दिल्ली हाईकोर्ट

दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि पुन: परीक्षा के अवसर का उपयोग गवाह को जिरह में दिए बयान को नष्ट करने (to undo the statement made in cross-examination) और साक्ष्य में रह गई कमियों को भरने के लिए नहीं किया जा सकता।

जस्टिस अमित बंसल के समक्ष मौजूद मुकदमे में प्रतिवादियों को निषेधाज्ञा देने की मांग की गई थी। 2 अगस्त, 2019 को मुकदमे में मुद्दे तय किए गए थे और साक्ष्य दर्ज करने के लिए स्थानीय आयुक्त की नियुक्ति की गई थी।

कोर्ट ने नोट किया था कि 20 मई, 2022 को स्थानीय आयुक्त के समक्ष कार्यवाही में प्रतिवादी की ओर से पेश वकील ने बचाव पक्ष के एक गवाह की फिर से जांच का अनुरोध किया था, जिसका वादी की ओर से पेश वकील ने विरोध किया था। जिसके बाद स्थानीय आयुक्त ने मामले को उचित निर्देशों के लिए न्यायालय को भेजा था।

प्रतिवादी के वकील की ओर से यह तर्क दिया गया था कि प्रतिवादी जिरह में उस गवाह द्वारा दिए गए उत्तरों के कारण उसके पुन: परीक्षण का हकदार था। यह तर्क दिया गया कि चूंकि गवाह ने केवल 'हां' या 'नहीं' में उत्तर दिया था, इसलिए वह गवाह से पूछे गए प्रश्नों के संबंध में एक उचित स्पष्टीकरण प्राप्त करने के लिए उस गवाह का फिर से जांच करने का हकदार था।

दूसरी ओर, वादी के वकील ने अनुरोध का पुरजोर विरोध करते हुए कहा कि एक गवाह को फिर से जांच करने की अनुमति नहीं दी जा सकती है ताकि स्पष्टीकरण प्रदान किया जा सके, जब उक्त गवाह ने 'हां' या 'नहीं' में प्रश्न का उत्तर दिया हो।

यह प्रस्तुत किया गया था कि गवाह एक शिक्षित व्यक्ति और कानून स्नातक था और उसने जानबूझकर पूर्वोक्त तरीके से जवाब देना चुना था। इस प्रकार हाईकोर्ट का विचार था कि पुन: परीक्षा की आड़ में, प्रतिवादी के वकील गवाह से उसके द्वारा दिए गए उत्तरों के बारे में और स्पष्टीकरण देने के लिए नहीं कह सकते थे।

कोर्ट ने कहा,

"गवाह द्वारा दिए गए उत्तरों में कोई अस्पष्टता नहीं है जिसके लिए पुन: परीक्षा के माध्यम से स्पष्टीकरण की आवश्यकता हो। वर्तमान मामले में, गवाह, जो एक कानून स्नातक है, उसने जानबूझकर 'हां' या 'नहीं' में अपना जवाब देना चुना।"

इस प्रकार, न्यायालय का विचार था कि पुन: परीक्षा के लिए कोई मामला नहीं बनता है। ‌जिसके बाद न्यायालय ने वादी को स्थानीय आयुक्त को 75,000 रुपये की अतिरिक्त राशि का भुगतान करने का निर्देश दिया।

केस टाइटल: कैपिटल आर्ट हाउस (प्रा.) लिमिटेड बनाम नेहा दत्ता

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