बलात्कार के आरोपी ने पीड़िता से विवाह कियाः दिल्ली हाईकोर्ट ने आरोपी को अग्रिम जमानत दी

Rape Accused Marries Prosecutrix: Delhi High Court Grants Anticipatory Bail To Accused

Update: 2020-11-30 05:48 GMT

दिल्ली हाईकोर्ट ने शुक्रवार को बलात्कार के एक आरोपी की तरफ से दायर अग्रिम जमानत याचिका को स्वीकार कर लिया, क्योंकि पीड़िता की मां ने कहा कि उन्हें इस आवेदन पर कोई आपत्ति नहीं है।

पीड़िता की मां ने अदालत को सूचित किया कि याचिकाकर्ता-अभियुक्त ने उसकी बेटी ( अभियोक्त्री) से शादी कर ली है। ऐसे में अगर याचिकाकर्ता को अग्रिम जमानत पर रिहा किया जाता है तो उन्हें इस पर कोई आपत्ति नहीं है। पीड़िता भी वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से सुनवाई के समय मौजूद थी।

हालांकि अतिरिक्त लोक अभियोजक मीनाक्षी चौहान ने जमानत की अर्जी का विरोध किया और कहा कि पीड़िता ने सीआरपीसी की धारा 164 के तहत दर्ज कराए गए बयान में भी अपने आरोपों का समर्थन किया है।

याचिकाकर्ता-अभियुक्त एक सरकारी कर्मी है। उसने बताया कि उसके खिलाफ एफआईआर दोनों पक्षों के बीच गलतफहमी पैदा होने के कारण दर्ज करवाई गई थी और शिकायतकर्ता ने सीआरपीसी की धारा 164 के तहत अपने बयान को फिर से दर्ज करने के लिए भी अनुरोध किया है।

इन प्रस्तुतियों के मद्देनजर, न्यायमूर्ति मनोज कुमार ओहरी की एकल पीठ ने गिरफ्तारी से पहले जमानत की याचिका को स्वीकार कर लिया और आदेश दिया कि यदि याचिकाकर्ता को गिरफ्तार किया जाता है तो उसे गिरफ्तार करने वाले संबंधित अधिकारी की संतुष्टि के लिए 25000 रुपये के निजी मुचलके व एक जमानतदार पेश करने के बाद अग्रिम जमानत पर रिहा कर दिया जाए।

आदेश में कहा गया है कि,

''तथ्यों और परिस्थितियों की समग्रता को ध्यान में रखते हुए, यह निर्देश दिया जाता है कि उसकी गिरफ्तारी की स्थिति में, याचिकाकर्ता को अग्रिम जमानत पर रिहा किया जाए ...''

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हाल ही में, मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने एक बलात्कार के आरोपी को दो महीने की अस्थायी जमानत दे दी थी ताकि इस अवधि के दौरान वह शिकायतकर्ता के साथ शादी कर सकें।

2018 में, सुप्रीम कोर्ट ने बलात्कार के एक आरोपी की सजा में बदलाव करने या संशोधन करने के लिए संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी निहित शक्तियों का उपयोग किया था। सुप्रीम कोर्ट ने आरोपी द्वारा जेल में बिताए गए दिनों को ही पर्याप्त सजा माना था ताकि पीड़िता या शिकायकर्ता को कोई और कष्ट न झेलना पड़े क्योंकि घटना के तुरंत बाद आरोपी से उससे विवाह कर लिया था।

इसी साल जुलाई में, केरल हाईकोर्ट के समक्ष एक याचिका दायर की गई थी जिसमें कहा गया था कि बलात्कार एक नाॅन-कम्पैउंडबल अपराध है और पीड़िता से विवाह करने के लिए बलात्कार के आरोपी की सजा को निलंबित करने से एक गलत मिसाल कायम होगी।

याचिका में कहा गया था कि,

''गति की तिरछी शक्ति और मामले की प्रकृति व इतिहास को देखते हुए,इस बात की संभावना को खारिज नहीं किया जा सकता है कि पीड़िता की सहमति भय, धमकी या आघात के आधार पर ली गई हो-यह एक आशंका है,जिसने माननीय सर्वोच्च न्यायालय की तरफ से शिंभू ( सुप्रा) मामले में न्यायिक मान्यता प्राप्त की है।''

शिंभू बनाम हरियाणा राज्य(2014) 13 एससीसी 318 के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि ''... पार्टियों के बीच समझौता को एक ऐसा प्रमुख कारक नहीं माना जा सकता है ,जिसके आधार पर कम सजा दी जा सकें। बलात्कार एक नाॅन-कम्पैउंडबल अपराध है और यह समाज के खिलाफ किया गया एक अपराध है। इसलिए यह ऐसे अपराध नहीं है,जिनमें पक्षकार समझौता कर लें या इन मामलों को समझौता करने के लिए उन पर छोड़ दिया जाए।

चूंकि ऐसे मामलों में अदालत को हमेशा इस बात का आश्वासन नहीं दिया जा सकता है कि समझौता करने के लिए पीड़िता द्वारा दी गई सहमति एक वास्तविक सहमति है। इस बात की पूरी संभावना है कि उस पर दोषियों ने दबाव डाला हो या इतने वर्षो से जो आघात झेला है,उसने उसे समझौता करने के लिए मजबूर कर दिया हो। वास्तव में, इस प्रस्ताव को स्वीकार करने से पीड़ित पर एक अतिरिक्त बोझ पड़ेगा। आरोपी उस पर समझौता करने का दबाव बनाने के लिए अपने सारे हथकंडे इस्तेमाल कर सकता है। इसलिए, न्याय के हित में और पीड़िता को अनावश्यक दबाव /उत्पीड़न से बचाने के लिए, बलात्कार के मामलों में पक्षकारों के बीच हुए समझौते पर विचार करना सुरक्षित नहीं होगा। न ही इस तरह के समझौते को न्यायालय द्वारा आईपीसी की धारा 376 (2) के परंतुक के तहत विवेकाधीन शक्ति के उपयोग के समय एक आधार मानना उचित होगा।''

केस का शीर्षकःरोशन बनाम राज्य ( एनसीटी आॅफ दिल्ली) व अन्य।

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