राज्यसभा सांसद और सुप्रीम कोर्ट के वकील हारिस बीरन ने यूथेनेशिया पर की कानून बनाने की अपील
सुप्रीम कोर्ट के वकील और संसद सदस्य हारिस बीरन ने सोमवार (16 मार्च) को राज्यसभा में अपने भाषण में संसद से यूथेनेशिया (इच्छामृत्यु) और गंभीर रूप से बीमार मरीज़ों की पैलिएटिव हेल्थ केयर (दर्द कम करने वाली देखभाल) को नियंत्रित करने वाला कानून बनाने की अपील की।
यह अपील सुप्रीम कोर्ट के उस पहले आदेश के बाद आई, जिसमें उसने 'पैसिव यूथेनेशिया' (निष्क्रिय इच्छामृत्यु) की अनुमति दी थी। इस आदेश के तहत कोर्ट ने 32 वर्षीय हरीश राणा का जीवन बचाने वाला इलाज हटाने की अनुमति दी थी। यह फैसला कोर्ट के 2018 के 'कॉमन कॉज़' फैसले (जिसे 2023 में संशोधित किया गया) के आधार पर लिया गया, जिसके ज़रिए 'गरिमा के साथ मरने के मौलिक अधिकार' को मान्यता दी गई।
बता दें, राणा को 2012 में एक इमारत से गिरने के बाद दिमाग में चोट लगी थी। तब से वह 'क्लीनिकली एडमिनिस्टर्ड न्यूट्रिशन' (CAN) पर जीवित थे और उनके ठीक होने के कोई संकेत नहीं थे। कोर्ट द्वारा गठित दो मेडिकल बोर्ड की रिपोर्टों ने भी इस बात की पुष्टि की थी।
केरल से इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (IUML) पार्टी के सदस्य बीरन ने अपने भाषण में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का ज़िक्र करते हुए कहा:
"पिछले हफ़्ते सुप्रीम कोर्ट ने एक फैसला सुनाया, जिसके तहत उसने एक गंभीर रूप से बीमार मरीज़ का 'लाइफ़ सपोर्ट' (जीवन रक्षक प्रणाली) हटाने की अनुमति दी। हरीश राणा एक स्वस्थ नौजवान थे। वह 2013 में अपने पेइंग गेस्ट हाउस की चौथी मंज़िल से दुर्घटनावश गिर गए और पिछले 13 सालों से कोमा में थे। वह 'परमानेंट वेजिटेटिव स्टेट' (स्थायी रूप से अचेत अवस्था) में थे, 100% विकलांग थे और उन्हें क्लीनिक की मदद से पोषण और तरल पदार्थ दिए जा रहे थे। उनके माता-पिता के पास कोर्ट जाने के अलावा कोई और विकल्प नहीं बचा था। मैंने उनके वकील रश्मि नंदकुमार से बात की, जिन्होंने मुझे बताया कि इस पूरे निजी दुखद अनुभव के दौरान परिवार ने जिस तरह का धैर्य और हिम्मत दिखाई, वह काबिले तारीफ़ है।"
उन्होंने कहा कि जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन की बेंच की आँखों में फैसला सुनाते समय "आँसू थे। उन्होंने माता-पिता से कहा कि 'आप अपने बेटे का साथ नहीं छोड़ रहे हैं, बल्कि आप उसे गरिमा के साथ इस दुनिया से विदा होने की अनुमति दे रहे हैं'।"
उन्होंने आगे कहा,
"सुप्रीम कोर्ट ने भी महसूस किया कि वे एक ऐसे क्षेत्र में कदम रख रहे हैं, जहां कोई कानून नहीं है। संविधान का अनुच्छेद 21 कहता है कि गरिमा के साथ जीने का अधिकार है, जिसे बढ़ाकर गरिमा के साथ मरने के अधिकार तक कर दिया गया। लेकिन सुप्रीम कोर्ट इसे कितना बढ़ा सकता है... यही सवाल है। मेरा मुद्दा यह है कि इन सब बातों के बावजूद कोई कानून नहीं है।"
उन्होंने कहा कि 2006 में 196वीं विधि आयोग की रिपोर्ट ने निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) के मुद्दे की व्यापक रूप से जांच की थी और एक मसौदा कानून का प्रस्ताव रखा था। उन्होंने कहा, "लेकिन संसद ने कुछ नहीं किया।"
बीरन ने कहा कि 2011 में अरुणा शानबाग मामले (2011) में सुप्रीम कोर्ट को "मजबूर होकर दखल देना पड़ा" और "दिशानिर्देश बनाने पड़े, क्योंकि संसद ने कुछ नहीं किया था।"
उन्होंने ज़ोर देकर कहा,
"2012 में विधि आयोग की 241वीं रिपोर्ट में फिर से एक मसौदा कानून था, लेकिन संसद ने कुछ नहीं किया। 2018 में 'कॉमन कॉज़' मामले में सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने विस्तृत दिशानिर्देश जारी किए, जिसमें यह कहा गया कि ये दिशानिर्देश तब तक लागू रहेंगे जब तक संसद कोई कानून नहीं बना लेती। लेकिन संसद ने कुछ नहीं किया। 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने दिशानिर्देशों में संशोधन किया, जब तक कि संसद कानून नहीं बना लेती; संसद ने फिर भी कुछ नहीं किया। 2026 में सुप्रीम कोर्ट के नवीनतम फैसले में भी यह उम्मीद जताई गई कि संसद इस विषय पर कानून बनाएगी। हम गरीबों को आर्थिक संकट से बचाने के बारे में लगातार बातें करते रहते हैं। देश में स्वास्थ्य सेवा पर होने वाले कुल खर्च का 65% हिस्सा परिवारों द्वारा पूरी तरह से अपनी जेब से चुकाया जाता है। फिर भी हम कानून पारित करने से इनकार करते हैं। कोई भी डॉक्टर या स्वास्थ्य पेशेवर जोखिम उठाने को तैयार नहीं होगा। इसके अलावा, विदेशों में भी स्वास्थ्य सेवा से जुड़े कानून मौजूद हैं, लेकिन हम अभी तक तैयार नहीं हैं।"
उन्होंने आगे कहा कि उनके राज्य केरल ने देश को यह दिखाया कि 'जीवन के अंतिम चरण की देखभाल' (End of Life Care) कैसी होती है; उन्होंने बताया कि 2008 से ही केरल में एक समुदाय-आधारित 'पैलिएटिव केयर' (शामक देखभाल) कार्यक्रम चलाया जा रहा है, जो गैर-सरकारी संगठनों (NGOs) को साथ जोड़कर हर ग्राम पंचायत तक पहुंच रहा है।
अपने भाषण के समापन पर उन्होंने कहा,
"मैं सरकार से आग्रह करता हूं कि वह विधि आयोग द्वारा अनुशंसित 'असाध्य रोगों से पीड़ित रोगियों के चिकित्सा उपचार और जीवन के अंतिम चरण की देखभाल अधिनियम' (Medical Treatment of Terminally Ill Patients and End of Life Care Act) को पेश करे। साथ ही हर ज़िला अस्पताल तथा प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों पर पैलिएटिव स्वास्थ्य देखभाल के बुनियादी ढांचे को अनिवार्य करे।"