मोटर दुर्घटना में माता-पिता की मृत्यु होने पर विवाहित बेटियां मुआवजे की हकदार; बेटे-बेटियों में भेदभाव नहीं कर सकते: कर्नाटक हाईकोर्ट

Update: 2022-08-12 10:18 GMT

कर्नाटक हाईकोर्ट

कर्नाटक हाईकोर्ट (Karnataka High Court) ने कहा कि मोटर दुर्घटना में माता-पिता की मृत्यु होने पर विवाहित बेटियां मुआवजे की हकदार हैं।

जस्टिस एच पी संदेश की एकल न्यायाधीश पीठ ने 9 मई, 2014 के मोटर दुर्घटना दावा न्यायाधिकरण के आदेश को चुनौती देने वाली जनरल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड द्वारा दायर अपील को खारिज करते हुए यह टिप्पणी की।

बेंच ने रिलायंस जनरल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड बनाम बीरेंद्र और अन्य के मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर भरोसा किया, जिसमें यह माना गया था कि अब तक यह तय हो गया है कि मृतक के कानूनी प्रतिनिधियों को मुआवजे के लिए आवेदन करने का अधिकार है।

आगे देखा गया कि यहां तक कि मृतक के बालिग विवाहित और कमाई करने वाले बेटों को कानूनी प्रतिनिधि होने के नाते मुआवजे के लिए आवेदन करने का अधिकार है और यह ट्रिब्यूनल का बाध्य कर्तव्य होगा कि वह इस तथ्य के बावजूद आवेदन पर विचार करे कि क्या संबंधित कानूनी प्रतिनिधि पूरी तरह से मृतक पर निर्भर था और दावे को केवल पारंपरिक शीर्षों तक ही सीमित नहीं रखना था।

बेंच ने देखा,

"यह न्यायालय भी कोई भेदभाव नहीं कर सकता है कि वे विवाहित बेटे हैं या विवाहित बेटियां हैं और इसलिए,यह बहुत विवाद है कि मृतक की विवाहित बेटियां मुआवजे की हकदार नहीं हैं और अदालत को निष्कर्ष पर आने के पीछे के तर्क पर ध्यान देना होगा। यहां तक कि विवाहित बेटे और बड़े बेटे भी मुआवजे का दावा करने के पात्र हैं और इसलिए विवाहित बेटियां भी सभी मुआवजे की हकदार हैं।"

बीमा कंपनी ने यह भी तर्क दिया कि जिस टेंपो में मृतक यात्रा कर रहा था, उसके चालक की ओर से अंशदायी लापरवाही की गई थी और इसलिए ट्रिब्यूनल को अंशदायी लापरवाही पहलू को ध्यान में रखना चाहिए था।

पीठ ने कहा कि बीमा कंपनी ने उल्लंघन करने वाले वाहन के चालक की जांच नहीं की है, जो लापरवाही के संबंध में बोलने के लिए सही व्यक्ति है और बीमा कंपनी ने उक्त तर्क को प्रमाणित करने के लिए बीमा कंपनी के आधिकारिक गवाह से भी पूछताछ नहीं की है। .

कोर्ट ने कहा,

"जब बीमा कंपनी PW.1 के साक्ष्य में और PW.2 की जिरह में भी टेंपो के चालक की ओर से किसी भी लापरवाही को उजागर करने में विफल रही है, तो ट्रिब्यूनल के अंशदायी लापरवाही के निष्कर्ष पर आने का सवाल ही उत्पन्न नहीं होता।"

इसके अलावा कोर्ट ने कहा,

"इसलिए, जब तक लापरवाही के संबंध में कोर्ट के समक्ष ठोस सबूत नहीं होते, तब तक अंशदायी लापरवाही पर विचार करने का सवाल ही नहीं उठता।"

बेंच ने कहा,

"पीडब्ल्यू 1 की क्रॉस एग्जामिनेशन से जवाब प्राप्त करने के अलावा उक्त तर्क को प्रमाणित करने के लिए कि मृतक उससे छह साल छोटा हो सकता है, कुछ भी रिकॉर्ड में नहीं है और अदालत को दस्तावेजी साक्ष्य के आधार पर मृतक की उम्र पर ध्यान देना होगा।"

तद्नुसार कोर्ट ने अपील को खारिज कर दिया।

केस टाइटल: रिलायंस जनरल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड बनाम गंगप्पा एस/ओ छिन्नप्पा सौंशी

केस साइटेशन: 2022 लाइव लॉ 315

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