खनिजों पर राज्य सरकारों के कर लगाने की शक्ति पर रोक, संसद ने पारित किया MMDR संशोधन विधेयक
संसद ने Mines and Minerals (Development and Regulation) Amendment Bill, 2026 को मंजूरी दे दी है। राज्यसभा ने गुरुवार को विधेयक पारित किया, जबकि लोकसभा ने इसे एक दिन पहले मंजूरी दी थी। विधेयक का उद्देश्य खनन क्षेत्र में कर और शुल्क व्यवस्था को अधिक एकरूप और पूर्वानुमान योग्य बनाना है।
राज्यों के कर लगाने के अधिकार पर बड़ी रोक
विधेयक में नई Section 9D जोड़ी गई है। इसके तहत राज्य सरकारें खनिज अधिकारों (Mineral Rights) या खनिज वाली भूमि (Mineral-Bearing Lands) पर खनिज की मात्रा, कीमत, देय रॉयल्टी या किसी अन्य आधार पर कर, उपकर या अन्य शुल्क नहीं लगा सकेंगी, जब तक केंद्र सरकार द्वारा निर्धारित शर्तों और प्रतिबंधों के अनुसार ऐसा न किया जाए।
इससे खनिजों पर अलग-अलग राज्यों द्वारा लगाए जाने वाले अलग-अलग शुल्कों पर रोक लगाने और पूरे देश में अधिक समान व्यवस्था बनाने का रास्ता साफ होगा।
पहले सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों की शक्ति को माना था
यह संशोधन खास तौर पर इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि 2024 में सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की संविधान पीठ ने 8:1 के बहुमत से कहा था कि राज्यों के पास खनिज अधिकारों पर कर लगाने की शक्ति है और Mines and Minerals (Development and Regulation) Act, 1957 इस शक्ति को सीमित नहीं करता।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया था कि रॉयल्टी कर नहीं है और राज्यों को पुराने बकाये की वसूली की अनुमति दी थी।
अब संसद के इस संशोधन के जरिए उस व्यवस्था पर वैधानिक प्रतिबंध लगाने की कोशिश की गई है।
पुराने कर और शुल्क का क्या होगा?
विधेयक के अनुसार, संशोधन लागू होने से पहले लगाए गए ऐसे कर, उपकर या अन्य शुल्क, जो अभी तक जमा या वसूल नहीं किए गए हैं, उन्हें अमान्य किया जाएगा।
हालांकि, जो रकम राज्य सरकार पहले ही वसूल या प्राप्त कर चुकी है, उसे वापस करने की जरूरत नहीं होगी।
सरकार ने क्यों बताया जरूरी?
केंद्र सरकार का कहना है कि अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग कर और शुल्क होने से खनन उद्योग को अलग-अलग दरों, कई शुल्कों और अप्रत्याशित कर व्यवस्था का सामना करना पड़ रहा था।
सरकार के अनुसार, इससे खनन परियोजनाओं की लागत बढ़ सकती है और खनिजों का उत्पादन प्रभावित हो सकता है। संशोधन का उद्देश्य खनन क्षेत्र में स्थिरता, स्पष्टता और पूर्वानुमेयता लाना है।
विधेयक कोयला एवं खान मंत्री जी. किशन रेड्डी ने पेश किया था। यह कानून राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद केंद्र सरकार द्वारा राजपत्र में अधिसूचित तारीख से लागू होगा।
यह संशोधन इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह केवल खनन कर व्यवस्था से जुड़ा मामला नहीं है, बल्कि केंद्र और राज्यों के बीच वित्तीय अधिकारों और संघीय ढांचे से जुड़े सवाल भी खड़े करता है।