घराट के मुख्य चुनाव आयुक्त पर The Indian Express की रिपोर्ट आने के बाद कई सवाल खड़े हो रहे हैं, लेकिन कुछ क़ानूनी सवाल हैं जिसको समझना ज़रूरी है, वो सवाल है- 

मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की संवैधानिक प्रक्रिया क्या है?

महाभियोग प्रस्ताव कैसे शुरू होता है?

पहले विपक्ष की कोशिश क्यों आगे नहीं बढ़ पाई?

और अब अगर दोबारा प्रस्ताव आता है तो आगे क्या होगा?

ज्ञानेश कुमार के खिलाफ पहली कोशिश

बंगाल चुनाव के दौरान 12 मार्च को विपक्षी दलों ने संसद के दोनों सदनों में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाने की मांग को लेकर नोटिस दिया था।

लोकसभा वाले नोटिस पर 130 सांसदों ने और राज्यसभा वाले नोटिस पर 63 सांसदों ने हस्ताक्षर किए थे।

नियम के मुताबिक, प्रस्ताव लाने के लिए—

लोकसभा में कम से कम 100 सांसदों के हस्ताक्षर जरूरी हैं।

राज्यसभा में कम से कम 50 सांसदों के हस्ताक्षर जरूरी हैं।

यानी उस समय विपक्ष के पास जरूरी संख्या मौजूद थी।

विपक्ष ने आरोप लगाया था कि ज्ञानेश कुमार की नियुक्ति के बाद चुनाव आयोग अपनी स्वतंत्रता और संवैधानिक जिम्मेदारियों को ठीक से निभाने में विफल रहा है।

मतदाता सूची और देशभर में Special Intensive Revision यानी SIR को लेकर भी चुनाव आयोग के रवैये पर सवाल उठाए गए थे।

लेकिन इन आरोपों पर संसद में चर्चा नहीं हो सकी।

नोटिस क्यों खारिज हुए?

6 अप्रैल को राज्यसभा के सभापति सी.पी. राधाकृष्णन ने विपक्ष का नोटिस खारिज कर दिया।

अपने आदेश में उन्होंने कहा कि लगाए गए आरोप पहली नजर में संविधान के अनुच्छेद 324(5) और 124(4) में बताए गए 'कदाचार' के दायरे में नहीं आते।

उन्होंने यह भी कहा कि विपक्ष द्वारा उठाए गए कुछ मुद्दों पर पहले ही फैसला हो चुका है, जबकि कुछ मामले अदालत में विचाराधीन हैं।

लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने भी इसी तरह के आधार पर नोटिस को स्वीकार नहीं किया।

अब सवाल है कि आखिर मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की संवैधानिक प्रक्रिया क्या है?

चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति कैसे होती है?

भारत में चुनाव कराने की जिम्मेदारी चुनाव आयोग की है।

इसमें एक मुख्य चुनाव आयुक्त यानी CEC और दो अन्य चुनाव आयुक्त यानी Election Commissioners होते हैं।

इनकी नियुक्ति संविधान के अनुच्छेद 324 और 2023 में बने Chief Election Commissioner and Other Election Commissioners Act के तहत होती है।

राष्ट्रपति इनकी नियुक्ति एक सेलेक्शन कमेटी की सिफारिश पर करते हैं।

इस कमेटी में तीन सदस्य होते हैं—

प्रधानमंत्री

लोकसभा में विपक्ष के नेता

केंद्र सरकार का एक कैबिनेट मंत्री

कानून के मुताबिक, उम्मीदवार भारत सरकार में सचिव स्तर के पद पर काम कर चुका होना चाहिए। उसके पास ईमानदारी और चुनाव प्रबंधन का अनुभव भी होना चाहिए।

मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त का कार्यकाल अधिकतम 6 साल या 65 वर्ष की उम्र तक, जो भी पहले हो, होता है।

मुख्य चुनाव आयुक्त को सुप्रीम कोर्ट के जज के बराबर वेतन और सुविधाएं मिलती हैं।

और यहीं से मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने का सबसे महत्वपूर्ण नियम आता है।

मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाना इतना मुश्किल क्यों है?

संविधान के अनुच्छेद 324(5) के मुताबिक, मुख्य चुनाव आयुक्त को उसी तरीके से हटाया जा सकता है, जिस तरीके से सुप्रीम कोर्ट के जज को हटाया जाता है।

यानी इसके लिए संसद में विशेष प्रक्रिया पूरी करनी होती है।

संविधान के अनुच्छेद 124(4) के मुताबिक, किसी सुप्रीम कोर्ट के जज और इसी प्रक्रिया के तहत मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने के दो आधार हैं—

पहला — साबित कदाचार यानी Proved Misbehaviour

दूसरा — अक्षमता यानी Incapacity

सरल भाषा में समझें तो कदाचार का मतलब गंभीर गलत आचरण या पद से जुड़ा ऐसा गलत काम हो सकता है, जिसे कानून के तहत साबित किया जाए।

वहीं अक्षमता का मतलब है कि व्यक्ति अपनी संवैधानिक जिम्मेदारी निभाने में असमर्थ हो।

महाभियोग की पूरी प्रक्रिया क्या है?

अब सबसे महत्वपूर्ण सवाल—अगर मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने का प्रस्ताव लाना हो तो प्रक्रिया क्या होगी?

पहला चरण — नोटिस

सबसे पहले संसद के किसी एक सदन में प्रस्ताव लाने के लिए नोटिस दिया जाता है।

लोकसभा में कम से कम 100 सांसदों और राज्यसभा में कम से कम 50 सांसदों के हस्ताक्षर जरूरी होते हैं।

यह नोटिस लोकसभा अध्यक्ष या राज्यसभा के सभापति को दिया जाता है।

दूसरा चरण — नोटिस स्वीकार या खारिज

इसके बाद पीठासीन अधिकारी यह देखते हैं कि लगाए गए आरोप आगे जांच के लायक हैं या नहीं।

अगर नोटिस खारिज कर दिया जाता है तो प्रक्रिया वहीं खत्म हो जाती है।

अगर नोटिस स्वीकार कर लिया जाता है तो आगे जांच की प्रक्रिया शुरू होती है।

तीसरा चरण — जांच समिति

नोटिस स्वीकार होने के बाद एक जांच समिति बनाई जाती है।

यह समिति आरोपों की जांच करती है, सबूत देखती है और जरूरत पड़ने पर गवाहों के बयान भी ले सकती है।

इसके बाद समिति अपनी रिपोर्ट देती है।

चौथा चरण — संसद में चर्चा और मतदान

अगर जांच समिति आरोपों को सही पाती है, तो प्रस्ताव संसद में चर्चा और मतदान के लिए आता है।

यहां सिर्फ साधारण बहुमत काफी नहीं होता।

दोनों सदनों में विशेष बहुमत की जरूरत होती है।

यानी प्रस्ताव को सदन की कुल सदस्य संख्या के बहुमत के साथ-साथ उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के कम से कम दो-तिहाई बहुमत से पास होना होता है।

पांचवां चरण — राष्ट्रपति का आदेश

अगर दोनों सदन प्रस्ताव को आवश्यक बहुमत से पास कर देते हैं, तो प्रस्ताव राष्ट्रपति के पास भेजा जाता है।

इसके बाद राष्ट्रपति आदेश जारी करते हैं और मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटाया जा सकता है।

क्या इससे पहले किसी जज या चुनाव आयुक्त को हटाया गया है?

भारत के इतिहास में अब तक किसी मुख्य चुनाव आयुक्त को महाभियोग की इस प्रक्रिया के जरिए पद से नहीं हटाया गया है।

जजों के मामलों में भी प्रक्रिया पूरी होकर किसी जज को इस तरह पद से हटाने का उदाहरण नहीं है।

यानी अब तक किसी जज या मुख्य चुनाव आयुक्त को संसद की इस महाभियोग प्रक्रिया के जरिए वास्तव में पद से हटाया नहीं गया है।

अब ज्ञानेश कुमार के मामले में आगे क्या होगा?

अगर विपक्ष इस बार फिर से नोटिस देता है, तो सबसे पहला सवाल यही होगा कि क्या लोकसभा अध्यक्ष या राज्यसभा सभापति उस नोटिस को स्वीकार करते हैं या नहीं।

अगर नोटिस स्वीकार होता है, तभी आगे जांच समिति और उसके बाद संसद में चर्चा और मतदान की प्रक्रिया शुरू होगी।

लेकिन सिर्फ पर्याप्त सांसदों के हस्ताक्षर होना ही किसी मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने के लिए काफी नहीं है।

आखिरी फैसला एक लंबी संवैधानिक और संसदीय प्रक्रिया के बाद ही हो सकता है।

इसलिए अब सबकी नजर इस बात पर है कि विपक्ष का नया प्रस्ताव किस आधार पर तैयार किया जाता है और संसद के पीठासीन अधिकारी उस पर क्या फैसला लेते हैं।

Tags: