डीएनए रिपोर्ट में पितृत्व स्थापित नहीं हुआ, केवल इस आधार पर जमानत नहीं दी जा सकती : बाॅम्बे हाईकोर्ट ने नाबालिग से गैंगरेप के आरोपी को जमानत देने से इनकार किया

Update: 2020-08-03 16:12 GMT

बॉम्बे हाईकोर्ट ने हाल ही में कहा है कि गैंगरेप के बाद पैदा हुए बच्चे की डीएनए रिपोर्ट आरोपी के पितृत्व को स्थापित नहीं करती है ,सिर्फ इस आधार पर आरोपी को जमानत पर रिहा नहीं किया जा सकता।

इसी के साथ कोर्ट ने एक वैभव उबाले की तरफ दायर जमानत याचिका को खारिज कर दिया है। वैभव पर आरोप है कि उसने दो अन्य लोगों के साथ मिलकर एक नाबालिग लड़की का बलात्कार किया था।

25 वर्षीय आरोपी की जमानत अर्जी पर सुनवाई करते हुए जस्टिस भारती डांगरे ने कहा कि-

''केवल इस तथ्य के आधार पर कि डीएनए रिपोर्ट पितृत्व को स्थापित नहीं करती है, इस चरण में आवेदक को रिहा करने के लिए कोई आधार नहीं है। इस बात की पूरी संभावना है कि वह एक बार रिहा होने के बाद पीड़ित लड़की पर दबाव बनाएगा। जांच एजेंसी द्वारा एकत्रित की गई सामग्री को देखते हुए आरोपी को केवल इस आधार पर भी जमानत पर रिहा नहीं किया जा सकता है कि वह एक युवा है।''

आवेदक को आईपीसी की धारा 376 और प्रोटेक्शन आॅफ चिल्ड्रन फ्रम सेक्शुअल आफेंस एक्ट 2012 की धारा 3, 4, 5 (जी), 5 (जे)(II), 6, 8 और 12 के तहत दर्ज की गई एफआईआर के संबंध में गिरफ्तार किया गया था।

जांच के बाद पूने स्थित जिला एवं विशेष न्यायाधीश की अदालत में 25 सितंबर, 2019 को एक आरोप-पत्र दायर किया गया था। अभियुक्त पर दो अन्य आरोपी व्यक्तियों के साथ आईपीसी की धारा 376 (डी) के तहत आरोप लगाए गए हैं। इसके अलावा पाॅक्सो अधिनियम के संबंधित प्रावधानों के तहत भी मामला बनाया गया है।

आवेदक की ओर से अधिवक्ता सुभाष कर्माकर और अधिवक्ता समर्थ कर्माकर ने कहा कि उसे बिना किसी तुक और कारण के उक्त अपराध में आरोपी बना दिया गया है। यौन उत्पीड़न के कथित कृत्य से पैदा हुए बच्चे की डीएनए रिपोर्ट पर बहुत अधिक निर्भरता जताते हुए उन्होंने तर्क दिया कि इस रिपोर्ट से साफ जाहिर है कि आवेदक उक्त बच्ची का पिता नहीं है। उन्होंने तर्क दिया कि डीएनए रिपोर्ट आरोपी को इस यौन उत्पीड़न के अपराध से दोषमुक्त करती है।

पीड़िता ने 6 नवंबर, 2018 को एक बच्ची को जन्म दिया था। जबकि गर्भावस्था के समय पीड़िता की उम्र 18 वर्ष से कम थी। कोरेगांव पार्क पुलिस स्टेशन के एक अधिकारी ने इस संबंध में उसकी माँ से पूछताछ की थी। पीड़िता ने अपनी मां और महिला सतर्कता समिति की सदस्य की मौजूदगी में अपना बयान दर्ज कराया था।

पीड़िता मॉरिस हाई स्कूल वडगांव शेरी में पढ़ाई कर रही थी। इसी दौरान उसका एक श्रद्धा नाम की लड़की से परिचय हुआ था। जब फरवरी-मार्च 2018 में उसकी 12 वीं की बोर्ड परीक्षा चल रही थी,उस समय वह अपनी दो सहेलियों के साथ मिलकर श्रद्धा के घर पर पढ़ाई कर रही थी। उसी दौरान उसकी आवेदक से मुलाकात हुई थी,जो उसी इलाके का रहने वाला था।

इस मुलाकात के तीसरे दिन उसे फिर से आवेदक से मिलवाया गया और उसकी सहेलियां उसे आवेदक के घर भी ले गई। कुछ कारणों के चलते उसकी दोनों सहेलियों ने उसे आवेदक के साथ अकेला छोड़ दिया और आवेदक ने इस स्थिति का लाभ उठाया। इसी दौरान उसके दो पुरुष मित्र कुछ खाने-पीने का सामान लेकर उसके घर पहुंच गए। आवेदक ने पीड़िता को शीतल पेय दिया,जिसमें कुछ नशीला पदार्थ मिला हुआ था। उसको पीने के बाद पीड़िता को नींद और चक्कर आने लग गए थे। आवेदक ने पीड़िता को बेड-रूम में आराम करने के लिए कहा जबकि उसके दोस्त वापस लौट आए। हालांकि आरोप यह लगाया गया है कि उसके बाद आवेदक और उसके दो दोस्तों ने पीड़िता के साथ सामूहिक बलात्कार किया।

घटना के परिणामों के डर से पीड़िता ने इस बारे में किसी को कुछ नहीं बताया। न ही उसने अपनी मां को यह बताया कि वह गर्भवती है। 5 दिसंबर, 2018 को जब उसके पेट में दर्द हुआ तो उसकी मां उसे अस्पताल ले गई। जिसके बाद उसकी मां को पीड़िता के गर्भवती होने के बारे में पता चला।

अभियोजन और आवेदक की ओर से दलीलें सुनने के बाद न्यायालय ने कहा कि-

''आरोप पत्र में आवेदक के खिलाफ पर्याप्त सामग्री है। आवेदक के खिलाफ मामला गंभीर है। वह उन तीन आरोपियों में से एक है,जिन्होंने सामूहिक बलात्कार किया था और एक गरीब असहाय पीड़ित लड़की की स्थिति का लाभ उठा था। आवेदक एक बलात्कार के मामले में लिप्त है। ऐसे में इस चरण में आरोपी को केवल इस आधार पर जमानत नहीं दी जा सकती है कि डीएनए रिपोर्ट पितृत्व का समर्थन नहीं करती है। इस बात की पूरी संभावना है कि वह एक बार रिहा होने के बाद पीड़ित लड़की पर दबाव बनाएगा। जांच एजेंसी द्वारा एकत्रित की गई सामग्री को देखते हुए आरोपी को केवल इस आधार पर भी जमानत पर रिहा नहीं किया जा सकता है कि वह एक युवा है। ऐसे में जमानत पर रिहाई का कोई मामला नहीं बनता है।''

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