'मीडिया को सनसनीखेज रिपोर्टिंग से बचना चाहिए': दिल्ली कोर्ट ने स्टर्लिंग बायोटेक रिपोर्टिंग मामले में मनोज संदेसरा के पक्ष में लगाई एकतरफ़ा रोक

Update: 2026-04-08 14:42 GMT

दिल्ली कोर्ट ने मनोज केसरीचंद संदेसरा के पक्ष में एकतरफ़ा अंतरिम रोक का आदेश जारी किया। इस आदेश के तहत Google LLC, Meta Platforms और 'जॉन डो' (अज्ञात संस्थाओं) को स्टर्लिंग बायोटेक बैंक धोखाधड़ी मामले से मनोज और उनके परिवार को जोड़ने वाली कोई भी सामग्री प्रकाशित करने से रोक दिया गया।

तीस हज़ारी कोर्ट की सीनियर सिविल जज ऋचा शर्मा ने Google LLC और Meta Platforms को निर्देश दिया कि वे मनोज के मानहानि के मुकदमे के लंबित रहने तक, विवादित सामग्री वाले URL को अपने सर्च इंजन के नतीजों से हटा दें या डी-लिस्ट कर दें।

ऐसा करते हुए जज ने मीडिया संस्थानों की रिपोर्टिंग के तरीके पर आपत्ति जताई और टिप्पणी की कि मीडिया को अपनी रिपोर्टिंग में सटीकता और निष्पक्षता बनाए रखने का प्रयास करना चाहिए और सनसनीखेज रिपोर्टिंग से बचना चाहिए।

कोर्ट ने कहा कि एक लोकतंत्र में मीडिया की ज़िम्मेदारी बहुआयामी होती है। इसमें जनता को सूचित करना, विविध दृष्टिकोण प्रस्तुत करना, एक 'चौकीदार' (Watchdog) की भूमिका निभाना और सार्वजनिक बहस को बढ़ावा देना शामिल है।

कोर्ट ने आगे कहा कि मीडिया के लिए यह अत्यंत महत्वपूर्ण है कि वह घटनाओं की सटीक रिपोर्टिंग करे, सत्ता में बैठे लोगों को जवाबदेह ठहराए और यह सुनिश्चित करे कि नागरिकों को विभिन्न प्रकार के दृष्टिकोणों तक पहुंच प्राप्त हो। कोर्ट ने इस बात पर ज़ोर दिया कि मीडिया पर एक भारी ज़िम्मेदारी है, क्योंकि इसे लोकतंत्र का 'चौथा स्तंभ' माना जाता है।

कोर्ट ने कहा,

"मीडिया की सबसे पहली और प्रमुख ज़िम्मेदारी यह है कि वह किसी भी कहानी के सभी पहलुओं को निष्पक्ष रूप से प्रस्तुत करने का प्रयास करे और विरोधी दृष्टिकोणों के बीच संतुलन बनाए रखे। गलत सूचनाओं का मुकाबला करने और अपनी द्वारा प्रसारित की जाने वाली जानकारी की सटीकता सुनिश्चित करने के मामले में मीडिया को अत्यंत सतर्क रहना चाहिए। यह कोर्ट भली-भांति समझता और स्वीकार करता है कि भारत के संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत 'वाक एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता' का अधिकार प्राप्त है। हालांकि, ये अधिकार पूर्ण या असीमित नहीं हैं, बल्कि भारत के संविधान के अनुच्छेद 19(2) के तहत इन पर कुछ सीमाएं भी लागू होती हैं।"

संदेसरा ने कोर्ट का रुख करते हुए मीडिया संस्थानों द्वारा प्रकाशित और प्रतिवादी प्लेटफ़ॉर्मों (Google, Meta आदि) के माध्यम से उपलब्ध कथित तौर पर मानहानिकारक, झूठी और अपमानजनक सामग्री के विरुद्ध क्षतिपूर्ति और स्थायी रोक का आदेश देने की माँग की थी।

उन्होंने यह तर्क दिया कि ऑनलाइन उपलब्ध सामग्री में उन्हें और उनके परिवार को लगातार 'भगोड़ा', 'मनी लॉन्डरर' और 'बैंक धोखाधड़ी करने वाला' के रूप में चित्रित किया जा रहा है, जबकि सुप्रीम कोर्ट ने स्टर्लिंग बायोटेक समूह से संबंधित कानूनी कार्यवाही पर पहले ही रोक लगा रखी है। एकतरफ़ा अंतरिम रोक लगाते हुए कोर्ट ने फ़ैसला दिया कि स्टर्लिंग बायोटेक लिमिटेड केस और कथित बैंक धोखाधड़ी के मामले में संदेसरा और उनके परिवार से जुड़ी किसी भी सामग्री को छापना, दोबारा छापना या फैलाना उनकी इज़्ज़त को नुकसान पहुंचाने और उन पर कलंक लगाने जैसा होगा; खासकर सुप्रीम कोर्ट के उस आदेश को देखते हुए, जिसके तहत इस मामले से जुड़ी सभी कानूनी कार्रवाई रद्द कर दी गई।

कोर्ट ने कहा,

"इस नज़रिए से भी देखें तो ये प्रकाशन प्रेस/मीडिया की आज़ादी के अधिकार की भावना के अनुरूप नहीं हैं, क्योंकि यह अधिकार पूरी तरह से असीमित नहीं है, बल्कि इसका इस्तेमाल तय सीमाओं के अंदर ही किया जाना चाहिए।"

कोर्ट ने यह निष्कर्ष निकाला कि मीडिया द्वारा प्रकाशित किए गए विवादित लेख और सामग्री, पहली नज़र में ही संदेसरा और उनके परिवार को 'भगोड़ा', 'पैसे की हेरा-फेरी करने वाला' (मनी लॉन्डरर) और 'धोखेबाज़' आदि के तौर पर पेश करते हैं, जबकि इस संबंध में अभी तक कोई ठोस फ़ैसला नहीं आया।

जज ने कहा,

"रिकॉर्ड में मौजूद लेखों की हेडलाइंस में इस्तेमाल की गई भाषा, मुख्य रूप से वादी (Plaintiff) पर आपराधिक होने का आरोप लगाती है। वादी के ख़िलाफ़ सभी कानूनी कार्रवाई रद्द होने के बाद भी सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म पर इन लेखों का मौजूद रहना—जहां इन्हें कोई भी देख सकता है—निश्चित तौर पर वादी और उनके परिवार की इज़्ज़त को भारी नुकसान पहुंचाने की क्षमता रखता है। इस नुकसान की भरपाई सिर्फ़ पैसे से करना शायद काफ़ी न हो।"

कोर्ट ने इस मुक़दमे के संबंध में समन जारी किए। साथ ही रोक लगाने वाली अर्ज़ी पर भी नोटिस जारी किया। अब इस मामले की अगली सुनवाई 20 अप्रैल को होगी।

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