केरल की पूर्व पुलिस महानिदेशक (DGP) और तिरुवनंतपुरम नगर निगम की पार्षद आर. श्रीलेखा ने अपने खिलाफ दर्ज FIR रद्द कराने के लिए केरल हाइकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। उन पर आरोप है कि उन्होंने अपने यूट्यूब चैनल और ब्लॉग के माध्यम से तीन बलात्कार मामलों के पीड़ितों के नाम उजागर किए।

इस मामले में उन्हें एकमात्र आरोपी बनाया गया। म्यूजियम पुलिस स्टेशन में उनके खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 72 और लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम (POCSO Act) की धारा 23 के तहत मामला दर्ज किया गया।

POCSO Act की धारा 23 के अनुसार किसी भी बाल पीड़ित की पहचान जैसे नाम, पता, फोटो, परिवार की जानकारी, स्कूल या अन्य कोई विवरण, जिससे उसकी पहचान उजागर हो सके, सार्वजनिक करना प्रतिबंधित है। इसका उल्लंघन करने पर कम से कम छह महीने से लेकर एक वर्ष तक की सजा का प्रावधान है।

वहीं BNS की धारा 72 के तहत किसी यौन अपराध के पीड़ित की पहचान उजागर करने या उससे जुड़ी जानकारी प्रकाशित करना अपराध माना गया, जिसके लिए दो वर्ष तक की सजा और जुर्माना हो सकता है।

याचिका के अनुसार सोशल एक्टिविस्ट ने मजिस्ट्रेट अदालत में निजी शिकायत दायर की थी। शिकायत में आरोप लगाया गया कि श्रीलेखा ने अपने यूट्यूब चैनल 'सस्नेहम श्रीलेखा' और ब्लॉग पेज पर इन मामलों से जुड़े पीड़ितों के नाम उजागर किए।

याचिका में कहा गया कि मजिस्ट्रेट ने उन्हें सुनवाई का अवसर दिए बिना ही भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 175 के तहत शिकायत को म्यूजियम पुलिस के पास भेजने का आदेश दे दिया जिसके बाद उनके खिलाफ मामला दर्ज कर लिया गया।

श्रीलेखा ने हाइकोर्ट में दायर याचिका में कहा कि उन्होंने किसी भी POCSO पीड़ित की पहचान उजागर नहीं की। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि जिन मामलों में नाम उजागर करने का आरोप लगाया गया, उनमें से एक मामला POCSO से संबंधित नहीं बल्कि हत्या का मामला था।

इन आधारों पर उन्होंने हाइकोर्ट से अपने खिलाफ दर्ज FIR रद्द करने की मांग की। याचिका में शिकायतकर्ता को भी पक्षकार बनाया गया।

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