वंदे मातरम् मामले में 'नक्सली' टिप्पणी पर सीनियर एडवोकेट एस. मुरलीधर ने जताई कड़ी आपत्ति
वंदे मातरम् से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट में सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता की एक टिप्पणी को लेकर सीनियर एडवोकेट डॉ. एस. मुरलीधर ने कड़ी आपत्ति जताई। मुरलीधर ने सॉलिसिटर जनरल से 'नक्सली' शब्द वापस लेने की मांग की।
मुरलीधर संगीतकार टी.एम. कृष्णा की ओर से पेश हुए थे। कृष्णा ने राष्ट्रीय सम्मान के अपमान की रोकथाम अधिनियम, 1971 में 2026 के संशोधन और केंद्र सरकार के उन निर्देशों को चुनौती दी है, जिनमें आधिकारिक कार्यक्रमों में वंदे मातरम् के सभी छह अंतरों के गायन का प्रावधान किया गया है।
मामले की सुनवाई चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की खंडपीठ कर रही थी।
मुरलीधर ने कहा- संशोधन जल्दबाजी में पारित किया गया
सुनवाई के दौरान मुरलीधर ने दलील दी कि 2026 का संशोधन पर्याप्त राष्ट्रीय सहमति के बिना जल्दबाजी में पारित किया गया। उन्होंने कहा कि संशोधन में यह भी स्पष्ट नहीं किया गया है कि 'राष्ट्रीय गीत' से क्या अभिप्राय है।
उन्होंने कहा कि ऐसे विषयों पर सार्वजनिक विमर्श और जनमत विकसित होना चाहिए तथा कानून बनाने की प्रक्रिया में ऊपर से नीचे की ओर दृष्टिकोण उचित नहीं है।
सॉलिसिटर जनरल की 'नक्सली' टिप्पणी पर आपत्ति
मुरलीधर की दलील के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा—
“कानून बनाना संविधान के अनुसार होता है। कानून बनाना नक्सलियों के विचार के अनुसार नहीं हो सकता।”
इस पर मुरलीधर ने तुरंत आपत्ति जताई और कहा कि सॉलिसिटर जनरल को इस अभिव्यक्ति को वापस लेना चाहिए।
उन्होंने कहा कि वह इस टिप्पणी पर कड़ी आपत्ति दर्ज कर रहे हैं और एक कानून अधिकारी के लिए इस तरह की भाषा उचित नहीं है।
इस दौरान जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने टिप्पणी की कि मामले में अनावश्यक तनाव और भावनाएं पैदा हो रही हैं।
चीफ जस्टिस ने कहा- संवैधानिक मुद्दे तक सीमित रहें
बहस के दौरान चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने हस्तक्षेप करते हुए कहा कि पीठ केवल संवैधानिक व्याख्या से जुड़े कानूनी मुद्दे की जांच कर रही है और सुनवाई को उसी तक सीमित रखा जाना चाहिए।
मुरलीधर ने कहा कि कानून अधिकारियों से गरिमा और शिष्टाचार की अपेक्षा की जाती है।
इसके बाद पीठ ने केंद्र सरकार से याचिका पर जवाबी हलफनामा दाखिल करने को कहा।
आदेश सुनाए जाने के बाद फिर उठा मुद्दा
आदेश सुनाए जाने के बाद मुरलीधर ने एक बार फिर सॉलिसिटर जनरल की टिप्पणी का मुद्दा उठाया और कहा कि वह उस टिप्पणी के खिलाफ अपना कड़ा विरोध दर्ज कराना चाहते हैं।
जस्टिस बागची ने कहा कि पीठ ने उन टिप्पणियों का संज्ञान नहीं लिया है और वह मामले में संवैधानिक मुद्दे तक ही सीमित रहेगी।
हालांकि, सॉलिसिटर जनरल ने टिप्पणी वापस लेने से इनकार किया। उन्होंने कहा कि वह अपनी बात पर कायम हैं और उन्होंने कानून बनाने की संवैधानिक प्रक्रिया के संदर्भ में यह टिप्पणी की थी।
सीनियर एडवोकेट संजय हेगड़े भी बोले
सुनवाई के दौरान एक अन्य मामले के लिए मौजूद सीनियर एडवोकेट संजय हेगड़े ने कहा—
“अपनी स्वतंत्र सोच रखना नक्सली होना नहीं है।”
इस पर जस्टिस बागची ने कहा कि किसी व्यक्ति को नक्सली कह देने से उसके संवैधानिक अधिकार समाप्त नहीं हो जाते।
हेगड़े ने आगे कहा—
“सोचना नक्सली होना नहीं है।”
सॉलिसिटर जनरल ने स्पष्ट किया कि वह किसी व्यक्ति को नक्सली नहीं कह रहे थे, बल्कि एक विचारधारा के संदर्भ में टिप्पणी कर रहे थे।
जस्टिस बागची ने संवैधानिक अदालतों की भूमिका पर टिप्पणी की
बाद में, अगला मामला शुरू होने के बाद न्यायमूर्ति बागची ने सॉलिसिटर जनरल से कहा कि संवैधानिक अदालतों की विश्वसनीयता इस बात में है कि यहां प्रत्येक व्यक्ति को कानून के अनुसार समान अधिकार और निष्पक्ष सुनवाई मिलती है।
उन्होंने कहा कि संवैधानिक अदालतों में मामलों की सुनवाई कानून के अनुसार होती है और गंभीर आरोपों का सामना करने वाले व्यक्तियों को भी कानून के अनुसार निष्पक्ष सुनवाई का अधिकार प्राप्त है।
सॉलिसिटर जनरल ने जवाब दिया कि उनका मुद्दा ऐसे व्यक्तियों से था जो संवैधानिक तरीके से निर्णय लेने में विश्वास नहीं करते।
न्यायमूर्ति बागची ने फिर स्पष्ट किया कि पीठ ने इन टिप्पणियों को अपने आदेश का हिस्सा नहीं बनाया है।
क्या है पूरा मामला?
यह विवाद टी.एम. कृष्णा की उस याचिका से जुड़ा है, जिसमें उन्होंने राष्ट्रीय सम्मान के अपमान की रोकथाम अधिनियम में 2026 में किए गए संशोधन और वंदे मातरम् के सभी छह अंतरों के गायन से संबंधित केंद्र के निर्देशों को चुनौती दी है।
याचिका में मुख्य सवाल यह उठाया गया है कि क्या धार्मिक कारणों या अंतरात्मा की स्वतंत्रता के आधार पर वंदे मातरम् के कुछ अंतरे नहीं गाने वाले व्यक्ति को आपराधिक कार्रवाई का सामना करना पड़ सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने मामले में केंद्र सरकार से जवाब मांगा है।