जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट ने प्रतिबंधित संगठन जमात-ए-इस्लामी के कथित नेता की निवारक हिरासत को बरकरार रखा

Update: 2023-08-10 11:00 GMT

Jammu and Kashmir and Ladakh High Court

जम्मू एंड कश्मीर हाईकोर्ट ने प्रतिबंध‌ित संगठन जमात-ए-इस्लामी के कथित पूर्व अमीर (नेता) अब्दुल हमीद गनी के ख़िलाफ़ जारी न‌िवारक आदेश को बरकरार रखा है। निवारक आदेश जम्मू-कश्मीर सार्वजनिक सुरक्षा अधिनियम, 1978 के प्रावधानों के तहत 16 सितंबर, 2022 को जिला मजिस्ट्रेट, शोपियां की ओर से पारित किया गया था।

गनी की पत्नी की ओर से दायर याचिका में तर्क दिया गया था कि हिरासत के आधार अस्पष्ट हैं और हिरासत में लेने वाले प्राधिकारी द्वारा भरोसा की गई सामग्री या दस्तावेज उन्हें उपलब्ध नहीं कराए गए थे। याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि हिरासत में लेने वाले प्राधिकारी की पुराने आधारों पर निर्भरता ने आदेश को अस्थिर बना दिया ‌है।

उत्तरदाताओं ने याचिका का पुरजोर विरोध करते हुए तर्क दिया कि सार्वजनिक सुरक्षा अधिनियम के तहत निवारक हिरासत का उद्देश्य व्यक्तियों को राष्ट्र-विरोधी या असामाजिक गतिविधियों में शामिल होने से रोकना है जो सार्वजनिक व्यवस्था को खतरे में डाल सकते हैं।

प्रतिवादी ने तर्क दिया कि हिरासत में लिए गए व्यक्ति के खिलाफ पर्याप्त सबूत थे, जो आतंकवादियों को समर्थन और प्रेरित करने सहित सार्वजनिक व्यवस्था के लिए हानिकारक गतिविधियों में उसकी संलिप्तता का संकेत देते हैं।

दोनों पक्षों की दलीलें सुनने और हिरासत की फाइल को देखने के बाद, अदालत ने कहा कि संबंधित व्यक्ति पीएचडी डिग्री प्राप्‍त है। व‌ह कॉलेज के दिनों से ही जमात-ए-इस्लामी से जुड़े रहे हैं। 2018 में वह कथित रूप से जमात-ए-इस्लामी जम्मू-कश्मीर के "अमीर" के पद तक पहुंच गया और उसने आतंकवादियों को सक्रिय रूप से समर्थन और प्रेरित किया। वह जम्मू-कश्मीर को भारत से अलग करने की दिशा में काम कर रहा है, जिसका लक्ष्य इसे पाकिस्तान में शामिल करना है।

मामले की मेरिट्स पर गौर करते हुए पीठ ने माना कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार संविधान द्वारा गारंटीकृत एक मौलिक अधिकार है, लेकिन यह भी कहा कि निवारक हिरासत व्यक्तियों को उन योजनाओं को क्रियान्वित करने से रोकने के लिए उठाया गया एक उपाय है जो सार्वजनिक सुरक्षा को खतरे में डाल सकती हैं और संविधान स्वयं निवारक निरोध कानून के अधिनियमन की अनुमति देता है।

अदालत ने कहा कि हिरासत में लेने वाले प्राधिकारी की संतुष्टि व्यक्तिपरक है और उपलब्ध सामग्री पर आधारित है और अदालत को हिरासत में लेने वाले प्राधिकारी की व्यक्तिपरक संतुष्टि पर तब तक फैसला नहीं देना चाहिए जब तक कि दुर्भावना का सबूत न हो।

इन विचारों के आधार पर अदालत ने निवारक हिरासत आदेश को बरकरार रखा, जिसमें कहा गया कि बंदी की गतिविधियां सार्वजनिक व्यवस्था के लिए अत्यधिक प्रतिकूल और हानिकारक थीं।

केस टाइटल: अब्दुल हमीद गनी @ डॉ. हमीद फयाज बनाम जम्मू एंड कश्मीर राज्य

साइटेशन: 2023 लाइव लॉ (जेकेएल) 212

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