जांच समिति ने लोकसभा स्पीकर को सौंपी जस्टिस यशवंत वर्मा मामले की रिपोर्ट
लोकसभा स्पीकर द्वारा पूर्व हाईकोर्ट जज जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ लगे आरोपों की जांच के लिए गठित समिति ने अपनी रिपोर्ट लोकसभा स्पीकर ओम बिरला को सौंप दी।
यह रिपोर्ट औपचारिक रूप से 18 मई, 2026 को संसद भवन में सुप्रीम कोर्ट के जज और जजों की जांच समिति के पीठासीन अधिकारी जस्टिस अरविंद कुमार द्वारा सौंपी गई। रिपोर्ट सौंपते समय समिति के अन्य सदस्य बॉम्बे हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस जस्टिस श्री चंद्रशेखर और सीनियर वकील बी.वी. आचार्य भी उनके साथ मौजूद थे।
इस अवसर पर समिति के सचिव श्री गणपति भट और सलाहकार वकील करण उमेश साल्वी तथा समीक्षा दुआ भी उपस्थित थे।
उल्लेखनीय है कि जस्टिस वर्मा ने इस साल अप्रैल में जांच लंबित रहते हुए इस्तीफा दे दिया था।
जांच समिति का गठन 'जजेस (जांच) अधिनियम, 1968' के तहत किया गया था। यह गठन 146 लोकसभा सदस्यों द्वारा हस्ताक्षरित एक महाभियोग प्रस्ताव के बाद किया गया, जिसमें जस्टिस वर्मा को पद से हटाने की मांग की गई।
यह पूरी कार्यवाही 14 मार्च, 2025 को दिल्ली में जस्टिस वर्मा के सरकारी आवास से जुड़े बाहरी कमरे (आउटहाउस) में आग बुझाने के अभियान के दौरान बड़ी मात्रा में बेहिसाब नकदी मिलने के विवादित मामले से जुड़ी है। उस समय जस्टिस वर्मा दिल्ली हाई कोर्ट में जज के तौर पर कार्यरत थे। इस घटना ने बड़े पैमाने पर सार्वजनिक विवाद खड़ा कर दिया था और जवाबदेही तय करने की मांग उठने लगी थी।
इस घटना के तुरंत बाद तत्कालीन चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया संजीव खन्ना ने तीन सदस्यों वाली आंतरिक जांच समिति का गठन किया। इस समिति में पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस जस्टिस शील नागू; हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट के तत्कालीन चीफ जस्टिस जस्टिस जी.एस. संधावालिया; और कर्नाटक हाईकोर्ट की जस्टिस अनु शिवरामन शामिल थीं।
जांच लंबित रहने के दौरान, जस्टिस वर्मा को वापस इलाहाबाद हाईकोर्ट भेज दिया गया और उनसे न्यायिक कार्य वापस ले लिया गया।
इसके बाद आंतरिक समिति ने अपनी रिपोर्ट तत्कालीन चीफ जस्टिस को सौंपी। बताया जाता है कि इस रिपोर्ट में ऐसे प्रथम दृष्टया (Prima Facie) साक्ष्य मिले थे, जो जस्टिस वर्मा की संलिप्तता की ओर इशारा करते थे। जब जस्टिस वर्मा ने इस्तीफा देने की चीफ जस्टिस की सलाह मानने से इनकार कर दिया तो रिपोर्ट को आगे की कार्रवाई के लिए राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को भेज दिया गया।
इस पूरी कार्यवाही के दौरान उन्होंने कई कानूनी चुनौतियां भी पेश की थीं। सुप्रीम कोर्ट ने उनकी उस याचिका को खारिज किया, जिसमें उन्होंने आंतरिक जांच और उन्हें पद से हटाने की सिफारिश को चुनौती दी थी। लोकसभा स्पीकर के उस फैसले को दी गई बाद की चुनौती भी इस साल की शुरुआत में खारिज कर दी गई, जिसके तहत उन्होंने वैधानिक जांच समिति का गठन किया।