दूसरी अपील में तथ्यों के निष्कर्ष में कोई हस्तक्षेप नहीं हो सकता जब तक कि तथ्य के निष्कर्ष विकृत न हों : सुप्रीम कोर्ट

Update: 2020-02-19 03:30 GMT

किसी तथ्य के निष्कर्ष में दूसरी अपील के दौरान तब तक हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता, जब तक कि उन निष्कर्षों को विकृत न किया गया हो। सुप्रीम कोर्ट ने एक मामले की सुनवाई के दौरान यह बात कही।

इस मामले में वादी ने दावा किया कि अपने पिता की मृत्यु के समय वह नाबालिग था और उसके भाइयों ने उससे कुछ दस्तावेज़ों पर हस्ताक्षर करा लिए और उसे नहीं पता था कि उन दस्तावेज़ों में क्या है और न ही उसने कोई दस्तावेज़ी क़रार किया है और न ही उसे यह समझ है कि उन दस्तावेज़ों में क्या है।

अपने नाबालिग़ होने के समर्थन में उसने जो एकमात्र प्रमाण पेश किया है, वह उसका विद्यालय छोड़ने का प्रमाणपत्र (एसएलसी) था। निचली अदालत ने इस मामले को ख़ारिज करते हुए वादी के एसएलसी में जन्म तिथि पर भरोसा नहीं किया क्योंकि इसे स्कूल के हेडमास्टर ने जारी नहीं किया था और वादी ने स्कूल के हेडमास्टर से एसएलसी में दी गई तारीख़ को सत्यापित नहीं कराया था। प्रथम अपीलीय अदालत ने यह भी कहा कि वादी क़रार जिस समय हुआ उस समय नाबालिग नहीं था और इसलिए अपील को ख़ारिज कर दिया।

हाईकोर्ट ने दूसरी अपील पर एकमात्र जिस महत्त्वपूर्ण प्रश्न पर ग़ौर किया वह यह था कि निचली अदालत ने एसएलसी पर ग़ौर करने के बाद जो फ़ैसले दिए हैं उसमें किसी भी तरह की असंवैधानिकता नहीं अपनाई गई है। हाईकोर्ट ने दूसरी अपील पर सुनवाई को राज़ी हो गया।

मामले के तथ्यों पर ग़ौर करते हुए न्यायमूर्ति एसए नज़ीर और न्यायमूर्ति हेमंत गुप्ता की पीठ ने कहा,

भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 74 के तहत इनमें ऐसे दस्तावेज़ शामिल हैं जो आधिकारिक एकक या अधिकरण के रिकॉर्ड में हैं। इस अधिनियम की धारा 76 किसी भी व्यक्ति को यह अधिकार देता है कि वह उचित फ़ीस चुकाकर सार्वजनिक दस्तावेज़ की कॉपी और प्रमाणपत्र प्राप्त कर सकता है, जिसके नीचे यह लिखा होना चाहिए कि यह उस दस्तावेज की सत्यापित प्रतिलिपि है।

दस्तावेज़ की सत्यापित प्रतिलिपि सार्वजनिक दस्तावेज़ के सबूत के रूप में पेश किया जा सकता है। वादी ने इस अपील में प्रमाणपत्र की फ़ोटोकॉपी पेश की है और इस तरह के प्रमाणपत्र में यह नहीं बताता कि यह उक्त दस्तावेज़ की सत्यापित कॉपी है जैसा कि अधिनियम की धारा 76 में प्रावधान किया गया है।

वादी ने अपने पिता द्वारा हस्ताक्षरित विद्यालय छोड़ने का प्रमाणपत्र पेश किया, जिस व्यक्ति ने स्कूल के रजिस्टर में यह जन्म तिथि दर्ज की है या जिस व्यक्ति ने एसएलसी पर उसके पिता के हस्ताक्षर को सत्यापित किया है उससे पूछताछ नहीं की गई है। स्कूल का कोई अधिकारी या किसी अन्य व्यक्ति ने उसके पिता के हस्ताक्षर को सत्यापित नहीं किया है।

ख़ुद के दिए बयान के अलावा इस तरह के साक्ष्य नहीं हैं कि स्कूल के रजिस्टर में संबंधित अधिकारी ने जन्म तिथि दर्ज की है क्योंकि सिर्फ़ इसी वजह से भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 35 के तहत इसे साक्ष्य के रूप में स्वीकार किया जा सकता है। हाईकोर्ट को किसी और साक्ष्य से इस प्रमाणपत्र की सत्यता का पता नहीं चला है।

हाईकोर्ट के फ़ैसले को निरस्त करते हुए पीठ ने कहा,

"दोनों ही अदालतें, निचली और प्रथम अपीलीय अदालत ने विद्यालय छोड़ने के प्रमाणपत्र की जांच की है और बताया है कि जन्मतिथि का इस प्रमाणपत्र से सत्यापन नहीं होता।

हो सकता है कि हाईकोर्ट निचली अदालत के रूप में इससे अलग राय व्यक्त करती पर एक बार जब दो अदालतों ने जो राय दी है वह किसी ठोस साक्ष्य को ग़लत पढ़े जाने के कारण नहीं है और न ही इसे क़ानून के किसी प्रवधान के तहत दर्ज किया गया है, न ही यह कहा जा सकता कि उचित तरीक़े और तार्किक ढंग से काम करने वाला जज इस तरह की राय नहीं दे सकता, तो यह नहीं कहा जा सकता कि हाईकोर्ट ने ग़लती की है। परिणामस्वरूप, हाईकोर्ट के समक्ष क़ानून का कोई बड़ा मुद्दा खड़ा नहीं हुआ।

इस तरह हम पाते हैं कि हाईकोर्ट ने निचली अदालत ने जो तथ्य उद्घाटित किए थे और जिसको प्रथम अपीलीय अदालत ने सही माना था, उसमें हस्तक्षेप करके ग़लती की…हाईकोर्ट को तथ्यों में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए था।"

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