"पैशाचिक और क्रूर": दिल्ली हाईकोर्ट ने तीन साल की बच्‍ची से सामूहिक बलात्कार और हत्या के तीन दोषियों को आजीवन कारावास की सजा दी

Update: 2022-06-07 09:58 GMT

दिल्ली हाईकोर्ट

दिल्ली हाईकोर्ट ने तीन साल की नाबालिग बच्ची के सामूहिक बलात्कार और हत्या के मामले में तीन लोगों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई हैञ कोर्ट ने कहा अपराध पैशाचिक और क्रूर तरीके से किया गया था।

तीनों की दोषसिद्धि को बरकरार रखते हुए जस्टिस मुक्ता गुप्ता और जस्टिस मिनी पुष्कर्ण की खंडपीठ ने भारतीय दंड संहिता की धारा 376 (2) और 302 के तहत आजीवन कारावास की सजा सुनाते हुए अपने अपीलीय अधिकार क्षेत्र का प्रयोग किया।

यह देखा गया कि मामले के तथ्यों में शेष जीवन के लिए आजीवन कारावास एक उपयुक्त सजा होगी।

अभियोजन का मामला यह था कि छह जनवरी, 2012 को एक एफआईआर की गई थी, जिसमें बताया गया था कि शहर के रमेश नगर में लगभग 3-4 साल की लड़की का शव मिला था। शव एमसीडी के सफाईकर्मी को मिला था, जिसने नाले की सफाई के दौरान उसे निकाला। उसी की पहचान बाद में नाबालिग के पिता ने की।

पीड़िता की पोस्टमॉर्टम जांच से पता चला है कि उसके साथ दुष्कर्म किया गया था, जिससे उसके न‌िजी अंग में घाव हो गए थे। उसकी गला घोंटकर हत्या कर दी गई थी। जिसके बाद ट्रायल कोर्ट ने तीनों अभियुक्तों को शेष जीवन के लिए आजीवन कारावास की सजा सुनाई।

16 अक्टूबर, 2020 के फैसले के तहत, ट्रायल कोर्ट ने तीन लोगों को आईपीसी की धारा 376(2) (जी), 377, 302 और 201 के तहत अपराधों के लिए दोषी ठहराया था।

विशेष न्यायाधीश, पॉक्सो ने उन्हें धारा 302 और 376(2) (g) आईपीसी के तहत दंडनीय अपराधों के लिए आजीवन कारावास की सजा भुगतने का आदेश किया था। साथ ही उन्हें धारा 377 आईपीसी के तहत अपराध के लिए 10 साल के साधारण कारावास, धारा 201 आईपीसी के तहत अपराध के लिए धारा 5 साल के साधारण कारावास की सजा दी गई थी। इसके अलावा दोषियों में से एक जमाहिर को धारा 363 आईपीसी के तहत 5 साल के कारावास की सजा सुनाई गई थी।

इस प्रकार तीनों दोषियों ने अपील में हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

हाईकोर्ट के समक्ष प्रश्न यह था कि क्या ऐसे मामले में जहां ट्रायल कोर्ट द्वारा आजीवन कारावास की सजा दी गई है, हाईकोर्ट अपने अपीलीय अधिकार क्षेत्र का प्रयोग करते हुए निर्देश दे सकता है कि आजीवन कारावास शेष जीवन या एक निश्चित अवधि के लिए होगा।

कोर्ट ने कहा कि हालांकि ट्रायल कोर्ट दोषियों के शेष प्राकृतिक जीवन के लिए आजीवन कारावास की सजा नहीं दे सकता था, हाईकोर्ट हालांकि अपने अपीलीय अधिकार क्षेत्र का प्रयोग करते हुए उक्त आदेश को खारिज कर सकता है, लेकिन मामले के तथ्यों पर विचार करते हुए उसकी सजा को दे सकता है।

यह देखते हुए कि ट्रायल कोर्ट द्वारा मौत की सजा नहीं दी गई थी, कोर्ट ने कहा कि आजीवन कारावास की सजा जो आमतौर पर छूट के बाद चौदह साल तक होगी, पीड़ित के लिए अत्यधिक अपर्याप्त, अन्यायपूर्ण और अनुचित होगी।

अदालत ने कहा,

"मौजूदा मामले में, तीन अपीलकर्ताओं को सामूहिक बलात्कार और 3 साल की नाबालिग की हत्या के लिए दोषी ठहराया गया है, जिन्होंने उसके निजी अंगों को बेरहमी से काट दिया था और उसकी हत्या कर दी था।" 


इसलिए, कोर्ट ने कहा कि अपीलकर्ताओं को शेष आजीवन कारावास मामले के तथ्यों में एक उपयुक्त सजा होगी। तदनुसार अपीलों का निराकरण किया गया।

केस टाइटल: जमाहिर उर्फ ​​जवाहर बनाम राज्य सरकार एनसीटी दिल्ली

साइटेशन: 2022 लाइव लॉ (दिल्ली) 547

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