दिल्ली कोर्ट ने X कॉर्प (पहले ट्विटर) की यूज़र करिश्मा अज़ीज़ के ख़िलाफ़ FIR दर्ज करने का निर्देश दिया। उन पर हिंदू धर्म, हिंदू धार्मिक हस्तियों, ऐतिहासिक हस्तियों और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बारे में कई अपमानजनक पोस्ट करने का आरोप है।

पटियाला हाउस कोर्ट के चीफ ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट मृदुल गुप्ता ने वकील अमिता सचदेवा की अर्ज़ी को मंज़ूरी दी। यह अर्ज़ी भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 की धारा 175(3) के तहत दायर की गई, जिसमें FIR दर्ज करने और जांच की मांग की गई।

सचदेवा ने आरोप लगाया कि अज़ीज़ ने फरवरी और अप्रैल 2025 के बीच कई पोस्ट और वीडियो पब्लिश किए, जिनमें हिंदू धार्मिक मान्यताओं और हस्तियों, प्रधानमंत्री मोदी, छत्रपति शिवाजी महाराज और स्वतंत्रता सेनानी वीर सावरकर का अपमान किया गया। साथ ही उन पर सांप्रदायिक अशांति फैलाने की कोशिश करने का भी आरोप है।

उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि कुछ पोस्ट में मुगल शासक औरंगज़ेब की तारीफ़ की गई और हिंदू ऐतिहासिक हस्तियों को नीचा दिखाया गया।

साकेत के साइबर पुलिस स्टेशन (दक्षिण) ने अपनी स्टेटस रिपोर्ट में कहा कि पोस्ट में अश्लीलता, हिंदू धर्म को सीधे निशाना बनाने वाली सामग्री और राजनीतिक या ऐतिहासिक टिप्पणी, आलोचना और व्यंग्य शामिल हैं। पुलिस ने कहा कि उसकी जांच में सांप्रदायिक अशांति भड़काने की जानबूझकर की गई कोशिश का कोई सबूत नहीं मिला।

हालांकि, अदालत ने कहा कि BNSS की धारा 175(3) के तहत शक्तियों का इस्तेमाल सोच-समझकर किया जाना चाहिए, लेकिन FIR दर्ज करने का निर्देश तब दिया जा सकता है, जब शिकायत से पहली नज़र में ही संज्ञेय अपराध (Cognizable Offence) का पता चले और शिकायतकर्ता की पहुंच से बाहर के सबूत इकट्ठा करने के लिए जांच ज़रूरी हो।

अदालत ने कहा कि इस चरण में आरोपों की सच्चाई की बारीकी से जांच करने या आरोपी की आपराधिक जवाबदेही के बारे में कोई पक्का निष्कर्ष निकालने की ज़रूरत नहीं है।

अदालत ने गौर किया कि शिकायत किसी एक बयान तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें कुछ समय के दौरान पब्लिश किए गए कई पोस्ट का ज़िक्र था। इन पोस्ट में कथित तौर पर हिंदू धार्मिक मान्यताओं, सम्मानित धार्मिक हस्तियों और हिंदू समुदाय से जुड़ी ऐतिहासिक हस्तियों के ख़िलाफ़ अपमानजनक बातें कही गईं। साथ ही ऐसी बातें भी हैं, जिनसे सांप्रदायिक अशांति फैलने की आशंका है।

कोर्ट ने कहा,

"सवाल यह है कि क्या जिन पोस्ट पर आपत्ति जताई गई, वे असल में सुरक्षित राजनीतिक टिप्पणी, व्यंग्य, आलोचना या ऐतिहासिक राय हैं, या फिर शिकायतकर्ता द्वारा बताए गए प्रावधानों के तहत वे अपराध की श्रेणी में आते हैं; यह जांच का विषय है।"

कोर्ट ने यह भी कहा कि संबंधित सोशल मीडिया अकाउंट को कौन चलाता है, अपलोड किए गए वीडियो और पोस्ट की प्रकृति क्या है, उन्हें कैसे फैलाया गया और अन्य इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड—इन सभी मामलों की जांच करके सबूत इकट्ठा करने और उन्हें सुरक्षित रखने की ज़रूरत है।

कोर्ट ने कहा,

"ऐसे सबूत पूरी तरह से शिकायतकर्ता की पहुंच में नहीं हैं।"

कोर्ट ने माना कि आरोपों, रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री और ज़रूरी सबूतों की प्रकृति को देखते हुए शिकायत से ऐसे संज्ञेय अपराधों (Cognizable Offences) का पता चलता है जिनकी जांच ज़रूरी है।

कोर्ट ने यह भी साफ़ किया कि वह इस चरण में आरोपों की सच्चाई या मेरिट पर कोई राय नहीं दे रहा है।

इसके बाद कोर्ट ने अर्ज़ी मंज़ूर की और साइबर पुलिस स्टेशन के SHO को निर्देश दिया कि वह शिकायत के आधार पर FIR दर्ज करें और कानून के अनुसार जांच करें।

SHO को निर्देश दिया गया कि वह एक हफ़्ते के भीतर कोर्ट में अनुपालन रिपोर्ट (Compliance Report) दाखिल करें।

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