इलाहाबाद हाईकोर्ट ने नोएडा पुलिस द्वारा एक व्यक्ति को कथित तौर पर एफआईआर दर्ज होने से पहले हिरासत में लेने और बाद में उसी मामले में गिरफ्तार दिखाने पर कड़ी नाराजगी जताई है। कोर्ट ने हिरासत को अवैध मानते हुए बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका मंजूर कर ली और याचिकाकर्ता को तत्काल रिहा करने का आदेश दिया।

जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस अचल सचदेव की डिवीजन बेंच ने सुनवाई के दौरान गौतम बुद्ध नगर कमिश्नरेट के एसीपी और एसएचओ से कहा—“शर्म आनी चाहिए आपको।”

कोर्ट ने यह भी टिप्पणी की कि राज्य में पुलिस की स्थिति अस्त-व्यस्त है और अधिकारी सोचते हैं कि वे कुछ भी कर सकते हैं और बच निकलेंगे।

FIR से पहले ही हिरासत में लिया गया

मामला गौतम बुद्ध नगर के फेज-2 थाने में दर्ज मामले से जुड़ा है। याचिकाकर्ता दीपक ने अपनी हिरासत और गिरफ्तारी को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट का रुख किया था।

पुलिस रिकॉर्ड के अनुसार, 23 अगस्त 2026 को शाम 7:34 बजे दीपक और चार अन्य लोगों को भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धाराओं 126, 135 और 170 के तहत हिरासत में लिया गया।

लेकिन संबंधित केस क्राइम नंबर 370 की एफआईआर उसी दिन रात 9:39 बजे शिव राम शर्मा की लिखित शिकायत के आधार पर दर्ज हुई।

इस तरह पुलिस रिकॉर्ड के अनुसार दीपक को एफआईआर दर्ज होने से पहले ही हिरासत में लिया जा चुका था। बाद में उसी एफआईआर में उसे औपचारिक रूप से गिरफ्तार दिखाया गया, जबकि वह पहले से पुलिस की हिरासत में था।

FIR में नाम और भूमिका का भी सवाल

याचिकाकर्ता का कहना था कि एफआईआर में कई लोगों के नाम थे, लेकिन दीपक का नाम नहीं था और उसके खिलाफ कोई विशिष्ट भूमिका भी नहीं बताई गई थी।

हाईकोर्ट के सामने यह भी सवाल उठा कि उसे हिरासत में लेने की प्रक्रिया कानूनी रूप से सही थी या नहीं।

हिरासत के बाद जारी हुआ धारा 130 का नोटिस

मामले में BNSS की धारा 130 के तहत जारी नोटिस का समय भी महत्वपूर्ण रहा।

आरोप है कि कार्यकारी मजिस्ट्रेट ने यह नोटिस 24 अगस्त को जारी किया, जबकि दीपक को एक दिन पहले ही हिरासत में लिया जा चुका था।

5 अक्टूबर को हाईकोर्ट ने इस पर सवाल उठाते हुए कहा था—

“जो नोटिस व्यक्ति को BNSS की धाराओं 126 और 170 के तहत हिरासत में लेने से पहले जारी होना चाहिए था, वह हिरासत में लेने के बाद कैसे जारी किया गया?”

कोर्ट ने इस सवाल का जवाब देने के लिए संबंधित एसीपी को व्यक्तिगत रूप से पेश होने और धाराओं 126, 135 और 170 के तहत हुई पूरी कार्यवाही से जुड़े दस्तावेज पेश करने का निर्देश दिया था।

पुलिस ने जमानत बांड की प्रक्रिया भी ठीक से दर्ज नहीं की

आज की सुनवाई में डीएसपी कमलेश कांत (एसीपी-2, सेंट्रल नोएडा) अदालत में पेश हुए।

कोर्ट ने पुलिस द्वारा जमानत बांड की प्रक्रिया दर्ज करने के तरीके पर भी सवाल उठाया। अदालत ने पाया कि पुलिस रिकॉर्ड में यह दर्ज नहीं था कि याचिकाकर्ता से पूछा गया हो कि वह कितनी राशि का जमानत बांड देने को तैयार है।

गिरफ्तारी रिकॉर्ड में भी कोई निश्चित राशि दर्ज नहीं थी।

इस पर कोर्ट ने पुलिस अधिकारियों के प्रति नाराजगी जताते हुए कहा— “शर्म आनी चाहिए आपको।”

वकील से मिलने के अधिकार की जानकारी भी नहीं दी गई

हाईकोर्ट ने यह भी नोट किया कि गिरफ्तारी करने वाले अधिकारी ने गिरफ्तार किए गए व्यक्तियों को पूछताछ के दौरान अपनी पसंद के वकील से मिलने के अधिकार के बारे में जानकारी नहीं दी थी।

हाईकोर्ट ने रिहाई का आदेश दिया

याचिकाकर्ता की ओर से आरोप लगाया गया था कि दीपक 23 अगस्त से पुलिस की हिरासत में था और 24 अगस्त को उसकी रिहाई का आदेश पारित होने के बावजूद उसे वास्तव में रिहा नहीं किया गया।

इसके बजाय वह पुलिस की वास्तविक हिरासत में बना रहा और बाद में उसे केस क्राइम नंबर 370 में गिरफ्तार दिखाया गया।

याचिका में गिरफ्तारी दस्तावेजों में भी विसंगतियों का आरोप लगाया गया था। मसलन, गिरफ्तारी मेमो में गिरफ्तारी की तारीख 24 अगस्त दर्ज थी, जबकि उस पर 23 अगस्त की तारीख/हस्ताक्षर होने का दावा किया गया।

याचिकाकर्ता ने यह भी दलील दी कि बाद में पारित रिमांड आदेश किसी अवैध गिरफ्तारी को अपने आप वैध नहीं बना सकता।

मामले के रिकॉर्ड और पुलिस की कार्रवाई में सामने आई विसंगतियों को देखते हुए हाईकोर्ट ने बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका स्वीकार कर ली और दीपक को तत्काल रिहा करने का आदेश दिया।

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