'सिर्फ़ सिग्नेचर में अंतर से OMR के साथ छेड़छाड़ साबित नहीं होती': पटना हाईकोर्ट ने NEET उम्मीदवारों की याचिकाएं खारिज कीं
पटना हाईकोर्ट ने कहा कि उम्मीदवार के एडमिट कार्ड और OMR आंसर शीट पर मौजूद सिग्नेचर में सिर्फ़ अंतर होने से यह साबित नहीं होता कि OMR शीट के साथ छेड़छाड़ की गई या उसे बदल दिया गया। ऐसा तब और भी लागू होता है, जब परीक्षा अथॉरिटी ओरिजिनल OMR रिकॉर्ड पेश करती है और हेरफेर का कोई ठोस सबूत नहीं होता।
जस्टिस हरीश कुमार की सिंगल जज बेंच संविधान के आर्टिकल 226 के तहत NEET-UG 2026 उम्मीदवारों की उन याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी, जिनमें नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (NTA) द्वारा रखे गए मार्क्स और OMR आंसर शीट को चुनौती दी गई।
याचिका में उम्मीदवार ने दावा किया कि उसने 720 में से 622 मार्क्स हासिल किए थे और GEN-EWS कैटेगरी में 2500वीं रैंक पाई थी, लेकिन बाद में उसके मार्क्स घटाकर 81 कर दिए गए, जिससे उसकी कैटेगरी रैंक गिरकर 143568 हो गई। उसने अपने परसेंटाइल मार्क्स की दोबारा गिनती/वेरिफिकेशन और अपनी ओरिजिनल OMR और आंसर शीट पेश करने की मांग की।
एक और संबंधित मामले में याचिकाकर्ता ने दावा किया कि मूल्यांकन के दौरान उसकी OMR शीट बदल दी गई। उसने बताया कि उसने 180 में से 169 सवालों के जवाब दिए और उसे लगभग 560 मार्क्स मिलने की उम्मीद थी, लेकिन NTA की वेबसाइट पर OMR अपलोड होने के बाद उसने पाया कि कथित तौर पर सिर्फ़ 33 सवालों के लिए मार्क्स दिए गए।
याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया कि उनके स्कोरकार्ड में शुरू में काफ़ी ज़्यादा मार्क्स दिख रहे थे, जिन्हें बाद में कम कर दिया गया। उन्होंने OMR शीट की असलियत पर भी शक जताया और उनके बदले जाने या उनमें बदलाव किए जाने की संभावना का आरोप लगाया।
यह देखते हुए कि याचिकाकर्ता युवा NEET उम्मीदवार थे और उनका एकेडमिक करियर दांव पर था, कोर्ट ने 17.08.2026 को NTA को उनकी ओरिजिनल OMR शीट पेश करने का निर्देश दिया। इसके बाद NTA ने 27.08.2026 को सीलबंद लिफाफों में ओरिजिनल OMR शीट पेश कीं। जब कोर्ट में सीलबंद लिफाफे खोले गए तो याचिकाकर्ताओं ने OMR शीट की असलियत पर सवाल उठाए और कहा कि जो शीट पेश की गई हैं, वे उनकी नहीं हैं। उन्होंने OMR शीट पर मौजूद हस्ताक्षरों पर भी सवाल उठाए।
हालांकि, कोर्ट ने असली OMR शीट की जांच की और पाया कि उनमें उम्मीदवारों के रोल नंबर, टेस्ट बुकलेट नंबर, आंसर शीट नंबर, OMR कोड, नाम, हस्ताक्षर, अंगूठे के निशान, माता-पिता के नाम, इनविजिलेटर के हस्ताक्षर और उम्मीदवारों द्वारा दिए गए उत्तर शामिल थे।
कोर्ट ने कहा कि राष्ट्रीय प्रवेश परीक्षा एक "भरोसे पर आधारित प्रशासनिक प्रक्रिया" है और परीक्षा अधिकारियों को फिजिकल और इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड को सुरक्षित रखने, OMR की कस्टडी, स्कैनिंग, डेटाबेस कंट्रोल और ऑडिट की सुविधा के लिए मजबूत सिस्टम बनाए रखना चाहिए। साथ ही कोर्ट ने कहा कि न्यायिक हस्तक्षेप केवल आशंका के आधार पर नहीं किया जा सकता, खासकर तब जब परीक्षा के असली रिकॉर्ड पेश किए गए हों और उनमें छेड़छाड़ का कोई ठोस सबूत न हो।
एडमिट कार्ड और OMR शीट पर अपने हस्ताक्षरों में अंतर के आधार पर उम्मीदवारों के दावों पर कोर्ट ने कहा:
"यह ध्यान रखना सही और प्रासंगिक है कि किसी व्यक्ति की लिखावट और हस्ताक्षरों में स्वाभाविक रूप से बदलाव हो सकते हैं। हस्ताक्षर करते समय व्यक्ति की शारीरिक और भावनात्मक स्थिति भी ऐसे बदलावों का कारण बन सकती है।"
कोर्ट ने आगे कहा:
"इसलिए हस्ताक्षरों में ऐसे बदलाव अपने आपमें इस बात का आधार नहीं बन सकते कि OMR आंसर शीट के साथ छेड़छाड़ की गई थी या उन्हें बदल दिया गया था।"
कोर्ट ने यह भी गौर किया कि तीन याचिकाकर्ताओं में से दो ने NTA द्वारा तय समय-सीमा के भीतर OMR आंसर शीट को चुनौती नहीं दी। साथ ही किसी भी याचिकाकर्ता ने ऐसी OMR शीट डाउनलोड नहीं की थी जिसे वे उसी समय सही साबित कर सकें।
कोर्ट ने राष्ट्रीय प्रतियोगी परीक्षा से जुड़े मामलों में न्यायिक संयम बरतने की ज़रूरत पर ज़ोर दिया और कहा कि केवल व्यक्तिगत आशंका के आधार पर हस्तक्षेप करने से परीक्षा प्रक्रिया की निश्चितता, पवित्रता और अंतिम स्वरूप पर असर पड़ सकता है।
कोर्ट ने कहा:
"बिना ठोस सबूत के केवल किसी व्यक्ति की आशंका के आधार पर मूल्यांकन प्रक्रिया में न्यायिक हस्तक्षेप करने से परीक्षा प्रणाली की निश्चितता, पवित्रता और अंतिम स्वरूप पर बुरा असर पड़ेगा।"
NTA के रिकॉर्ड पर शक करने या मनमानी, गैर-कानूनी काम, बुरी नीयत या प्रक्रिया में गड़बड़ी साबित करने के लिए कोई ठोस आधार न मिलने पर, कोर्ट ने रिट याचिकाओं को खारिज किया।
कोर्ट ने साफ़ किया कि अगर याचिकाकर्ता OMR शीट की असलियत पर सवाल उठाते रहते हैं तो तथ्यों से जुड़े ऐसे विवादित मामलों के निपटारे के लिए सक्षम सिविल कोर्ट की ज़रूरत होगी, जिसमें गवाहों और दस्तावेज़ी सबूतों की जांच शामिल होगी।
मामला समाप्त करते हुए कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं को शुभकामनाएं दीं और कहा:
“इन मामलों को समाप्त करने से पहले यह कोर्ट याचिकाकर्ताओं को शुभकामनाएं देता है और उम्मीद करता है कि वे अगली परीक्षा में शानदार सफलता हासिल करेंगे; और/या उनके जीवन में कुछ और भी बेहतर होगा जो उनके लिए पहले से तय है।”
Case Title : Pawani Prabha v. Union of India and Ors (and connected matters)