कंसेट डिक्री को तब तक संशोधित/बदला नहीं जा सकता जब तक कि गलती सर्वविदित या स्पष्ट न हो: सुप्रीम कोर्ट

Update: 2022-02-05 16:52 GMT

सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने माना है कि एक सहमति के निर्देश ( consent decree) को तब तक संशोधित/ परिवर्तित नहीं किया जा सकता है, जब तक कि गलती एक सर्वविद‌ित या स्पष्ट गलती न हो या फिर, सहमति की डिक्री के लिए एक पक्ष द्वारा गलती/गलतफहमी के आधार पर हर सहमति की डिक्री को बदलने की मांग की जा रही है।

जस्टिस एल नागेश्वर राव और जस्टिस बीआर गवई की पीठ ने हाईकोर्ट के एक आदेश के खिलाफ अपील के निस्तारण के दरमियान यह टिप्‍पणी की। हाईकोर्ट के आदेश में सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 की धारा 152 और 153 सहपठित धारा 151 के तहत एक आवेदन को खारिज कर दिया, जिसमें 03.07.2019 के निर्णये को संशोधित करने की मांग की गई थी।

हाईकोर्ट ने इससे पहले सेटलमेंट एग्रीमेंट के तहत मुकदमे का फैसला सुनाया था। इसके बाद, अपीलकर्ता द्वारा सीपीसी की धारा 152 और 153 सहपठित धारा 151 के तहत सुधार/शुद्धि/ निर्णय में संशोधन के लिए एक आवेदन दायर किया गया था। अपीलकर्ता ने उक्त आवेदन में कहा है कि सेटलमेंट एग्रीमेंट केवल ट्रेडमार्क "FX-991ES PLUS'/'FX-991" से संबंधित है। हालांकि, सेटलमेंट एग्रीमेंट में ट्रेडमार्क के रूप में "FX-991ES PLUS/FX/991" टंकण त्रुटि थी। हाईकोर्ट ने अर्जी खारिज कर दी थी।

सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने यह जांच करने के लिए पक्षकारों की प्रस्तुतियों पर विचार किया कि क्या सीपीसी की आदेश 23 नियम 3 सहपठित धारा 151 के प्रावधान के तहत आवेदन को एक मानकर अपीलकर्ता ने डिक्री के संशोधन के लिए मामला बनाया है।

"सहमति द्वारा एक निर्णय का उद्देश्य पक्षकारों के बीच मुकदमेबाजी को रोकना है, जैसे कि एक लंबी खींची लड़ाई के अंत में कोर्ट के निर्णय के परिणामस्वरूप एक फैसला। एक कॉम्प्रोमाइज डिक्री निर्णय द्वारा एक विबंधन बनाता है। एक कंसेट (सहमति) डिक्री एक विबंधन के रूप में कार्य नहीं करेगी, जहां कॉम्प्रोमाइज धोखाधड़ी, गलत बयानी या गलती से दूषित हो गया था। न्यायालय अपनी अंतर्निहित शक्ति का प्रयोग करते हुए यह सुनिश्चित करने के लिए कंसेट (सहमति) डिक्री में सुधार कर सकता है कि यह लिपिक या अंकगणितीय त्रुटियों से मुक्त है....."

अदालत ने कहा कि प्रतिवादी की ओर से धोखाधड़ी या गलत बयानी का कोई आरोप नहीं है।

"हम अपीलकर्ता से सहमत होने में असमर्थ हैं कि गलतफहमी के कारण सेटलमेंट एग्रीमेंट में प्रवेश करते समय एक गलती हुई थी। पार्टियों के अधिवक्ताओं के बीच पत्राचार, जो कानून के विशेषज्ञ हैं, यह दर्शाता है कि कोई अस्पष्टता या स्पष्टता की कमी नहीं है जो किसी भी गलतफहमी को जन्म दे रही है....।

अपील को खारिज करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखा।

केस शीर्षक: अजंता एलएलपी बनाम कैसियो कीसंकी कबुशिकी कैशा डी/बी/ए कैसियो कंप्यूटर कंपनी लिमिटेड

सिटेशन: 2022 लाइव लॉ (एससी) 127

केस नंबर: सीए 1052 ऑफ 2022| 4 फरवरी 2022

कोरम: जस्टिस एल नागेश्वर राव और जस्टिस बीआर गवई

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