प्रतिस्पर्धा कानून| धारा 26 के तहत जांच का आदेश पार्टियों के अधिकारों को प्रभावित नहीं करता, सुनवाई का अवसर अनिवार्य नहीं: गुजरात हाईकोर्ट

Update: 2022-09-13 05:21 GMT

गुजरात हाईकोर्ट

गुजरात हाईकोर्ट ने माना कि प्रतिस्पर्धा अधिनियम की धारा 26 के तहत जांच का आदेश केवल एक प्रथम दृष्टया राय है। यह किसी भी व्यक्ति के अधिकारों को प्रभावित नहीं करता है।

इस प्रकार यह माना गया कि कोर्ट ऐसे आदेश पर पुनर्विचार नहीं कर सकता, जब तक कि यह नहीं दिखाया गया हो कि यह अधिनियम के प्रावधानों के विपरीत है या आदेश में अप्रासंगिक सामग्री शामिल है या प्रासंगिक सामग्री शामिल नहीं है।

जस्टिस एपी ठाकर ने कहा कि जांच के लिए कोई भी आदेश पारित करने के स्तर पर, संबंधित व्यक्ति के किसी भी अधिकार का उल्लंघन नहीं होता और ऐसा व्यक्ति दावा नहीं कर सकता कि उस स्तर पर उसे सुनवाई का अधिकार प्रदान किया जाए।

कोर्ट ने कहा,

"जांच अधिकारी यानी महानिदेशक की ओर से रिपोर्ट प्रस्तुत होने के बाद, संबंधित व्यक्ति, जिसके खिलाफ कोई रिपोर्ट की जाती है, उसे भी आयोग के समक्ष अपना पक्ष रखने का अवसर दिया जाएगा।

उस स्तर पर, यदि सुनवाई का कोई अवसर नहीं दिया जाता है तो निश्चित रूप से संबंधित व्यक्ति, जिसके खिलाफ प्रतिकूल आदेश पारित किया गया है, उसे विभिन्न आधारों पर आदेश को चुनौती देने का पूरा अधिकार है। उन आधारों में एक प्राकृतिक न्याय का उल्लंघन हो सकता है।"

मामला

हाईकोर्ट कुछ निजी कंपनियों की ओर से दायर याचिकाओं के एक समूह की सुनवाई कर रहा था। कपंनियां गुजरात स्टेट बोर्ड ऑफ स्कूल टेक्स्ट बुक्स द्वारा जारी एक टेंडर में बिडर थीं, हालांकि प्रतिस्पर्धा आयोग उनकी जांच कर रहा था।

याचिकाकर्ताओं की दलील थी कि सीसीआई के आदेश ने धारा 26(1) की आवश्यकताओं का अनुपालन नहीं किया गया है, क्योंकि यह उनके खिलाफ प्रथम दृष्टया मामला बनाने के लिए ठोस कारण प्रदान करने में विफल रहा है।

उन्होंने सीसीआई बनाम स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड पर, इस बात पर जोर देने के लिए भरोसा रखा था कि धारा 26(1) के तहत रिकॉर्ड के आधार पर एक राय बनाई जानी चाहिए।

अधिनियम की धारा 3(1) की ओर यह कहने के लिए ध्यान आकर्षित किया गया कि सफल पार्टियों के बीच माल और सेवाओं की आपूर्ति के संबंध में कोई समझौता मौजूद नहीं था, जो प्रतिस्पर्धा पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकता था। इस प्रकार बिड‌िंग (बोली) में हेराफेरी/मिलीभगत के आरोपों को निराधार हैं।।

इसके विपरीत, पार्टी-इन-पर्सन, जिसके कहने पर सीसीआई ने आदेश पारित किया था, उसने प्रस्तुत किया कि निजी याचिकाकर्ताओं के बीच एक कार्टेल था क्योंकि बिडर्स ने एक से अधिक बोलियां कोट की थी और सीसीआई आधारित गणितीय गणना के लिए आवश्यक डेटा प्रदान किया गया था।

एएसजी ने प्रस्तुत किया था कि आक्षेपित आदेश को चुनौती देना उस आदेश के खिलाफ अपील के बराबर है, अनुच्छेद 226 के तहत जिस पर न्यायिक पुनर्विचार की आवश्यकता नहीं है।

धारा 26 (1) आदेश के स्तर पर कार्यवाही की प्रकृति न्यायिक नहीं थी और इस स्तर पर वे चुनौती नहीं दे सकते थे।

धारा 26(1) आदेश केवल 'जांच को ट्रिगर' करने के लिए था, जैसा कि सीसीआई बनाम ग्रासिम इंडस्ट्रीज लिमिटेड के आदेश में बताया गया है। एएसजी ने यह भी तर्क दिया कि याचिकाकर्ता सीसीआई द्वारा आदेशित जांच से बचने की कोशिश कर रहे थे।

अधिनियम की धारा 2 (बी) का अवलोकन करते हुए हाईकोर्ट ने कहा, कार्टेल के गठन या अरेंजमेंट का पेटेंट एविडेंस नहीं हो सकता है, लेकिन सीसीआई इस पर प्रथम दृष्टया राय बना सकती है। साथ ही आयोग को धारा 19 के तहत समझौतों और प्रमुख स्थिति की जांच करने का अधिकार है। यह शक्ति प्रशासनिक है और प्रकृति में न्यायिक नहीं है।

इसके अलावा, इस तरह की प्रशासनिक कार्रवाई में हस्तक्षेप की अनुमति नहीं है जैसा कि तय सिद्धांत है। धारा 26(1) की चर्चा करते हुए जस्टिस ठाकर ने स्पष्ट किया कि आयोग एक पक्षीय अंतरिम निषेधाज्ञा पारित करने में अपने अधिकार क्षेत्र के भीतर है, बशर्ते यह प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन न हो।

यह कार्य भी प्रारंभिक चरण में किया गया जांच और नियामक प्रकृति का है। कार्य भी एक प्रारंभिक उपाय है और निर्णय लेने की प्रक्रिया के विपरीत है।

अधिनियम की धारा 26(1) की प्रकृति को ध्यान में रखते हुए हाईकोर्ट ने कहा,

"जैसा कि विभिन्न निर्णयों में देखा गया है, यह आयोग का विशेषाधिकार है कि वह किसी व्यक्ति को आमंत्रित करे या किसी व्यक्ति से प्रथम दृष्टया राय बनाने के लिए जानकारी मांगे कि क्या अधिनियम की धारा 26 (1) के तहत विचार की गई कोई जांच आवश्यक है या नहीं। आयोग की इस तरह की कार्रवाई को पक्षपातपूर्ण या किसी अन्य व्यक्ति को अधिकार देना नहीं कहा जा सकता है, जिसके खिलाफ जांच का आदेश पारित किया गया है।"

इस प्रकार, सभी याचिकाएं खारिज कर दी गईं और अदालत ने याचिकाकर्ताओं को दंड कार्रवाई शुरू करने के लिए आयोग द्वारा जारी नोटिस का जवाब देने के लिए चार सप्ताह का समय दिया।

केस नंबर: C/SCA/11152/2020

केस टाइटल: मेसर्स श्री शिवम निगम अपने एकमात्र मालिक श्री प्रहलाद दुर्लभजीभाई जोशी के माध्यम से बनाम भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग


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