41 साल से अधिक समय जेल में गुजार चुके नेपाली व्यक्ति के लिए मुआवजा: कलकत्ता उच्च न्यायालय ने राज्य की प्रतिक्रिया मांगी

Update: 2021-03-23 06:38 GMT

लगभग 41 साल हिरासत में गुजार चुके एक नेपाली व्यक्ति के मामले से निपटते हुए कलकत्ता उच्च न्यायालय ने सोमवार (22 मार्च) को राज्य सरकार से उसे मुआवजा/नुकसान प्रदान करने पर अपनी प्रतिक्रिया देने को कहा।

इसके अलावा, मुख्य न्यायाधीश थोथाथिल बी. राधाकृष्णन और न्यायमूर्ति अनिरुद्ध रॉय की खंडपीठ ने पश्चिम बंगाल पुलिस को पश्चिम बंगाल राज्य के उन सभी सुधार केंद्रों के विवरणों को एकत्र करने का भी निर्देश दिया है, जहां ऐसे विचाराधीन कैदी हैं जो परीक्षण (ट्रायल) के लिए अयोग्य हैं (Cr.PC का अध्याय XXV के मुताबिक)।

अदालत ने अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक और पुलिस महानिरीक्षक, सुधार सेवाएं, पश्चिम बंगाल पुलिस को निर्देश दिया कि वे 25 मार्च 2021 तक, यूटीपी (विचाराधीन कैदी) की स्थिति रिपोर्ट, प्रस्तुत करें।

पृष्ठभूमि

पीठ एक दीपक जोशी के मामले की सुनवाई कर रही थी, जिसे 12 मई 1980 को गिरफ्तार किया गया था और वह 40 से अधिक वर्षों की हिरासत से गुजर चुका है।

रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्रियों के आधार पर न्यायालय ने पाया कि आरोपी की मानसिक स्थिति के आकलन (जनवरी 1982) के बाद जब उसे ट्रायल के लिए मानसिक रूप से फिट नहीं पाया गया था, तब किसी भी समय इसके खिलाफ कोई रिपोर्ट दाखिल नहीं की गई थी। यहां तक ​​कि अब सेशन कोर्ट में भी जहां मामला लंबित है, वहां भी इसका कोई विरोध नहीं किया गया।

इस प्रकार, Cr.P.C की धारा 482 के तहत अपने अधिकार का प्रयोग करते हुए और भारत के संविधान के अनुच्छेद 226 और 227 के अनुसार अदालत ने आरोपी की रिहाई का आदेश देते हुए कहा,

"मामले के पूर्वोक्त दृष्टिकोण में हम यह नहीं देखते हैं कि यूटीपी दीपक जोशी @ जायसी @ जैशी को निरन्तर हिरासत में रखने से न्याय के सिरों का संरक्षण होगा।"
"उसकी मानसिक क्षमता में कमी के मद्देनजर किसी भी बॉन्ड को निष्पादित करने के लिए UTP को निर्देश देना असंभव है। न्याय के सिरों की संतुष्ट तब होगी, यदि उसकी रिहाई को प्रकाश चन्द्र शर्मा तमीना द्वारा इस न्यायालय के रजिस्ट्रार जनरल के पक्ष में निष्पादित एक साधारण बॉन्ड द्वारा समर्थन दिया जाए, जिसमें इस न्यायालय के निर्देश पर UTP को पेश करने का अंडरटैकिंग दिया गया हो।"

गौरतलब है कि नेपाल दूतावास के वकील ने कहा कि पहले के आदेशों के परिणामस्वरूप, नेपाली व्यक्ति दीपक जोशी को डम डम सेंट्रल करेक्शनल होम से रिहा किया गया था और उनके रिश्तेदार और नेपाल दूतावास के एक अधिकारी उसके साथ थे दीपक जोशी को उन्हे सौंप दिया गया और अब वह अपने घर पर है जहां वह अपनी माँ के साथ है जो 90 वर्ष से अधिक हैं।

इस प्रकार न्यायालय ने देखा,

"दीपक जोशी को लगभग 41 वर्षों तक हिरासत में रखा गया, वह भी बिना किसी मुकदमे के और बिना किसी अन्य कार्यवाही का सहारा लिए, हमें यह विचार करने के लिए प्रेरित किया कि क्या उनके पक्ष में मुआवजे या हर्जाने के आदेश को जारी किया जाना चाहिए।"

इस प्रकार, इसे उचित पाते हुए, न्यायालय ने राज्य सरकार को इस मुद्दे पर गौर करने का निर्देश दिया कि क्या राज्य के खिलाफ क्षतिपूर्ति या क्षति का आदेश पारित किया जा सकता है।

न्यायालय ने राज्य की ओर से महाधिवक्ता को इसकी सूचना दी ताकि इस मामले पर अपेक्षित प्रतिक्रिया महाधिवक्ता द्वारा रखी जा सके।

"हमें यकीन है कि राज्य इसे एक सक्रिय और व्यावहारिक दृष्टिकोण से देखेगा", अदालत ने कहा।

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