केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण (CAT) का सख्त आदेश: समीर वानखेड़े के खिलाफ चार्ज मेमो रद्द
केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण (CAT), प्रधान पीठ, नई दिल्ली ने सोमवार को एक अत्यंत महत्वपूर्ण और कड़े शब्दों वाले आदेश में आईआरएस अधिकारी Sameer Wankhede के खिलाफ जारी चार्ज मेमोरेंडम को रद्द (quash) कर दिया। न्यायाधिकरण ने स्पष्ट रूप से कहा कि विभागीय कार्रवाई गंभीर प्रक्रियात्मक त्रुटियों, कानून में दुर्भावना (malice in law) और प्रक्रिया के दुरुपयोग से ग्रस्त है।
न्यायाधिकरण ने यह भी कहा कि यह कार्रवाई शक्ति का ईमानदार प्रयोग नहीं, बल्कि “प्रतिशोध” और “निजी दुश्मनी” से प्रेरित है। पीठ ने टिप्पणी की कि समीर वानखेड़े के खिलाफ प्रस्तावित जांच केवल एक “दिखावटी (farcical) प्रक्रिया” होगी, जिसका निष्कर्ष पहले से तय है। इसी आधार पर, उन्हें “आगे होने वाले उत्पीड़न और अपमान” से बचाने के लिए तत्काल राहत दी गई।
केंद्र सरकार और CBIC पर गंभीर टिप्पणी
न्यायाधिकरण ने संघ सरकार और Central Board of Indirect Taxes and Customs (CBIC) के रवैये पर भी कड़ी आपत्ति जताई। पीठ ने कहा कि उन्होंने न्यायाधिकरण के पहले जारी अंतरिम आदेशों की जानबूझकर अवहेलना की और न्यायाधिकरण की गरिमा को ठेस पहुंचाई।
यह मामला प्रशासनिक अधिकरण अधिनियम, 1985 की धारा 19 के तहत दायर याचिका में सुना गया। इस पर सुनवाई न्यायमूर्ति रंजीत मोर (अध्यक्ष) और राजिंदर कश्यप (सदस्य–ए) की पीठ ने की।
घटनाक्रम की पृष्ठभूमि
पीठ ने नोट किया कि वानखेड़े ने पहले विभाग के खिलाफ अवमानना याचिका दायर की थी, क्योंकि उनकी पदोन्नति से संबंधित आदेश को लागू नहीं किया जा रहा था।
महत्वपूर्ण रूप से, 15 जुलाई 2025 को न्यायाधिकरण ने आदेश की अवहेलना के चलते CBIC के चेयरमैन को व्यक्तिगत रूप से तलब किया था।
इसके बाद, संघ सरकार/CBIC ने इस तलब आदेश को Delhi High Court में चुनौती दी। जब उच्च न्यायालय ने इस मामले में फैसला सुरक्षित रख लिया, उसी दौरान 18 अगस्त 2025 को विवादित चार्ज मेमोरेंडम जारी कर दिया गया।
न्यायाधिकरण ने कहा कि घटनाओं की यह पूरी श्रृंखला स्पष्ट रूप से दर्शाती है कि चार्ज मेमोरेंडम का कथित आरोपों से कोई वास्तविक संबंध नहीं है, बल्कि यह प्रतिशोध की भावना से प्रेरित है।
“कानून में दुर्भावना और शक्ति का रंगीन प्रयोग”
CAT ने अपने आदेश में कहा:
“घटनाओं की श्रृंखला यह स्पष्ट करती है कि विवादित चार्ज मेमोरेंडम का कथित आरोपों से कोई वास्तविक संबंध नहीं है। यह प्रतिवादियों की ओर से प्रतिशोध और निजी दुश्मनी का परिणाम है, जो कानून में दुर्भावना और शक्ति के रंगीन (colourable) प्रयोग को दर्शाता है।”
मामले का संक्षिप्त विवरण
समीर वानखेड़े वर्तमान में वित्त मंत्रालय, राजस्व विभाग में अपर आयुक्त के पद पर तैनात हैं। इससे पहले वे नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (NCB), मुंबई के जोनल डायरेक्टर रह चुके हैं।
उनकी ओर से यह दलील दी गई कि वे पिछले 18 वर्षों से सरकारी सेवा में हैं और उनका सेवा रिकॉर्ड “असाधारण” रहा है।
वानखेड़े ने कहा कि वर्तमान विभागीय कार्रवाई उन्हीं आरोपों पर आधारित है, जिनके आधार पर कॉरडेलिया क्रूज़ केस से जुड़े मामले में CBI ने उनके खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज किया है। यह भी तर्क दिया गया कि जिस स्पेशल एनक्वायरी टीम (SET) की रिपोर्ट पर CBI केस आधारित है, उसे पहले ही अदालतों द्वारा दोषपूर्ण माना जा चुका है।
चार्ज मेमोरेंडम का आधार और विवाद
18 अगस्त 2025 का चार्ज मेमोरेंडम एक कॉल ट्रांसक्रिप्ट पर आधारित था, जिसे वानखेड़े ने स्वयं अपने बचाव में बॉम्बे हाईकोर्ट में प्रस्तुत किया था।
विभाग का तर्क था कि यह एक “स्टैंड-अलोन” कदाचार है, जिसमें वानखेड़े ने NCB से अलग किए जाने के बाद जांच को प्रभावित करने की कोशिश की।
हालांकि, न्यायाधिकरण ने माना कि जब मामला sub judice है, तब इस सामग्री पर विभागीय कार्रवाई करना आवेदक को अपनी रक्षा उजागर करने के लिए मजबूर करेगा, जिससे उन्हें पूर्वाग्रह (prejudice) होगा।
संविधान और सेवा नियमों का उल्लंघन
वानखेड़े ने दलील दी कि चार्ज मेमोरेंडम अनुच्छेद 14 और 16 का उल्लंघन करता है और बिना किसी ठोस, ताजा या स्वीकार्य सामग्री के यांत्रिक ढंग से जारी किया गया है।
CAT ने Union of India v. Ashok Kacker के फैसले पर भरोसा करते हुए कहा कि जहां मूलभूत कानूनी खामियां हों, वहां चार्जशीट के चरण पर भी न्यायिक समीक्षा की जा सकती है।
पूर्व अंतरिम आदेश की अवहेलना
न्यायाधिकरण ने यह भी याद दिलाया कि उसने 02.04.2025 और 03.04.2025 के पत्रों पर आगे की कार्रवाई रोक रखी थी। इसके बावजूद, विभाग ने मेजर पेनल्टी कार्यवाही शुरू कर दी और चार्ज मेमोरेंडम जारी कर दिया।
पीठ ने इसे “उत्पीड़न और अपमान” करार देते हुए कहा कि जांच पहले से तय निष्कर्ष वाली एक औपचारिकता मात्र होती।
CCS (CCA) नियमों का उल्लंघन
CAT ने यह भी माना कि चार्ज मेमोरेंडम CCS (CCA) नियम, 1965 के नियम 14(3) और 14(4) का उल्लंघन करता है। चार्जशीट में गवाहों की सूची 'NIL' थी।
इस संदर्भ में Union of India v. Shameem Akhtar के फैसले का हवाला देते हुए कहा गया कि बिना गवाहों और साक्ष्य आधार के चार्जशीट कानूनन टिकाऊ नहीं होती।
अंतिम निष्कर्ष
न्यायाधिकरण ने कहा कि पूरी प्रक्रिया से यह स्पष्ट है कि विभाग का रवैया पूर्वनिर्धारित मानसिकता, गैर-आवेदनशीलता और अत्यधिक जल्दबाजी को दर्शाता है।
इन सभी कारणों से CAT ने चार्ज मेमोरेंडम को रद्द करते हुए वानखेड़े को सभी परिणामी लाभ देने का निर्देश दिया।
हालांकि, न्यायाधिकरण ने यह उम्मीद जताते हुए भारी लागत (costs) लगाने से परहेज किया कि संबंधित अधिकारी “अपने तौर-तरीकों में सुधार करेंगे” और प्रशासनिक तंत्र कानून के शासन के अनुरूप कार्य करेगा।