कारावास के दौरान दोषी की सामाजिक जड़ें ख़त्म होने नहीं दे सकते: कर्नाटक हाईकोर्ट ने बेटी के निकाह में शामिल होने के लिए दोषी को फर्लो पर रिहा किया

Update: 2023-09-04 07:45 GMT

कर्नाटक हाईकोर्ट ने यह देखते हुए कि "आम तौर पर हर मुस्लिम विवाह में कुछ अनुष्ठान शामिल होते हैं, जो माता-पिता की भागीदारी के साथ किए जाते हैं," दोषी अब्दुल रहमान को अपनी बेटी के निकाह में शामिल होने के लिए फर्लो दे दी। रहमान की यह फर्लो कल यानी 2 सितंबर से निर्धारित थी।

जस्टिस कृष्ण एस दीक्षित की पीठ ने टिप्पणी की कि छिटपुट रूप से ही सही दोषी को नागरिक समाज के संपर्क में रहना पड़ता है, ताकि जब वह जेल में बंद हो तो उसकी सामाजिक जड़ें सूख न जाएं।

जस्टिस कृष्ण एस दीक्षित की पीठ ने आगे कहा,

"अन्यथा, जब वह सजा की अवधि पूरी करने के बाद जेल से लौटेगा तो पूरी तरह से अजनबी हो सकता है। तब उसके लिए जीवन कठिन साबित हो सकता है; एक कल्याणकारी राज्य में ऐसा होना कोई ख़ुशी की बात नहीं है।"

इस प्रकार न्यायालय ने अधिकारियों को रहमान को 2 सितंबर से शुरू होने वाली सात दिनों की अवधि के लिए सामान्य सावधानियों के तहत फर्लो पर रिहा करने का निर्देश दिया।

कोर्ट ने कहा,

"जब एक युवा बेटी की शादी हो रही है तो उसके पिता की उपस्थिति वांछनीय है, जो भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 में निहित मानवीय विचारों के अनुरूप है।"

अदालत ने आगे कहा कि दोषसिद्धि और कारावास "उस [दोषी] को सभी स्वतंत्रता और गरिमा से वंचित नहीं कर देता"। इसमें कहा गया कि ऐसे मामलों में दोषियों के लिए मानवतावादी दृष्टिकोण अपनाने की जरूरत है।

इसमें कहा गया,

“लंबे समय से जेल में बंद लोगों की राहत के लिए पैरोल/फर्लो के प्रावधानों को मानवतावादी आधार पर तैयार किया गया है। किसी सजा काट रहे दोषी को पैरोल पर रिहा करने का मुख्य उद्देश्य उसे अपनी व्यक्तिगत और पारिवारिक समस्याओं को हल करने का अवसर देना और नागरिक समाज के साथ अपने संबंध बनाए रखने में सक्षम बनाना है। इसके अलावा, स्वास्थ्य संबंधी मामले भी हो सकते हैं।''

तदनुसार, कोर्ट ने मामले का निपटारा किया।

केस नंबर: रिट याचिका नंबर 18712/2023

अपीयरेंस: याचिकाकर्ता के लिए एडवोकेट सिराजुद्दीन अहमद और उत्तरदाताओं के लिए एजीए नवशेखर पेश हुए।

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