बुज़ुर्ग माँ को प्रॉपर्टी संबंधित 'लंबे' मुक़दमे में घसीटने का आरोप: बॉम्बे हाईकोर्ट ने बेटे पर लगाया ₹50,000 का जुर्माना

Update: 2026-05-08 04:12 GMT

बॉम्बे हाईकोर्ट ने बेटे की अपील खारिज करते हुए उस पर ₹50,000 का जुर्माना लगाया। बता दें, इस अपील में बेटे ने 'माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण और कल्याण अधिनियम' के तहत एक ट्रिब्यूनल के आदेश को चुनौती दी थी।

ट्रिब्यूनल ने बेटे को अपनी बुज़ुर्ग माँ को हर महीने ₹10,000 गुज़ारा भत्ता देने का निर्देश दिया था और उस 'गिफ्ट डीड' (दान-पत्र) को भी रद्द किया था, जिसके ज़रिए माँ ने अपनी पुश्तैनी प्रॉपर्टी में अपने अधिकार छोड़ दिए थे। कोर्ट ने यह जुर्माना उस बुज़ुर्ग नागरिक को एक 'कई-स्तरों वाले' और 'लंबे' मुक़दमे में 'घसीटने' के लिए लगाया।

सिंगल जज जस्टिस सचिन देशमुख ने बेटे संभाजी ज़म्ब्रे (46) द्वारा माँगी गई कोई भी राहत देने से इनकार किया, खासकर 'गिफ्ट डीड' को रद्द करने के मामले में। संभाजी ने प्रॉपर्टी का एक हिस्सा अपनी पत्नी के नाम पर ट्रांसफर किया, क्योंकि एक कोर्ट ने, जो उनके वैवाहिक विवाद को देख रहा था, ऐसा आदेश दिया था।

जस्टिस देशमुख ने 6 मई को पारित आदेश में यह बात कही,

"जहां तक याचिकाकर्ता के इस तर्क का सवाल है कि उसने बाद में संबंधित प्रॉपर्टी अपनी पत्नी के नाम पर ट्रांसफर कर दी थी, यह साफ़ है कि ऐसा कोई भी ट्रांसफर पूरी तरह से याचिकाकर्ता के मालिकाना हक पर ही निर्भर करता है। 'माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण और कल्याण अधिनियम, 2007' के प्रावधानों के तहत मूल 'गिफ्ट डीड' के कानूनी रूप से रद्द हो जाने पर, याचिकाकर्ता के मालिकाना हक का मूल आधार ही खत्म हो जाता है। इसलिए उसके द्वारा किया गया कोई भी ट्रांसफर पहली नज़र में प्रॉपर्टी पाने वाले व्यक्ति के पक्ष में कोई 'अटूट' या 'बेहतर' अधिकार पैदा नहीं करेगा।"

साथ ही, क्योंकि ज़म्ब्रे की पत्नी इस मौजूदा मुक़दमे में कोई पक्षकार नहीं थी, इसलिए कोर्ट ने उसके अधिकारों (यदि कोई हों) पर कोई अंतिम फ़ैसला देने से परहेज़ किया और उसे यह छूट दी कि वह कानून के तहत जो भी उपाय उपलब्ध हों, उनका लाभ उठा सकती है।

जज ने माँ छाया (65) के इस तर्क पर भी गौर किया कि वह 'अधिकार-त्याग पत्र' (Relinquishment Deed) उससे धोखे से हासिल किया गया। उस पत्र के बाद उसके साथ अच्छा बर्ताव नहीं किया गया।

जस्टिस देशमुख ने टिप्पणी की,

"नतीजतन, सभी परिस्थितियों और विशेष रूप से याचिकाकर्ता के उस आचरण को ध्यान में रखते हुए, जिसमें उसने अपनी माँ को बुनियादी सुविधाएँ और शारीरिक ज़रूरतें पूरी करने की अपनी मूल ज़िम्मेदारी से पल्ला झाड़ लिया, इस मामले में दखल देने का कोई आधार नहीं बनता। रिकॉर्ड से पता चलता है कि याचिकाकर्ता ने अपने स्वाभाविक और कानूनी कर्तव्यों को पूरा करने के बजाय, अपनी बुज़ुर्ग माँ—जो एक वरिष्ठ नागरिक हैं—को एक लंबी और कई स्तरों वाली कानूनी लड़ाई में घसीटना चुना, जिससे उनके बुढ़ापे के दिनों में उनके संसाधन और मानसिक शांति पूरी तरह से खत्म हो गए। ऐसे आचरण के कारण याचिकाकर्ता किसी भी तरह की राहत पाने का हकदार नहीं रह जाता, और तो और, उसे भारत के संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत मिलने वाली न्यायसंगत और विवेकाधीन राहत भी नहीं मिल सकती।"

जस्टिस देशमुख ने माना कि यह याचिका पूरी तरह से बेबुनियाद है। इसलिए इसे खारिज किया गया।

जस्टिस देशमुख ने टिप्पणी की,

"यह देखते हुए कि याचिकाकर्ता ने अपनी बुज़ुर्ग माँ को परेशान करने और उनके बुढ़ापे के दिनों में लगातार कानूनी लड़ाइयों के ज़रिए उनके सीमित संसाधनों को खत्म करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है, मेरा सुविचारित मत है कि यह एक ऐसा मामला है, जिसमें कल्याणकारी आदेशों के खिलाफ ऐसी चुनौतियों को हतोत्साहित करने के लिए एक मिसाल कायम करने वाला जुर्माना (Exemplary Costs) लगाया जाना चाहिए। याचिकाकर्ता द्वारा कानूनी लड़ाइयों का जाल बिछाने का प्रयास, जबकि प्रतिवादी अपनी बुनियादी गुज़ारे-भत्ते के लिए संघर्ष कर रही है, कानूनी प्रक्रिया का स्पष्ट दुरुपयोग है। तदनुसार, याचिकाकर्ता को निर्देश दिया जाता है कि वह अपनी माँ को ₹50,000 की राशि जुर्माने के तौर पर अदा करे। यह राशि आज से चार हफ़्तों के भीतर ट्रिब्यूनल में जमा की जाएगी या सीधे माँ को दी जाएगी। ऐसा न करने पर इस राशि की वसूली 'भू-राजस्व के बकाया' (Arrears of Land Revenue) के रूप में की जाएगी।"

इन टिप्पणियों के साथ पीठ ने याचिका का निपटारा किया।

Case Title: Sambhaji Balkrishna Zambre vs Chhaya Balkrishna Zambre (Writ Petition 12120 of 2025)

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