बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) के चेयरमैन सीनियर एडवोकेट मनन कुमार मिश्रा के कार्यकाल को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने नई BCI के गठन की प्रक्रिया तेज करने के लिए राज्य बार काउंसिलों के पुनर्गठन और चुनाव को लेकर समयसीमा तय की है।

चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने कहा कि यदि राज्य बार काउंसिलों का नया गठन समयबद्ध तरीके से पूरा हो जाता है, तो नए प्रतिनिधि BCI का चुनाव कर सकेंगे और लंबे समय से लंबित BCI चुनाव का रास्ता साफ होगा।

सुप्रीम कोर्ट के निर्देश

कोर्ट ने राज्य बार काउंसिलों के गठन के लिए निम्न समयसीमा तय की:

1. हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस दो महिला सदस्यों को को-ऑप्ट करने की प्रक्रिया दो सप्ताह के भीतर पूरी करें।

2. इसके बाद संबंधित राज्य बार काउंसिल एक सप्ताह के भीतर अपनी नई संरचना अधिसूचित करें।

3. नई गठित राज्य बार काउंसिलें तीन सप्ताह के भीतर चेयरपर्सन, वाइस चेयरपर्सन, अन्य पदाधिकारियों और BCI के लिए अपना एक प्रतिनिधि चुनें।

कोर्ट ने कहा कि इस प्रक्रिया के पूरा होने के बाद वह BCI की नई संरचना के मुद्दे पर विचार करेगा। मामले की अगली सुनवाई 17 सितंबर को होगी, जिसमें इन निर्देशों के अनुपालन की समीक्षा की जाएगी।

बड़े नीतिगत फैसलों में AG और SG की भागीदारी

सुनवाई के दौरान BCI की ओर से यह अंडरटेकिंग भी दी गई कि भारत के अटॉर्नी जनरल और सॉलिसिटर जनरल, जो BCI के पदेन (Ex-Officio) सदस्य हैं, को BCI के हर महत्वपूर्ण नीतिगत फैसले में सक्रिय रूप से शामिल किया जाएगा।

जस्टिस बागची ने स्पष्ट किया कि मनन कुमार मिश्रा की वर्तमान स्थिति प्रो-टेम चेयरमैन के रूप में है। नई निर्वाचित BCI के गठन तक वे रोजमर्रा के कामकाज को संभाल सकते हैं, लेकिन महत्वपूर्ण नीतिगत निर्णयों में स्थायी पदेन सदस्यों की भागीदारी आवश्यक होगी।

मनन कुमार मिश्रा के कार्यकाल पर क्या विवाद है?

याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता माधवी दीवान ने बताया कि BCI Rules के Rule 12(2) के तहत चेयरमैन और वाइस चेयरमैन का कार्यकाल दो वर्ष है। उन्होंने अप्रैल 2025 की उस अधिसूचना को चुनौती दी, जिसके जरिए मनन कुमार मिश्रा का कार्यकाल 17 अप्रैल 2025 से 16 अप्रैल 2030 तक बताया गया है।

जस्टिस बागची ने सुनवाई के दौरान कहा कि यदि नियम दो वर्ष का कार्यकाल निर्धारित करता है, तो कोई अधिसूचना नियम को पीछे छोड़कर अतिरिक्त कार्यकाल नहीं दे सकती।

याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि Advocates Act की धारा 4(3) में उत्तराधिकारी चुने जाने तक पद पर बने रहने की व्यवस्था का इस्तेमाल लंबे समय तक पद पर बने रहने के लिए किया जा रहा है।

BCI-PEARL FIRST Trust का मुद्दा भी उठा

सुनवाई के दौरान BCI-PEARL FIRST Trust के कामकाज और उसकी संपत्तियों से जुड़े सवाल भी उठाए गए। वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने कहा कि 2020 में गठित इस ट्रस्ट के ट्रस्टी BCI में अपना कार्यकाल समाप्त होने के बाद भी ट्रस्टी बने रह सकते हैं।

इस पर जस्टिस बागची ने सवाल उठाया कि क्या किसी निर्वाचित संस्था द्वारा बनाया गया ट्रस्ट ऐसे व्यक्तियों के नियंत्रण में रह सकता है, जो बाद में उस संस्था के सदस्य ही नहीं रहते।

उन्होंने इस पहलू की गंभीर जांच की आवश्यकता पर भी सवाल उठाया।

NALSAR विवाद के बाद दायर हुईं याचिकाएं

ये याचिकाएं NALSAR विवाद के बाद भी चर्चा में आईं। इस विवाद में BCI चेयरमैन मनन कुमार मिश्रा ने NALSAR के छात्रों के खिलाफ कार्रवाई के निर्देश दिए थे। छात्रों ने विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में CJI सूर्यकांत को अतिथि के रूप में बुलाए जाने पर आपत्ति जताई थी। बाद में व्यापक आलोचना के बीच मिश्रा ने माफी मांगी थी।

याचिकाकर्ताओं ने BCI में लंबे समय तक पदाधिकारियों के बने रहने, चुनाव में देरी और कार्यकाल की सीमा से जुड़े मुद्दे उठाते हुए BCI के कामकाज और वित्तीय मामलों की भी जांच की मांग की है।

सुप्रीम कोर्ट का फोकस नई निर्वाचित BCI के गठन पर

सुनवाई के दौरान पीठ ने संकेत दिया कि जब नई निर्वाचित राज्य बार काउंसिलें जल्द गठित होने वाली हैं, तो न्यायिक हस्तक्षेप के बजाय नई BCI के गठन की प्रक्रिया को समयबद्ध करना मौजूदा विवादों का बेहतर समाधान हो सकता है।

इसलिए सुप्रीम कोर्ट ने राज्य बार काउंसिलों के गठन से लेकर उनके प्रतिनिधियों के BCI में चुनाव तक की स्पष्ट समयसीमा तय की है, ताकि नई निर्वाचित BCI का जल्द गठन हो सके।

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