ज्यादातर दवाएं मूल्य नियंत्रण के दायरे से बाहर क्यों हैं? सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से सवाल पूछा, आदेश सुरक्षित रखा
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को केंद्र सरकार से पूछा कि वह और अधिक दवाओं को मूल्य नियंत्रण के दायरे में लाने से क्यों हिचकिचा रही है। कोर्ट ने कहा कि बाजार की ताकतों पर निर्भर रहना और फार्मास्युटिकल उद्योग के विकास की चिंता करना, मरीजों को ऐसी कीमतों पर दवाएं खरीदने के लिए मजबूर करने का सही कारण नहीं हो सकता, जो उनकी खरीद लागत से सैकड़ों गुना ज्यादा हो सकती हैं।
जस्टिस संदीप मेहता ने एडिशनल सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी से पूछा, जो केंद्र की दवा मूल्य निर्धारण नीति का बचाव कर रही थीं,
"मैडम भाटी, आप लोगों की जिंदगी से जुड़े मामले पर काम कर रही हैं। इसे सिर्फ व्यापार न समझें। इसे इस देश के सबसे गरीब व्यक्ति की जिंदगी से जोड़कर देखें। आप सिर्फ व्यापार, आर्थिक नीति और ऐसी ही अन्य बातों के बारे में बात कर रही हैं। क्या यह ऐसा मामला है जहां आम नागरिकों की जिंदगी के मुकाबले आर्थिक नीति को ज्यादा अहमियत दी जाएगी?"
दवाओं की कीमतों को नियंत्रित करने से जुड़े इस मामले में कोर्ट ने केंद्र से सवाल पूछे कि दवाओं के अधिकतम खुदरा मूल्य (MRP) और जिस कीमत पर रिटेलर उन्हें खरीदते हैं, उसके बीच इतना बड़ा अंतर क्यों है। इसके बाद कोर्ट ने अपना आदेश सुरक्षित रख लिया। कोर्ट ने यह भी पूछा कि 'ड्रग्स (प्राइसेस कंट्रोल) ऑर्डर, 2013' (DPCO) के तहत सख्त मूल्य नियंत्रण व्यवस्था से दवाओं का एक बड़ा हिस्सा बाहर क्यों रखा गया।
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने एडिशनल सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी से बार-बार पूछा कि सरकार ने दवा निर्माताओं को ऐसी MRP छापने की अनुमति क्यों दी है, जो डीलरों और रिटेलर्स से ली जाने वाली कीमतों से कई गुना ज्यादा है?
सुनवाई के दौरान, जस्टिस संदीप मेहता ने एक घटना का जिक्र किया। एक मेडिकल डीलर, जिसकी पत्नी का एक बड़े अस्पताल में कैंसर का इलाज चल रहा था, उसने अपनी पत्नी के लिए कीमोथेरेपी का इंजेक्शन डीलर प्राइस यानी 11,000 रुपये में खरीदना चाहा। लेकिन अस्पताल ने वह इंजेक्शन लगाने से मना कर दिया और इसके लिए 1.3 लाख रुपये वसूले।
उन्होंने भाटी से पूछा,
"क्या आप इस लूट का कोई उचित कारण बता सकती हैं?"
एक मौके पर, जब केंद्र से बार-बार इस अंतर का कारण बताने को कहा गया, तो जस्टिस मेहता ने कहा,
"हमें फिर भी समझ नहीं आ रहा है कि इस अंतर का क्या आधार है। आप इसका कोई जवाब नहीं दे पा रही हैं।"
केंद्र ने दवाओं की कीमतों पर नियंत्रण के लिए अपनाए गए 'नपे-तुले' (कैलिब्रेटेड) दृष्टिकोण का बचाव किया
ASG भाटी ने कहा कि सरकार की नीति का उद्देश्य किफायती दवाओं और नवाचार (इनोवेशन), प्रतिस्पर्धा, औद्योगिक विकास, रोजगार तथा आर्थिक भलाई के बीच संतुलन बनाना है। उन्होंने तर्क दिया कि कीमतों पर पूरी तरह से नियंत्रण रखना सही समाधान नहीं है, और सरकार पूरे बाजार को नियंत्रित करने के बजाय केवल चुनिंदा मामलों में ही हस्तक्षेप करना पसंद करती है।
मौजूदा ढांचे के तहत 'शेड्यूल्ड' (सूचीबद्ध) दवाएं DPCO के अंतर्गत अधिकतम मूल्य सीमा (सीलिंग प्राइस) के दायरे में आती हैं, जबकि 'नॉन-शेड्यूल्ड' (गैर-सूचीबद्ध) दवाओं के निर्माता अपनी शुरुआती MRP खुद तय कर सकते हैं, हालांकि बाद में कीमतों में बढ़ोतरी करने पर कुछ पाबंदियां लागू होती हैं।
केंद्र ने 'राष्ट्रीय दवा मूल्य निर्धारण नीति, 2012' (National Pharmaceutical Pricing Policy, 2012) का हवाला दिया, जिसके चार मुख्य उद्देश्य हैं: उचित कीमतों पर आवश्यक दवाओं की उपलब्धता सुनिश्चित करना, नवाचार और प्रतिस्पर्धा के लिए पर्याप्त अवसर देना, दवा उद्योग के विकास को समर्थन देना, और रोजगार तथा साझा आर्थिक समृद्धि को बढ़ावा देना।
भाटी ने अदालत से कहा,
"इसलिए केवल एक पहलू (किफायती कीमतों) को ही आधार मानकर पूरी नीति को देखना सही नहीं होगा। हमारी नीति इन चार स्तंभों पर टिकी है, और एक नियामक (रेगुलेटर) के तौर पर हमारी कोशिश इन चारों के बीच संतुलन बनाए रखने की होती है।"
उन्होंने कहा,
"हमारा मकसद पूरे बाजार को नियंत्रित करना नहीं है, बल्कि समय-समय पर जरूरत के हिसाब से ही हस्तक्षेप करना है।"
उन्होंने आगे कहा कि भारत अब 'कंट्रोल राज' (नियंत्रण वाले दौर) से आगे निकल चुका है और सरकार की नीति बाजार की ताकतों को काम करने देने की।
जस्टिस मेहता ने सवाल उठाया कि क्या इस दृष्टिकोण के कारण दवा निर्माता मनमाने ढंग से बहुत ऊंची शुरुआती MRP तय कर सकते हैं। फिर कीमतों को नियंत्रित करने के नाम पर केवल सालाना 10% की बढ़ोतरी की सीमा का सहारा ले सकते हैं?
उन्होंने पूछा,
"आप शुरुआत में ही MRP को आसमान पर पहुंचा देते हैं। फिर उसमें 10% की बढ़ोतरी कर देते हैं। इससे क्या फर्क पड़ता है?"
जब भाटी ने तर्क दिया कि दुनिया भर में भारत में दवाओं की कीमतें सबसे कम हैं, तो जस्टिस मेहता ने जवाब दिया,
"इस बहस को शुरू ही न करें। भारत में दवाएं सबसे सस्ती हैं, लेकिन दुर्भाग्य से भारत कई अन्य समस्याओं से भी जूझ रहा है। अगर हम प्रति व्यक्ति आय (per capita income) और अन्य पहलुओं पर बात करने लगे, तो बहुत कुछ सामने आ जाएगा। कृपया हमें उस दिशा में जाने के लिए मजबूर न करें।"
उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि क्या बाजार-आधारित तर्क तब उचित है, जब मरीजों की जान दांव पर लगी हो?
उन्होंने कहा,
"जब हम मरीजों और उनके जीवन की बात करते हैं, तो क्या हम सचमुच ऐसी पूंजीवादी सोच अपना रहे हैं? क्या हम वाकई इसी दिशा में जा रहे हैं? यह कोई ऐसा देश नहीं है जहां उस तरह की सामाजिक सुरक्षा मौजूद हो, जिसकी हम उम्मीद करते हैं या जिसे हासिल करने की कोशिश कर रहे हैं।"
अदालत ने बार-बार यही सवाल उठाया कि सरकार ने दवाओं के एक बहुत बड़े हिस्से पर सख्त नियंत्रण क्यों नहीं लागू किया।
Case Title : Kishan Chand Jain v. Ethics And Medical Registration Board (EMRB)