राज्यसभा सदस्य उज्ज्वल निकम को स्पेशल पब्लिक प्रॉसिक्यूटर पद से हटाने की मांग, सुप्रीम कोर्ट पहुंचा 2012 मर्डर केस का आरोपी

Update: 2026-02-11 10:04 GMT

2012 में दिल्ली के व्यवसायी अरुण कुमार टिक्कू की हत्या के आरोपी विजय भिवाजीराव पालांडे ने सुप्रीम कोर्ट का रुख करते हुए राज्यसभा सदस्य उज्जवल निकम को मामले में स्पेशल पब्लिक प्रॉसिक्यूटर (SPP) पद से हटाने की मांग की है।

पालांडे का तर्क है कि निकम, जो राज्यसभा के मनोनीत सदस्य हैं, महाराष्ट्र सरकार की ओर से एसपीपी के रूप में कार्य जारी नहीं रख सकते, क्योंकि यह “लाभ का पद” (Office of Profit) धारण करने के समान होगा। उनका कहना है कि ऐसी स्थिति में निकम का एसपीपी बने रहना संविधान के अनुच्छेद 102(1) के विरुद्ध है।

मामले का उल्लेख आज चीफ़ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की खंडपीठ के समक्ष सीनियर एडवोकेट विभा दत्ता मखीजा (पालांडे की ओर से) ने किया। प्रारंभ में सीजेआई ने पूछा कि याचिकाकर्ता ने पहले हाईकोर्ट का दरवाजा क्यों नहीं खटखटाया, लेकिन बाद में मामले पर विचार करने को सहमति जताई।

पृष्ठभूमि

यह याचिका अरुण कुमार टिक्कू हत्याकांड से संबंधित है। 5 फरवरी को मुंबई की एक अदालत ने पालांडे की उस अर्जी को खारिज कर दिया था, जिसमें उन्होंने निकम को एसपीपी पद से हटाने की मांग की थी।

पालांडे ने दलील दी थी कि राज्यसभा सदस्य के रूप में निकम निजी मामलों को संभाल सकते हैं, लेकिन राज्य की ओर से एसपीपी के रूप में कार्य करना “लाभ का पद” होगा। उन्होंने यह आशंका भी जताई कि निकम अपने प्रभाव का उपयोग कर सजा सुनिश्चित कर सकते हैं।

निकम और राज्य का पक्ष

निकम ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) या भारतीय न्याय संहिता (BNSS) में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है, जो राज्यसभा सदस्य बनने के बाद उन्हें एसपीपी के रूप में कार्य करने से रोकता हो। उन्होंने यह भी कहा कि उनका एसपीपी के रूप में नियुक्ति अनुबंध (contractual) आधारित है, स्थायी नहीं, इसलिए इसे “लाभ का पद” नहीं माना जा सकता।

महाराष्ट्र सरकार ने भी पालांडे की दलीलों का विरोध करते हुए कहा कि एसपीपी की नियुक्ति से अनुच्छेद 102(1) के तहत कोई स्वतंत्र “पद” सृजित नहीं होता। यह स्थायी पद नहीं है और राज्य सरकार की नीति के तहत अनुबंध के आधार पर किया जाता है।

मुंबई कोर्ट का निर्णय

मुंबई अदालत ने कहा कि पालांडे ने अनुच्छेद 102(1) की गलत व्याख्या की है। अदालत ने स्पष्ट किया कि संसद सदस्य चुने जाने के समय यह देखा जाता है कि व्यक्ति कोई लाभ का पद धारण कर रहा है या नहीं। निकम की नियुक्ति से यह स्पष्ट है कि राज्यसभा सदस्य बनने के समय वे किसी लाभ के पद पर नहीं थे।

अदालत ने यह भी कहा कि अनुच्छेद 102(1)(a) में कहीं यह नहीं कहा गया है कि यदि कोई व्यक्ति लाभ का पद धारण करता है तो वह एसपीपी नहीं बन सकता।

साथ ही, अदालत ने State of Maharashtra v. Prakash Prahlad Patil के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि अदालतों को सामान्यतः राज्य की नीतिगत निर्णयों में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।

अदालत ने दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 24(8) का भी उल्लेख किया, जो राज्य को किसी भी व्यक्ति को एसपीपी नियुक्त करने का अधिकार देती है।

मुंबई कोर्ट के आदेश से असंतुष्ट होकर अब पालांडे ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है।

Tags:    

Similar News