भारत में पहली बार 'मूल संरचना' के विचार की वकालत बैरिस्टर एमके नांबियार ने गोलकनाथ मामले में की थी: सीजेआई यूयू ललित

Update: 2022-10-25 16:18 GMT

चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया जस्टिस यूयू ललित ने हाल ही में सीएस वैद्यनाथन चेयर ऑन लॉ एंड डेवलपमेंट के तत्वावधान में सस्त्र डीम्ड यूनिवर्सिटी की ओर से आयोजित द्वितीय एमके नांबियार मेमोरियल लेक्चर दिया।

कार्यक्रम की अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस बीएन श्रीकृष्णा ने की। सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज संतोष हेगड़े, पूर्व अटॉर्नी-जनरल केके वेणुगोपाल, और सीनियर एडवोकेट सीएस वैद्यनाथन आदि कार्यक्रम में मौजूद थे।

जस्टिस यूयू ललित ने अपने व्याख्यान में कहा, मेलोथ कृष्णन नांबियार ने "ऐसे मौलिक और बुनियादी विचारों" के बीज बोए, जिन पर सुप्रीम कोर्ट की मोहर तुरंत नहीं लगी, हालांकि वे बाद में "विशाल वट वृक्ष" बन गए, जिसकी छाया में प्रत्येक नागरिक आराम कर सकता है और उन्हें धन्यवाद कहा सकता है कि "यह आपके प्रयास रहे कि संवैधानिक इतिहास हमें यहां लेकर आया।"

चीफ जस्टिस ने कहा,

"बार में शामिल होने का इच्छुक कोई भी युवा, जिसे देश के संवैधानिक कानून से कुछ लेना-देना है, उसे हमेशा एक ही नाम के सा‌थ शुरुआत करने का निर्देश दिया जाएगा, और वह है एमके नांबियार।" 

चीफ जस्टिस ललित ने पूर्व अटॉर्नी-जनरल, सोली एस सोराबजी के चैंबर में जूनियर के रूप में बिताए अपने दिनों को याद किया, जिन्होंने 'फ्रॉम गोपालन टू गोलकनाथ, और बियॉन्‍ड: ए ट्रिब्यूट टू मिस्टर एमके नंबियार' नामक किताबें लिखी हैं।

चीफ जस्टिस ने कहा, "सोराबजी को अपनी किताब फ्रॉम गोपालन टू गोलकनाथ तक' पर बहुत गर्व था। किताब में एमके नांबियार के योगदान की चर्चा की गई है।"

जस्टिस ललित ने कहा,

"सुप्रीम कोर्ट की स्थापना के दो महीने के भीतर, दो नांबियारों ने कोर्ट में प्रवेश किया था।"

"एक गोपालन नांबियार, सुप्रीम कोर्ट की रजिस्ट्री के माध्यम से और एक एमके नांबियार, कोर्ट हॉल के माध्यम से।"

एमके नांबियार की सर्वा‌धिक महत्वपूर्ण कार्य एके गोपालन बनाम मद्रास राज्य [AIR 1950 SC 27] में उनका पेश होना और बहस करना है। मामले के संबंध में सोराबजी ने कहा था कि बैरिस्टर ने "कॉन्‍स्टीट्यूशनल लॉयर के रूप में अपनी पहचान बनाई"।

सोराबजी ने इसे "अद्भुद संयोग" कहा कि उनके मुवक्किल का पूरा नाम अयिलिअथ कुट्टिएरी गोपालन नांबियार था। एके गोपन एक लोकप्रिय भारतीय कम्युनिस्ट नेता थे, जिन्हें निवारक निरोध कानून के तहत गिरफ्तार किया गया था।

जस्टिस ललित ने बताया कि "उस रिट याचिका को ओपी नंबर 13 ऑफ 1950 के के रूप में जाना जाता है। कई रिसर्च स्‍कॉलर सोचते हैं कि 1 से 12 तक के आइटम क्या थे? इतिहास में भी उनकी बहुत चर्चा नहीं है।

जबकि ओपी नंबर 13 ऑफ 1950 का हमारे न्यायशास्त्र और संवैधानिक इतिहास में में अमर हो गया है।"

नांबियार की दलीलों की गहराई और ताकत पर चीफ जस्टिस ने कहा कि "बेंच के छह जजों में से सभी ने" ने बैरिस्टर की ओर से दिए गए "शानदार सबमिशन" को बड़े पैमाने पर उद्धृत किया।

चीफ जस्टिस ने कहा, "उन सबमिशन में से तीन सिद्धांत सामने आए, जिन्हें समय के साथ हमारे न्यायशास्त्र में अपनाया गया है।"

चीफ जस्टिस एचजे कानिया ने नांबियार की ओर से दिए गए सबसे महत्वपूर्ण प्रस्तुतीकरण को निर्धारित किया था, जिसका भारतीय संवैधानिक कानून पर दूरगामी प्रभाव पड़ा।

नांबियार ने अनुच्छेद 19 और 21 के संयुक्त पठन की वकालत करते हुए तर्क दिया था कि भाग III में निहित सभी स्वतंत्रताओं को एक कॉमन थ्रेड जोड़ता है।

मौलिक अधिकारों की पारस्परिक विशिष्टता के सिद्धांत के आधार पर इस तर्क को सुप्रीम कोर्ट ने ने 4:1 के बहुमत से खारिज कर दिया था। जैसा कि सोराबजी ने वर्णन किया है, यह "विसंगत सिद्धांत", नांबियार द्वारा इसे खारिज किए जाने के तर्क के बाद दो दशकों तक इस क्षेत्र पर कायम रहा।

दो अन्य प्रस्तुतियां जस्टिस पतंजलि शास्त्री द्वारा दर्ज की गईं।

बैरिस्टर ने तर्क दिया था कि अनुच्छेद 21 में "कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया को छोड़कर" अभिव्यक्ति में प्रक्रियात्मक नियत प्रक्रिया शामिल होनी चाहिए।

चीफ जस्टिस ललित ने संक्षेप में कहा, "न केवल कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया, बल्कि यह कि प्रक्रिया एक उचित प्रक्रिया होनी चाहिए। यह दूसरी दलील है।"

नांबियार ने यह भी तर्क दिया था कि "अनुच्छेद 21 के अर्थ के भीतर कानून को एक अधिनियम के अर्थ में नहीं समझा जाना चाहिए, बल्कि यह प्राकृतिक न्याय के अपरिवर्तनीय और सार्वभौमिक सिद्धांतों को दर्शाता है।"

चीफ जस्टिस ललित ने बुनियादी संरचना सिद्धांत को विकसित करने में नांबियार की भूमिका के बारे में भी बताया।

उन्होंने याद किया,

"मेरी हाल की जर्मनी यात्रा के दरमियान मुझे संवैधानिक न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश से मिलने का अवसर मिला और यदि कोई गोलकनाथ का अध्ययन करता है, तो मूल विचार एक जर्मन लेखक से आते हैं। जर्मनी में वे जज इस बात पर ध्यान देने में बहुत रुचि रखते हैं कि जर्मनी में क्या प्रस्तावित किया गया था, बुनियादी संरचना सिद्धांत को हमारे संवैधानिक कानून का एक हिस्सा स्वीकार कर लिया गया है। इतना ही नहीं हमने कुछ संवैधानिक संशोधनों को इस आधार पर अलग रखा है कि, जैसे राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग, यह बुनियादी ढांचे का उल्लंघन करता है। इस विचार की वकालत पहली बार गोलकनाथ में किसी और ने नहीं बल्कि एमके नांबियार ने की थी।"

उल्लेखनीय है कि जस्टिस उदय उमेश ललित भारत के 49वें चीफ जस्टिस हैं। वह उन छह सीनियर एडवोकेट्स में से एक थे, जिन्हें सीधे सुप्रीम कोर्ट के जज के रूप में पदोन्नत किया गया था। वह भारत के मुख्य न्यायाधीश के रूप में 74 दिनों के कार्यकाल के बाद 8 नवंबर को पद छोड़ने वाले हैं।

उनका पूरा लेक्चर यहां देखें

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