'ताजमहल तेजो महालय शिव मंदिर है': सर्वे के लिए वकील आयुक्त नियुक्त करने से इनकार के खिलाफ हाईकोर्ट पहुंची याचिका

Update: 2026-07-04 09:42 GMT

ताजमहल को प्राचीन शिव मंदिर 'तेजो महालय' बताए जाने वाले मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट में एक याचिका दायर की गई।

इस याचिका में आगरा की अदालत के उस आदेश को चुनौती दी गई, जिसमें ताजमहल का निरीक्षण, छायांकन और वीडियो रिकॉर्डिंग कराने के लिए वकील आयुक्त नियुक्त करने की मांग खारिज कर दी गई।

मामले पर सोमवार को सुनवाई होने की संभावना है।

यह याचिका भगवान श्री अग्रेश्वर महादेव नागनाथेश्वर विराजमान की ओर से उनके 'नेक्स्ट फ्रेंड' अधिवक्ता हरिशंकर जैन और अन्य श्रद्धालुओं ने दाखिल की।

याचिकाकर्ताओं ने वर्ष 2015 में आगरा की सिविल कोर्ट में वाद दायर कर दावा किया था कि विश्व प्रसिद्ध ताजमहल वास्तव में 'तेजो महालय' नाम का प्राचीन शिव मंदिर है।

उन्होंने अदालत से घोषणा करने की मांग की थी कि ताजमहल एक हिंदू मंदिर है और हिंदू समुदाय को वहां दर्शन और पूजा करने की अनुमति दी जाए। उनका कहना था कि संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत उन्हें पूजा-अर्चना का मौलिक अधिकार प्राप्त है।

वर्ष 2019 में वाद की सुनवाई के दौरान ताजमहल का सर्वे कराने के लिए वकील आयुक्त नियुक्त करने का आवेदन दिया गया। हालांकि, आगरा की सिविल अदालत ने यह कहते हुए आवेदन खारिज कर दिया कि याचिकाकर्ताओं ने संबंधित भूमि से जुड़े राजस्व अभिलेख, जैसे खसरा और खतौनी, प्रस्तुत नहीं किए हैं। साथ ही वाद में वर्णित भूमि की सीमा और क्षेत्रफल प्रतिवादियों के अभिलेखों से मेल नहीं खाते।

इसके बाद इस आदेश के खिलाफ दायर पुनरीक्षण याचिका को भी अप्रैल 2026 में आगरा की जिला कोर्ट ने सुनवाई योग्य नहीं माना।

अब इन दोनों आदेशों को चुनौती देते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट में दायर याचिका में मूल वाद में किए गए कई ऐतिहासिक और स्थापत्य संबंधी दावों का उल्लेख किया गया।

याचिकाकर्ताओं का दावा है कि 'तेजो महालय' नामक प्राचीन मंदिर का निर्माण वर्ष 1155-56 में राजा परमर्दी देव ने कराया था। बाद में यह राजा मानसिंह और फिर जयपुर के राजा जयसिंह के अधिकार में आया। इसके बाद मुगल शासक शाहजहां ने इस भवन को राजा जयसिंह से लेकर अपनी पत्नी की याद में स्मारक के रूप में परिवर्तित कराया और इस दौरान इसमें कुछ इस्लामी स्थापत्य तत्व जोड़े गए।

याचिका में यह भी दावा किया गया कि ताजमहल में 109 से अधिक ऐसे पुरातात्विक और ऐतिहासिक संकेत मौजूद हैं, जो इसे हिंदू मंदिर बताते हैं। इसमें संगमरमर के गुंबद पर कलश और कमल की आकृतियों, दक्षिण-पूर्वी कोने में कथित गौशाला तथा अन्य स्थापत्य विशेषताओं का उल्लेख किया गया।

याचिकाकर्ताओं ने यह भी आरोप लगाया कि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने मुसलमानों को शुक्रवार के दिन नमाज की अनुमति दी है, जबकि स्मारक के कई हिस्सों को बंद रखा गया है और आम लोगों की पहुंच सीमित है।

हाईकोर्ट में दायर याचिका में कहा गया कि अधिवक्ता आयुक्त नियुक्त करने से इनकार करते समय निचली अदालत ने ऐसे आधारों पर निर्णय दिया, जिनका इस आवेदन से कोई संबंध नहीं था।

याचिकाकर्ताओं का कहना है कि ताजमहल की पहचान को लेकर कोई विवाद नहीं है और उसके स्थापत्य स्वरूप, बंद कमरों तथा अन्य भौतिक विशेषताओं को केवल मौखिक गवाही से साबित नहीं किया जा सकता।

याचिका में कहा गया कि चूंकि ताजमहल एक संरक्षित स्मारक है और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के नियंत्रण में है, इसलिए याचिकाकर्ताओं को स्वतंत्र रूप से छायांकन या वीडियो रिकॉर्डिंग की अनुमति नहीं है। ऐसे में निष्पक्ष सुनवाई के लिए अदालत द्वारा अधिवक्ता आयुक्त, छायाकार और वीडियो रिकॉर्डिंग की व्यवस्था आवश्यक है।

याचिकाकर्ताओं ने हाईकोर्ट से आगरा की दोनों अदालतों के आदेश रद्द करने और अधिवक्ता आयुक्त नियुक्त करने संबंधी आवेदन पर गुण-दोष के आधार पर नए सिरे से निर्णय का निर्देश देने की मांग की।

साथ ही अंतरिम राहत के रूप में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के महानिदेशक को ताजमहल के अंदर और बाहर की तस्वीरें याचिकाकर्ताओं की उपस्थिति में खिंचवाकर अदालत के समक्ष प्रस्तुत करने का निर्देश देने की भी मांग की गई।

हालांकि, यह उल्लेखनीय है कि याचिका में किए गए सभी दावे याचिकाकर्ताओं के आरोप हैं। इन दावों की सत्यता पर अभी किसी अदालत ने अंतिम निर्णय नहीं दिया है।

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