BCI चेयरमैन के 'सीमाहीन' कार्यकाल के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका, काउंसिल के कामकाज की समीक्षा की भी मांग
NALSAR 2026 के ग्रेजुएट्स के खिलाफ हाल ही में जारी निर्देशों को लेकर BCI चेयरमैन मनन कुमार मिश्रा को भारी जन-आक्रोश का सामना करना पड़ा है। इसी बीच सुप्रीम कोर्ट में एक रिट याचिका दायर की गई। इसमें उन प्रावधानों को चुनौती दी गई, जो बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) और स्टेट बार काउंसिल्स के शीर्ष पदों पर एक ही व्यक्ति को लगातार बने रहने की अनुमति देते हैं।
याचिकाकर्ता एडवोकेट एम. वरधन ने तर्क दिया कि चुने हुए प्रतिनिधियों का लंबे समय तक पद पर बने रहना, चुनाव में देरी और कुल कार्यकाल की सीमा का न होना इन वैधानिक निकायों के लोकतांत्रिक और प्रतिनिधि स्वरूप को कमजोर करता है।
संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत दायर इस याचिका में एडवोकेट्स एक्ट, 1961 की धारा 4(3) के तहत काम करने के तरीके को चुनौती दी गई। यह धारा BCI सदस्यों को "अपना उत्तराधिकारी चुने जाने तक" पद पर बने रहने की अनुमति देती है, खासकर तब जब चुनाव में देरी होती है। याचिकाकर्ता का तर्क है कि संस्थागत शून्यता (institutional vacuum) को रोकने के लिए बनाए गए प्रावधान का इस्तेमाल मौजूदा पदाधिकारियों को अनिश्चित काल तक पद पर बनाए रखने के लिए नहीं किया जा सकता।
एडवोकेट्स एक्ट की धारा 8 और 8A का हवाला देते हुए याचिकाकर्ता ने बताया कि स्टेट बार काउंसिल के सदस्यों का कार्यकाल पांच साल का होता है, जिसमें विशेष परिस्थितियों में छह महीने से अधिक का वैधानिक विस्तार नहीं दिया जा सकता। धारा 8A में प्रावधान है कि यदि निर्धारित अवधि के भीतर चुनाव नहीं होते हैं तो एक विशेष समिति का गठन किया जाएगा और समिति को छह महीने के भीतर चुनाव कराने होंगे, जो विस्तार के वैधानिक तंत्र के अधीन होगा।
याचिका में 'बार काउंसिल ऑफ इंडिया सर्टिफिकेट एंड प्लेस ऑफ प्रैक्टिस (वेरिफिकेशन) रूल्स, 2015' के नियम 32 पर भी चिंता जताई गई है, जिसे BCI ने जून 2023 में बदला था।
याचिका के अनुसार, बदले हुए नियम 32 ने स्टेट बार काउंसिल्स के चुने हुए सदस्यों और पदाधिकारियों को धारा 8 के तहत निर्धारित विस्तारित कार्यकाल से आगे भी पद पर बने रहने में सक्षम बनाया, खासकर तब जब वकीलों का सत्यापन या मतदाता सूची तैयार करने का काम अधूरा रह गया हो। इस नियम में सत्यापन के लिए अतिरिक्त 18 महीने और उसके बाद चुनाव के लिए छह महीने की अवधि का प्रावधान है।
याचिकाकर्ता का तर्क है कि अधीनस्थ नियामक ढांचा संसद द्वारा एडवोकेट्स एक्ट की धारा 8 और 8A के तहत निर्धारित कार्यकाल को नहीं बढ़ा सकता। इसलिए याचिका में नियम 32 पर सवाल उठाया गया है। तर्क यह है कि इसके तहत होने वाली वेरिफिकेशन प्रक्रिया का इस्तेमाल चुनाव टालने और मौजूदा निकायों का कार्यकाल बढ़ाने के लिए किया जा सकता है।
याचिका में वकीलों के वेरिफिकेशन से जुड़ी सुप्रीम कोर्ट की पिछली कार्यवाही का ज़िक्र किया गया, जिसमें 'अजयिंदर सांगवान और अन्य बनाम बार काउंसिल ऑफ़ दिल्ली' का मामला भी शामिल है। इसमें कहा गया कि कोर्ट ने निर्देश दिया कि वेरिफिकेशन और चुनाव एक साथ होने चाहिए, न कि वेरिफिकेशन की वजह से चुनाव प्रक्रिया अनिश्चित काल के लिए रुक जाए। इसमें सुप्रीम कोर्ट के 2023 के 'अजय शंकर श्रीवास्तव बनाम बार काउंसिल ऑफ़ इंडिया' मामले के फ़ैसले का भी ज़िक्र है, जिसमें वेरिफिकेशन प्रक्रिया की निगरानी के लिए पूर्व जस्टिस दीपक गुप्ता की अध्यक्षता में एक हाई-पावर्ड कमेटी बनाई गई।
BCI लीडरशिप में उन्हीं लोगों का बने रहना
याचिकाकर्ता का कहना है कि BCI नियमों के नियम 12(2) में चेयरमैन और वाइस-चेयरमैन के लिए दो साल का कार्यकाल तय किया गया, लेकिन इन पदों पर बार-बार बने रहने की कुल सीमा तय नहीं की गई।
याचिकाकर्ता ने बताया कि हाल के दशकों में शीर्ष पदों पर केवल कुछ ही राज्यों से जुड़े प्रतिनिधि रहे हैं। इसमें खास तौर पर सीनियर एडवोकेट मनन कुमार मिश्रा की मौजूदा चेयरमैनशिप का ज़िक्र किया गया, जो 9 नवंबर, 2014 से चली आ रही है। हालांकि, याचिकाकर्ता ने साफ़ किया कि यह चुनौती किसी व्यक्ति की काबिलियत के ख़िलाफ़ नहीं है, बल्कि एक ऐसी व्यवस्था न होने के ख़िलाफ़ है, जो समय-समय पर लीडरशिप में बदलाव और ज़्यादा क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करे।
याचिका में चेयरमैन और वाइस-चेयरमैन के लिए एक साल के कार्यकाल का प्रस्ताव है, जिसमें जीवन भर में अधिकतम तीन कार्यकाल की सीमा तय करने और अलग-अलग राज्यों और क्षेत्रों के प्रतिनिधियों को शीर्ष पद संभालने का मौका देने के लिए रोटेशनल सिस्टम (बारी-बारी से पद संभालने की व्यवस्था) अपनाने की बात कही गई।
मांगी गई राहतें
याचिकाकर्ता ने यह घोषणा करने की मांग की कि धारा 4(3) का प्रावधान उस हद तक असंवैधानिक है, जहां यह BCI सदस्यों को अनिश्चित काल तक या अनुचित रूप से लंबे समय तक पद पर बने रहने की अनुमति देता है, या फिर इस प्रावधान को केवल एक अंतरिम व्यवस्था के तौर पर देखा जाना चाहिए।
याचिका में BCI चेयरमैन और वाइस-चेयरमैन के लिए एक साल के कार्यकाल, जीवन भर में अधिकतम तीन कार्यकाल की सीमा, चेयरमैनशिप के लिए पारदर्शी रोटेशनल सिस्टम और वैकल्पिक पदों या अंतरिम व्यवस्थाओं के ज़रिए कार्यकाल की सीमा से बचने के प्रयासों को रोकने के उपाय करने के निर्देश भी मांगे गए।
याचिकाकर्ता ने एक स्वतंत्र और समय-समय पर होने वाली संस्थागत समीक्षा व्यवस्था की भी मांग की, जिसमें BCI द्वारा एडवोकेट्स एक्ट का पालन, इसके पदाधिकारियों के कामकाज, कानूनी शिक्षा के नियमन, वित्तीय प्रशासन और सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के पालन की जांच शामिल हो।
बता दें, पिछले साल सुप्रीम कोर्ट ने इसी याचिकाकर्ता द्वारा दायर एक अन्य याचिका पर राज्य बार काउंसिल के चुनाव कराने का निर्देश दिया था।
यह याचिका एडवोकेट राजेश सिंह चौहान ने दायर की।