हेट स्पीच ऑडियो से वॉयस मिलान के लिए यूपी के DIG को हैदराबाद फॉरेंसिक लैब में पेश होने का सुप्रीम कोर्ट का आदेश
सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में तेलंगाना फॉरेंसिक साइंस लैबोरेटरी (TGFSL) को निर्देश दिया कि वह उत्तर प्रदेश पुलिस के एक अधिकारी पर कथित तौर पर मुस्लिम-विरोधी टिप्पणी करने वाले ऑडियो क्लिप और उसके वॉयस सैंपल की फॉरेंसिक जांच रिपोर्ट सीलबंद लिफाफे में अदालत के समक्ष प्रस्तुत करे। कोर्ट ने उत्तर प्रदेश के डीआईजी संजीव त्यागी (जो संबंधित समय में बिजनौर के पुलिस अधीक्षक थे) को 9 मार्च 2026 को सुबह 11 बजे हैदराबाद स्थित TGFSL के निदेशक के समक्ष उपस्थित होकर अपना वॉयस सैंपल देने का निर्देश दिया। साथ ही, याचिकाकर्ता इस्लामुद्दीन अंसारी—जिसके फोन में कथित ऑडियो क्लिप मौजूद था—को भी उसी दिन उपस्थित रहने की अनुमति दी गई ताकि फॉरेंसिक अधिकारियों को क्लिप खोजने में सहायता मिल सके।
अदालत ने कहा कि जांच पूरी होने के बाद लैब रिपोर्ट के साथ ऑडियो का ट्रांसक्रिप्ट भी सीलबंद लिफाफे में प्रस्तुत किया जाए। साथ ही यह भी जांचने को कहा गया कि याचिकाकर्ता के फोन से उक्त क्लिप से संबंधित कोई सामग्री हटाई तो नहीं गई है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि चूंकि जांच न्यायालय के आदेश के तहत हो रही है, इसलिए किसी अतिरिक्त “लेटर ऑफ एडवाइस” की आवश्यकता नहीं है।
जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की खंडपीठ इस्लामुद्दीन अंसारी द्वारा दायर याचिका में दायर एक आवेदन पर सुनवाई कर रही थी। अंसारी के खिलाफ उक्त ऑडियो क्लिप से संबंधित अफवाह फैलाने के आरोप में आपराधिक मामला दर्ज किया गया था, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने 8 दिसंबर 2025 को रद्द कर दिया था। कोर्ट ने पाया कि एफआईआर उस समय दर्ज की गई जब अंसारी ने कथित आपत्तिजनक ऑडियो को लेकर कानूनी कार्रवाई करने की बात कही थी।
बाद में अदालत को बताया गया कि जिस मोबाइल फोन में ऑडियो रिकॉर्ड था, वह पहले से ही पुलिस की हिरासत में है। इस पर कोर्ट ने बिजनौर के एसपी को निर्देश दिया कि जब्त डिवाइस को सुरक्षित रूप से हैदराबाद स्थित फॉरेंसिक लैब तक पहुंचाया जाए।
यह मामला मार्च 2020 के COVID-19 लॉकडाउन काल का है, जब अंसारी ने कथित रूप से उक्त ऑडियो क्लिप तत्कालीन एसपी बिजनौर को भेजकर यह पुष्टि मांगी थी कि क्या क्लिप में आवाज उनकी है। इसके बाद अंसारी के खिलाफ आईपीसी की धारा 505 और आईटी एक्ट की धारा 67 के तहत मामला दर्ज किया गया, जिसमें आरोप था कि उन्होंने सांप्रदायिक वैमनस्य फैलाने के उद्देश्य से अफवाह फैलाई। 2021 में चार्जशीट दाखिल होने और मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा संज्ञान लेने के बाद, इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा राहत न मिलने पर अंसारी सुप्रीम कोर्ट पहुंचे।