BREAKING| Assam FIR Case: सुप्रीम कोर्ट ने लगाई पवन खेड़ा की अग्रिम ज़मानत पर रोक
सुप्रीम कोर्ट ने तेलंगाना हाईकोर्ट के आदेश पर रोक लगाई, जिसमें कांग्रेस नेता पवन खेड़ा को ट्रांज़िट अग्रिम ज़मानत दी गई। यह ज़मानत असम पुलिस द्वारा दर्ज FIR के सिलसिले में दी गई थी। यह FIR असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा की पत्नी रिनिकी भुइयां सरमा की शिकायत पर दर्ज की गई। खेड़ा ने आरोप लगाया था कि रिनिकी के पास अलग-अलग देशों के कई पासपोर्ट हैं।
जस्टिस जेके माहेश्वरी और जस्टिस अतुल एस चांदुरकर की बेंच ने हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ असम राज्य द्वारा दायर याचिका पर नोटिस जारी करते हुए यह अंतरिम आदेश पारित किया।
बेंच ने कहा कि अगर खेड़ा असम में अधिकार क्षेत्र रखने वाली अदालत में अग्रिम ज़मानत के लिए आवेदन करते हैं तो सुप्रीम कोर्ट द्वारा पारित इस अंतरिम आदेश का ऐसे आवेदन पर विचार करने की प्रक्रिया पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा।
असम राज्य की ओर से पेश हुए सॉलिसिटर जनरल (एसजी) तुषार मेहता ने दलील दी कि खेड़ा की याचिका में इस बात का कोई ज़िक्र नहीं था कि तेलंगाना में क्षेत्रीय अधिकार क्षेत्र (Territorial Jurisdiction) कैसे बनता है।
एसजी ने यह भी कहा कि हाईकोर्ट इस तथ्य को नज़रअंदाज़ कर गया कि अपराधों में से एक के लिए अधिकतम 10 साल की कैद की सज़ा का प्रावधान है।
जस्टिस माहेश्वरी ने टिप्पणी की कि सुनवाई के दौरान खेड़ा द्वारा जमा किए गए नोट में कहा गया कि उनकी पत्नी हैदराबाद में रह रही हैं। हालांकि, एसजी ने जवाब दिया कि उनकी पत्नी के आधार कार्ड में उन्हें दिल्ली का निवासी दिखाया गया।
एसजी ने कहा,
"अगर ऐसा है, तो कोई भी व्यक्ति पूरे देश में कहीं भी संपत्ति खरीद सकता है। अपनी पसंद की जगह से अग्रिम ज़मानत मांग सकता है। यह 'फोरम-शॉपिंग' है, अगर 'फोरम-चूज़िंग' नहीं तो..." उन्होंने आगे कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने 'प्रिया इंदोरिया' मामले में दिए गए फैसले में ऐसी प्रथाओं को गलत ठहराया।
एसजी ने कहा,
"यह प्रक्रिया का पूरी तरह से दुरुपयोग है। वह यह नहीं बताते कि वह असम क्यों नहीं जा सकते। याचिका में उन्होंने यह भी नहीं कहा है कि उनकी पत्नी की (हैदराबाद में) कोई संपत्ति है।"
जस्टिस माहेश्वरी ने कहा,
"[हाईकोर्ट के आदेश से] हमें हैरानी है।"
जस्टिस माहेश्वरी ने यह भी बताया कि खेड़ा ने अग्रिम ज़मानत की अवधि बढ़ाने के लिए एक आवेदन दायर किया।
संक्षेप में मामला
10 अप्रैल को तेलंगाना हाईकोर्ट की जस्टिस के. सुजाना ने खेड़ा को एक हफ़्ते के लिए अग्रिम ज़मानत दी। यह ज़मानत कुछ शर्तों के साथ दी गई, जिनमें यह शर्त भी शामिल थी कि वह उचित राहत पाने के लिए गुवाहाटी हाईकोर्ट का दरवाज़ा खटखटाएंगे।
हाईकोर्ट ने ज़मानत याचिका की स्वीकार्यता को लेकर राज्य सरकार की दलील को खारिज किया और कहा कि संविधान के अनुच्छेद 21 को ध्यान में रखते हुए हाईकोर्ट अपनी अधिकार-क्षेत्र से बाहर भी सीमित 'ट्रांज़िट अग्रिम ज़मानत' दे सकता है, ताकि आरोपी सक्षम अदालत तक पहुंच सके।
हाईकोर्ट ने कहा,
"एडवोकेट जनरल की यह दलील कि याचिकाकर्ता सीधे असम की अदालतों में जा सकता है, सीमित सुरक्षा देने से इनकार करने का आधार नहीं बन सकती; खासकर तब, जब गिरफ़्तारी की उचित आशंका मौजूद हो। 'ट्रांज़िट अग्रिम ज़मानत' की अवधारणा को ठीक ऐसे ही हालात से निपटने के लिए विकसित किया गया, जहां आरोपी को सक्षम अधिकार-क्षेत्र वाली अदालत के समक्ष उचित कानूनी उपायों का लाभ उठाने में सक्षम बनाने के लिए तत्काल सुरक्षा की आवश्यकता होती है।"
इस फ़ैसले से असंतुष्ट होकर असम सरकार ने ज़मानत के आदेश को इस आधार पर चुनौती दी कि अग्रिम ज़मानत की याचिका हैदराबाद में दायर की गई, जबकि खेड़ा ने ऐसा कोई कारण नहीं बताया कि वह असम आकर वहां अग्रिम ज़मानत के लिए आवेदन क्यों नहीं कर सकते।
गुवाहाटी क्राइम ब्रांच पुलिस स्टेशन में भारतीय न्याय संहिता (BNS) की विभिन्न धाराओं के तहत FIR दर्ज की गई। इन धाराओं में 175 (चुनाव के संबंध में झूठा बयान), 35, 36, 318 (धोखाधड़ी), 338 (कीमती वसीयत, प्रतिभूति आदि की जालसाज़ी), 337 (अदालत के रिकॉर्ड या सार्वजनिक रजिस्टर आदि की जालसाज़ी), 340 (जाली दस्तावेज़ या इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड बनाना और उसे असली के तौर पर इस्तेमाल करना), 352 (शांति भंग करने के इरादे से जानबूझकर अपमान करना) और 356 (मानहानि) शामिल हैं।
7 अप्रैल को असम पुलिस खेड़ा की तलाश में तेलंगाना के हैदराबाद पहुंची थी। रिपोर्टों के अनुसार, असम पुलिस ने दिल्ली में खेड़ा के आवास का भी दौरा किया और वहां तलाशी ली।
Case Details: THE STATE OF ASSAM v. PAWAN KHERA | Diary No. - 22236/2026