सुप्रीम कोर्ट ने हिरासत में कथित यातना की CBI जांच की याचिका पर असम सरकार से जवाब मांगा
सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में असम सरकार और पांच आरोपी पुलिस अधिकारियों को याचिका पर नोटिस जारी किया। यह याचिका गुवाहाटी हाई कोर्ट के उस आदेश को चुनौती देते हुए दायर की गई, जिसमें दीपांकर गोगोई नाम के व्यक्ति को हिरासत में कथित तौर पर दी गई यातना की जांच सेंट्रल ब्यूरो ऑफ़ इन्वेस्टिगेशन (CBI) से कराने से इनकार किया गया।
जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की बेंच ने 24 अप्रैल को नोटिस जारी किया और याचिकाकर्ता (मृतक की बहन) को CBI को भी इस मामले में एक पक्ष बनाने की अनुमति दी। बेंच ने फिलहाल के लिए सब-डिविजनल ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट के सामने चल रही कार्यवाही पर भी रोक लगाई।
संक्षेप में तथ्य
याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट के 19 सितंबर, 2025 के आदेश को चुनौती दी। इस आदेश में हाईकोर्ट ने जांच को CBI को सौंपने, कोर्ट की निगरानी में जांच कराने और मुआवज़ा देने की याचिकाकर्ता की मांग खारिज की
याचिकाकर्ता ने गंभीर आरोप लगाए कि मृतक गोगोई को 2023 में, तत्कालीन SP की सीधी देखरेख और मिलीभगत से तिताबोर और जोरहाट सदर पुलिस स्टेशनों के कर्मियों द्वारा बार-बार अवैध रूप से हिरासत में रखा गया और 'थर्ड-डिग्री' यातना दी गई। यह सब दिसंबर 2023 में लिचुबारी स्थित एक आर्मी कैंटोनमेंट के पास हुए ग्रेनेड धमाके और प्रतिबंधित संगठन 'यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट ऑफ़ असम' (ULFA) के साथ मृतक के कथित संबंधों के मामले में किया गया।
दावा किया गया कि लगातार शारीरिक यातना और मानसिक अपमान के कारण, मृतक ने आत्महत्या कर ली।
याचिकाकर्ता ने एक शिकायत दर्ज कराई, जिसके आधार पर तत्कालीन SP के खिलाफ FIR दर्ज की गई। यह कहा गया कि राज्य पुलिस द्वारा की गई जांच पक्षपातपूर्ण थी। इसलिए सब-डिविजनल ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट ने पुलिस द्वारा दायर पहली 'फाइनल रिपोर्ट' खारिज की और सीनियर पुलिस अधिकारियों द्वारा दोबारा जांच करने का निर्देश दिया।
इसके बाद 30 अप्रैल, 2025 को दूसरी 'फाइनल रिपोर्ट' दायर की गई। हालांकि, आरोप है कि यह रिपोर्ट मजिस्ट्रेट के पिछले आदेश का उल्लंघन थी, क्योंकि इसमें किसी भी वरिष्ठ पुलिस अधिकारी को जांच के लिए नियुक्त नहीं किया गया। फिर भी इस दूसरी रिपोर्ट के आधार पर मजिस्ट्रेट ने एक 'शिकायत मामला' (Complaint Case) दर्ज करने का आदेश दिया।
इस बीच याचिकाकर्ता पहले ही हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटा चुकी थी और जांच को CBI को सौंपने की मांग कर रही थी। हाईकोर्ट ने 'एमिक्स क्यूरी' (अदालत का सहायक) नियुक्त किया, जिसने अपनी रिपोर्ट में मौखिक रूप से कहा कि पुलिस ने केस डायरी के साथ छेड़छाड़ की थी, जैसा कि 'स्पेशल लीव पिटीशन' में बताया गया। आखिरकार, हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता द्वारा उठाई गई अपील खारिज की।
याचिका में कहा गया,
"विनम्रतापूर्वक निवेदन है कि ऐसे मामले में, जिसमें सीनियर पुलिस अधिकारियों द्वारा हिरासत में यातना दिए जाने के गंभीर आरोप हों और जिसके कारण किसी की मृत्यु हो गई हो—और जहां राज्य की जांच पक्षपात, हितों के टकराव और छेड़छाड़ से दूषित हो—वहाँ हाई कोर्ट को अनुच्छेद 226 के तहत अपने असाधारण क्षेत्राधिकार का प्रयोग करते हुए CBI जांच या एक स्वतंत्र SIT के गठन का निर्देश देना चाहिए था, ताकि जनता का विश्वास बहाल हो सके और न्याय सुनिश्चित हो सके।"
Case Details: RIMLY GOGOI SAIKIA v. STATE OF ASSAM & ORS.|SPECIAL LEAVE PETITION (CRIMINAL) Diary No. 17597/2026