हर धार्मिक प्रथा अदालत में चुनौती दी जाएगी तो भारतीय सभ्यता का क्या होगा?: सबरीमाला मामले में सुप्रीम कोर्ट

Update: 2026-05-07 07:47 GMT

सबरीमाला संदर्भ मामले की सुनवाई के 13वें दिन सुप्रीम कोर्ट ने धार्मिक मामलों में न्यायिक हस्तक्षेप को लेकर गंभीर चिंता जताई। कोर्ट ने कहा कि यदि हर धार्मिक प्रथा और विवाद को संवैधानिक अदालतों में चुनौती दी जाने लगे, तो भारत की सभ्यता और सामाजिक संतुलन पर असर पड़ सकता है।

9-न्यायाधीशों की संविधान पीठ दाऊदी बोहरा समुदाय के धार्मिक प्रमुख 'दाई' की बहिष्कार (Excommunication) की शक्ति को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई कर रही थी। वरिष्ठ अधिवक्ता राजू रामचंद्रन ने दलील दी कि इस शक्ति का मनमाने ढंग से इस्तेमाल किया गया है, जिससे समुदाय के सदस्यों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन होता है।

सुनवाई के दौरान जस्टिस बीवी नागरत्ना ने कहा कि भारत एक ऐसी सभ्यता है जहां धर्म समाज से गहराई से जुड़ा हुआ है। उन्होंने कहा कि यदि हर धार्मिक प्रथा को अदालत में चुनौती दी जाने लगे, तो “यह सभ्यता किस दिशा में जाएगी” यह चिंता का विषय है। जस्टिस एमएम सुंदरेश ने भी कहा कि अगर अदालतें हर धार्मिक विवाद में हस्तक्षेप करेंगी तो “धर्म टूट जाएंगे।”

इस पर वरिष्ठ अधिवक्ता रामचंद्रन ने जवाब दिया कि भारत एक संविधान द्वारा संचालित सभ्यता है और जो भी प्रथा संविधान के मूल्यों के खिलाफ होगी, उसे स्वीकार नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि अदालतों का यह दायित्व है कि वे मौलिक अधिकारों के उल्लंघन की स्थिति में हस्तक्षेप करें।

रामचंद्रन ने दलील दी कि बहिष्कार की प्रथा किसी व्यक्ति के सामाजिक जीवन, गरिमा और Article 21 के तहत जीवन के अधिकार को प्रभावित करती है। उन्होंने कहा कि किसी सदस्य का बहिष्कार उसके लिए “सिविल डेथ” जैसा प्रभाव पैदा करता है।

कोर्ट ने यह भी सवाल उठाया कि क्या धार्मिक प्रमुख के फैसलों की “अनुपातिकता” (proportionality) का परीक्षण अदालत कर सकती है। वहीं, रामचंद्रन ने कहा कि जब किसी धार्मिक प्रथा का असर व्यक्ति की गरिमा और मौलिक अधिकारों पर पड़ता है, तब अदालतें हस्तक्षेप कर सकती हैं।

मामले की सुनवाई जारी है।

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