ट्रांसजेंडर संशोधन अधिनियम, 2026 को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, हाईकोर्टों की कार्यवाही पर लगाई रोक

Update: 2026-06-15 13:45 GMT

सुप्रीम कोर्ट ने ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के अधिकारों से जुड़े संशोधन कानून, 2026 को चुनौती देने वाली विभिन्न याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए देश के अलग-अलग हाईकोर्टों में लंबित कार्यवाहियों पर अंतरिम रोक लगाई।

साथ ही केंद्र सरकार की उस याचिका पर नोटिस जारी किया, जिसमें इन सभी मामलों को एक स्थान पर स्थानांतरित करने की मांग की गई।

चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत और जस्टिस वी. मोहना की अवकाशकालीन पीठ ने सोमवार को यह आदेश पारित किया।

पीठ ने संबंधित पक्षों को नोटिस जारी करते हुए कहा कि राजस्थान, कर्नाटक, केरल और दिल्ली हाईकोर्ट में लंबित याचिकाओं पर फिलहाल आगे की कार्यवाही नहीं होगी।

सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि विभिन्न हाईकोर्टों में एक ही कानून की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई, इसलिए इन मामलों की एक साथ सुनवाई उचित होगी।

उन्होंने यह भी आग्रह किया कि यदि मामलों को सुप्रीम कोर्ट में स्थानांतरित किया जाता है तो उन्हें तीन जजों की पीठ के समक्ष रखा जाए।

तुषार मेहता ने दलील दी कि वर्ष 2014 में दिए गए नालसा बनाम भारत संघ फैसले जिस पर याचिकाकर्ता भरोसा कर रहे हैं, वह दो जजों की पीठ का निर्णय था। ऐसे में इस मुद्दे पर व्यापक विचार के लिए बड़ी पीठ की आवश्यकता हो सकती है। उन्होंने कहा कि हाईकोर्टों के लिए उस फैसले से अलग दृष्टिकोण अपनाना कठिन होगा।

पीठ ने संकेत दिया कि वह या तो सभी याचिकाओं को सुप्रीम कोर्ट में स्थानांतरित कर सकती है या फिर उन्हें एक साथ जोड़कर किसी एक हाईकोर्ट को सुनवाई के लिए सौंप सकती है।

सुनवाई के दौरान दिल्ली हाईकोर्ट में याचिकाकर्ता डॉ. चंद्रेश जैन की दलीलें भी संक्षेप में सुनी गईं। उन्होंने कहा कि वर्ष 2026 का संशोधन अधिनियम संविधान के विपरीत है, क्योंकि यह ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के लिए लैंगिक पहचान के आत्म-निर्धारण के अधिकार को कमजोर करता है, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने नालसा फैसले में मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता दी।

उनका यह भी कहना है कि संशोधन का कोई वैज्ञानिक या चिकित्सीय आधार नहीं है।

गौरतलब है कि पिछले महीने सुप्रीम कोर्ट ने ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के अधिकार संरक्षण (संशोधन) अधिनियम, 2026 को चुनौती देने वाली मूल याचिकाओं पर केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया था।

इन याचिकाओं में आरोप लगाया गया कि संशोधन कानून ने ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के लिए लैंगिक पहचान के आत्म-निर्धारण की अवधारणा को समाप्त किया, जो नालसा फैसले की भावना के विपरीत है।

अब इस महत्वपूर्ण संवैधानिक विवाद पर अंतिम निर्णय से पहले सुप्रीम कोर्ट यह तय करेगा कि देशभर में लंबित सभी याचिकाओं की सुनवाई किस मंच पर और किस प्रकार की जाए।

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