'वे आपका मोबाइल क्यों नहीं चेक कर सकते?' सुप्रीम कोर्ट ने ED द्वारा ज़ब्त फोन की जांच पर रोक लगाने से किया इनकार
सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को कोलकाता के बिजनेसमैन जितेंद्र मेहता को प्रवर्तन निदेशालय (ED) द्वारा उनके ज़ब्त मोबाइल फोन के कंटेंट की जांच से अंतरिम सुरक्षा देने से इनकार किया। कोर्ट ने उनकी उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें कहा गया कि डिवाइस की बिना रोक-टोक फॉरेंसिक जांच संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत उनके निजता के अधिकार का उल्लंघन करेगी।
चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस विपुल पंचोली की बेंच ने ED द्वारा मेहता के खिलाफ ज़ब्ती और जारी किए गए समन पर नोटिस जारी किया।
चीफ जस्टिस कांत ने कहा,
“निजता का उल्लंघन कहां है? जब जांच कानूनी तौर पर की जा रही है तो एक एजेंसी को जांच करने का अधिकार है। वे आपके मोबाइल से यह पता क्यों नहीं लगा सकते कि जानकारी क्या है? सिवाय इसके कि उस मोबाइल में कुछ जानकारी हो, जिसका आपसे जुड़े कथित अपराध से कोई लेना-देना नहीं है, उस डेटा को जनता के सामने उजागर नहीं किया जा सकता, सार्वजनिक डोमेन में नहीं लाया जा सकता, किसी भी रिपोर्ट का हिस्सा नहीं बनाया जा सकता। तो उस हद तक, आपके पास निजता का अधिकार है।”
उन्होंने टिप्पणी की कि कोर्ट निर्दोष नागरिकों की रक्षा करने में पूरी तरह सक्षम है। ऐसा खुद भी कर सकता है, लेकिन ऐसी सुरक्षा उन लोगों को नहीं मिल सकती जो गलत काम में शामिल हैं।
उन्होंने टिप्पणी की,
“हम जानते हैं कि अपने निर्दोष नागरिकों की रक्षा कैसे करनी है। हम खुद भी अपने निर्दोष नागरिकों की रक्षा कर सकते हैं। लेकिन जो लोग किसी अपराध में शामिल हैं।”
हालांकि याचिकाकर्ता के वकील, सीनियर एडवोकेट सी आर्यमा सुंदरम ने आपत्ति जताते हुए कहा कि कोर्ट याचिकाकर्ता के खिलाफ अपराध की धारणा पर आगे बढ़ रहा है, लेकिन कोर्ट ने अंतरिम राहत देने से इनकार किया।
मेहता ने ED द्वारा 8 जनवरी, 2026 को उनके आवास पर की गई तलाशी के दौरान उनके iPhone 15 Pro Max को ज़ब्त करने को चुनौती देते हुए एक रिट याचिका दायर की। उन्होंने अधिनियम की धारा 50 के तहत 12 जनवरी, 2026 को जारी किए गए समन को भी चुनौती दी, जिसमें उन्हें ज़ब्त डिवाइस की फॉरेंसिक जांच के दौरान मौजूद रहने का निर्देश दिया गया।
याचिका में कहा गया कि उनके फोन से डेटा निकालने पर कोई रोक नहीं है, जो डिजिटल डिवाइस तक पहुंच को नियंत्रित करने वाले किसी भी कानूनी सुरक्षा उपायों की अनुपस्थिति में अनुच्छेद 21 के तहत उनके मौलिक निजता के अधिकार का उल्लंघन करता है। शुरुआत में याचिकाकर्ता की ओर से सीनियर एडवोकेट सीए सुंदरम ने कहा कि कोर्ट पहले से ही कई ऐसी याचिकाओं पर सुनवाई कर रहा है, जिनमें एक ही मुद्दा उठाया गया, यानी जब्त किए गए डिजिटल डिवाइस से डेटा निकालने के लिए कोई गाइडलाइन नहीं हैं।
उन्होंने तर्क दिया कि याचिकाकर्ता का मोबाइल फोन जब्त कर लिया गया, जबकि उसके खिलाफ कोई अपराध दर्ज नहीं किया गया। उन्होंने कहा कि याचिकाकर्ता को जारी किए गए समन में कहा गया कि जब्त किए गए फोन का फोरेंसिक जांच किया जाएगा, जिसका मतलब था कि याचिकाकर्ता के पूरे पर्सनल डेटा तक बिना किसी रोक-टोक के पहुंच होगी।
जस्टिस सूर्यकांत ने सवाल किया कि अगर जांच कानूनी तरीके से की जा रही है तो प्राइवेसी के उल्लंघन का सवाल कहां से उठता है।
सुंदरम ने जवाब दिया कि चिंता इस बात की है कि यह सुनिश्चित करने के लिए कोई सुरक्षा उपाय या तरीका नहीं है कि केवल संबंधित सामग्री तक ही पहुंचा जाए। उन्होंने तर्क दिया कि याचिकाकर्ता पर किसी अपराध का आरोप भी नहीं था और फोन इस अनुमान पर लिया गया कि इससे किसी दूसरे व्यक्ति के बारे में कुछ पता चल सकता है।
उन्होंने कहा कि PMLA की धारा 17 के लिए "विश्वास करने का कारण" ज़रूरी है और तलाशी और ज़ब्ती एक मनमानी या बिना वजह की पूछताछ में नहीं बदल सकती। उन्होंने दूसरे मामलों में कोऑर्डिनेट बेंचों द्वारा पारित पिछले अंतरिम आदेशों का हवाला दिया, जिनमें ज़ब्त किए गए डिवाइस से डेटा एक्सेस करने या कॉपी करने के खिलाफ़ सुरक्षा दी गई, जिसमें ऐसे मामले भी शामिल थे जिनमें संबंधित व्यक्ति आरोपी थे।
जस्टिस सूर्यकांत ने टिप्पणी की कि बड़ी रकम से जुड़े गंभीर आरोपों की जांच चल रही है। सवाल किया कि क्या ऐसी जांच के दौरान मोबाइल डिवाइस की भी जांच नहीं की जा सकती। उन्होंने यह भी कहा कि कोर्ट ने दूसरे मामलों में केस-टू-केस आधार पर सुरक्षा दी है।
जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि अगर एजेंसी याचिकाकर्ता के साथियों पर लगाए गए अपराध से संबंधित कोई भी जानकारी इस्तेमाल करती है तो याचिकाकर्ता दावा कर सकता है कि ऐसी जानकारी का खुलासा नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि याचिकाकर्ता उन लोगों से जुड़ा एक संदिग्ध है जिनकी पहले से ही जांच चल रही है।
जब सुंदरम ने इस बात पर ज़ोर दिया कि समन में उनके खिलाफ़ कोई आरोप नहीं बताया गया तो बेंच ने जवाब दिया कि ऐसे दावे करने का समय अभी आना बाकी है।
जस्टिस बागची ने कहा कि PMLA की धारा 19 के तहत गिरफ्तारी के विपरीत तलाशी के कारणों को तलाशी लिए गए व्यक्ति को बताने की कोई कानूनी ज़रूरत नहीं है। उन्होंने इस तर्क को खारिज कर दिया कि याचिकाकर्ता के खिलाफ़ ECIR की अनुपस्थिति से तलाशी अमान्य हो जाती है, यह कहते हुए कि ECIR किसी अपराध से संबंधित होता है, न कि किसी व्यक्ति से।
सुंदरम ने तर्क दिया कि अगर एजेंसी को फोन एक्सेस करने की अनुमति दी भी जाती है तो इसे जांच से संबंधित विशिष्ट कीवर्ड या मापदंडों तक सीमित रखा जाना चाहिए, जैसा कि पिछली कार्यवाही में सुझाव दिया गया। उन्होंने तर्क दिया कि फोन तक बिना किसी रोक-टोक के एक्सेस याचिकाकर्ता के अनुच्छेद 21 के तहत निजता के अधिकार का उल्लंघन करता है।
CJI कांत ने टिप्पणी की कि एजेंसी याचिकाकर्ता के पास यूं ही नहीं आई और एक मोबाइल फोन दोषी ठहराने वाला एक मज़बूत सबूत हो सकता है।
सुंदरम ने कहा कि उनके मामले में कोई मूल अपराध भी नहीं है और याचिकाकर्ता को अपना डिवाइस वापस नहीं मिल रहा, जबकि विभाग का उस पर पूरा नियंत्रण है। उन्होंने कहा कि एक बार फोन की जांच हो जाने के बाद, रिट याचिका बेकार हो जाएगी।
उन्होंने अगली सुनवाई की तारीख तक फोन की जांच पर सीमित अंतरिम रोक लगाने की मांग यह कहते हुए की कि मेहता को अगले दिन प्रवर्तन निदेशालय ने बुलाया। अगर इस बीच फोन एक्सेस किया गया तो रिट याचिका बेकार हो जाएगी। उन्होंने कोर्ट से गुज़ारिश की कि कम से कम अधिकारियों को तब तक फ़ोन खोलने से रोका जाए, जब तक वे यह न बता दें कि इसे किस आधार पर ज़ब्त किया गया।
हालांकि, कोर्ट उनकी बात से सहमत नहीं हुआ और अंतरिम सुरक्षा की अपील खारिज की। कोर्ट ने अगले मंगलवार को जवाब देने के लिए नोटिस जारी किया और रिट याचिका को इसी तरह के सवाल उठाने वाले दूसरे लंबित मामलों के साथ जोड़ दिया।
कोर्ट ने आदेश दिया,
"27.01.2026 को जवाब देने के लिए नोटिस जारी करें ताकि याचिकाकर्ता या उसके सह-आरोपी पर लगाए गए आरोपों की प्रकृति का पता चल सके, क्योंकि याचिका में दुर्भाग्य से बहुत ही चुनिंदा जानकारी दी गई।"
यह याचिका एडवोकेट ऑन रिकॉर्ड रोहिणी मूसा के ज़रिए दायर की गई।
Case Title – Jitendra Kumar Mehta v. Directorate of Enforcement and Ors.