यूपी के गृह विभाग के अपर मुख्य सचिव संजय प्रसाद को लेकर हाईकोर्ट के आदेश पर सुप्रीम कोर्ट की रोक
सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश के गृह विभाग के अपर मुख्य सचिव संजय प्रसाद के खिलाफ इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा की गई प्रतिकूल टिप्पणियों और उनकी भविष्य की नियुक्तियों के लिए उपयुक्तता का आकलन कराने संबंधी आदेश पर अंतरिम रोक लगाई।
जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस अतुल एस. चांदुरकर की पीठ ने संजय प्रसाद द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश के प्रभाव पर रोक लगाने का निर्देश दिया।
गौरतलब है कि 3 जून को इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस विनोद दिवाकर ने एक कड़ा आदेश पारित करते हुए संजय प्रसाद के आचरण पर गंभीर आपत्ति जताई थी।
हाईकोर्ट ने कहा कि उन्होंने अदालत के अधिकार को कमजोर करने का सुनियोजित और जानबूझकर प्रयास किया।
मामला एक बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका से जुड़ा था जिसमें एक महिला ने अपनी 15 वर्षीय बेटी को कथित अवैध हिरासत से मुक्त कराने की मांग की।
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट के संज्ञान में आया कि मामले में दाखिल आरोपपत्र में वास्तविक आरोपी का नाम शामिल नहीं किया गया। इस पर विचार करते हुए अदालत ने पाया कि जांच और आरोपपत्र उसके पूर्व के फैसले में दिए गए दिशा-निर्देशों के अनुरूप नहीं थे। उस फैसले में आपराधिक जांच को निष्पक्ष, वैज्ञानिक और कानूनी रूप से टिकाऊ बनाने के लिए विस्तृत निर्देश जारी किए गए।
इस संबंध में अदालत ने वरिष्ठ अधिकारी से स्पष्टीकरण मांगा। जवाब में संजय प्रसाद ने शपथपत्र दाखिल कर कहा कि राज्य सरकार संबंधित फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने का प्रस्ताव रखती है।
उन्होंने हाईकोर्ट से अनुरोध किया कि प्रस्तावित विशेष अनुमति याचिका पर सुप्रीम कोर्ट के निर्णय तक उस फैसले के अनुपालन से जुड़े कोई अतिरिक्त आदेश पारित न किए जाएं।
हालांकि, हाईकोर्ट ने मामले को स्थगित कर राज्य सरकार की प्रस्तावित याचिका की स्थिति जानने का इंतजार किया, लेकिन कई महीने बीत जाने के बावजूद अदालत को कोई जानकारी नहीं दी गई।
इस पर हाइकोर्ट ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि प्रस्तावित याचिका का हवाला वास्तविक कानूनी समाधान प्राप्त करने के लिए नहीं, बल्कि अदालत के निर्देशों के अनुपालन की समीक्षा टालने के लिए दिया गया।
अदालत ने कहा कि यह अदालत के अधिकार को कमजोर करने का एक सुनियोजित और जानबूझकर किया गया प्रयास प्रतीत होता है।
इसी आधार पर हाईकोर्ट ने अपने अनुपालन रजिस्ट्रार को आदेश की प्रति कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग को भेजने का निर्देश दिया था।
साथ ही कहा कि संजय प्रसाद की सेवा अभिलेख संबंधित नियुक्ति समिति के समक्ष रखी जाए, ताकि भविष्य की नियुक्तियों के लिए उनकी उपयुक्तता का आकलन किया जा सके।
अब सुप्रीम कोर्ट ने इस आदेश पर अंतरिम रोक लगाते हुए मामले की आगे सुनवाई के लिए याचिका स्वीकार की।