रिटायर चपरासी को यूपी सरकार ने 10 साल तक नहीं दी पेंशन, सुप्रीम कोर्ट ने फटकार लगाते हुए चीफ सेक्रेटरी से मांगी रिपोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में उत्तर प्रदेश सरकार को फटकार लगाई। कोर्ट ने इस बात पर हैरानी जताई कि रिटायरमेंट के बाद लगभग दस साल तक एक चपरासी को उसके रिटायरमेंट के बकाया पैसे नहीं दिए गए। कोर्ट ने चीफ सेक्रेटरी को निर्देश दिया कि वे इस देरी, इसके लिए जिम्मेदार अधिकारियों और राज्य सरकार द्वारा दिए जाने वाले मुआवजे के बारे में रिपोर्ट दाखिल करें।
जस्टिस के.वी. विश्वनाथन और जस्टिस अरुण पल्ली की बेंच स्पेशल लीव पिटिशन (SLP) पर सुनवाई कर रही थी। इस दौरान कोर्ट ने राज्य सरकार की कड़ी आलोचना करते हुए कहा कि "याचिकाकर्ता के साथ घोर अन्याय हुआ है।"
याचिकाकर्ता को 1984 में चपरासी के पद पर नियुक्त किया गया। 2016 में लगभग बत्तीस साल की सेवा के बाद वह रिटायर हो गए। उनकी सेवा पेंशन के योग्य थी और उन्होंने कई शिकायतें दर्ज कराकर अपनी पेंशन जारी करने का बार-बार अनुरोध किया था।
2018 में उन्होंने इलाहाबाद हाईकोर्ट में रिट याचिका दायर की और रिटायरमेंट के लाभों के भुगतान की मांग की। 2024 में हाईकोर्ट ने कार्यालय को निर्देश दिया कि वह राज्य सरकार के जवाबी हलफनामे (Counter Affidavit) का पता लगाए और उसे रिकॉर्ड पर रखे। हालांकि, इसके बाद मामला लिस्ट नहीं किया गया, जिसके चलते उन्होंने अक्टूबर 2025 में जल्द सुनवाई के लिए एक आवेदन दायर किया, जिसे बिना कोई तारीख तय किए अप्रैल 2026 में निपटा दिया गया। इसके बाद, उन्होंने 2024 के आदेश को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
सुप्रीम कोर्ट के समक्ष, याचिकाकर्ता की ओर से सीनियर एडवोकेट अनीता त्रिपाठी ने कहा कि नौ साल बाद, 2025 में केवल ग्रेच्युटी की राशि का भुगतान किया गया।
उत्तर प्रदेश सरकार ने अनुपालन हलफनामा (Compliance Affidavit) दायर किया, जिसमें कोर्ट ने विसंगति पाई। हलफनामे के पैराग्राफ 11 में कहा गया कि चूंकि याचिकाकर्ता 20.07.2009 और 30.11.2010 के बीच अनुपस्थित था, इसलिए केवल प्रोविजनल पेंशन मंजूर की गई, और उसने दस्तावेज जमा करने के अनुरोधों का कोई जवाब नहीं दिया। हालांकि, पैराग्राफ 12 में कहा गया कि उस अवधि के लिए उसका वेतन भुगतान किया गया, जिससे पता चलता है कि सेवा में कोई रुकावट नहीं थी। इस आधार पर, उनकी प्रोविज़नल पेंशन रद्द कर दी गई और फ़ाइनल पेंशन की सिफ़ारिश की गई।
यह भी बताया गया कि 2025 में याचिकाकर्ता के जनरल प्रोविडेंट फंड (GPF) के लिए ₹7,16,295 जारी किए गए थे। एक और अनुपालन हलफ़नामा (Compliance Affidavit) जमा किया गया जिसमें कहा गया कि याचिकाकर्ता को 2026 में पेंशन का बकाया और अन्य लाभों के तौर पर ₹29,06,663 दिए गए, और उन्हें महंगाई भत्ते (Dearness Allowance) के साथ ₹11,200 की नियमित मासिक पेंशन मिलेगी।
मामले के तथ्यों को देखने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने हैरानी जताई कि याचिकाकर्ता पिछले ग्यारह सालों से कैसे गुज़ारा कर रहा था। कोर्ट ने देखा कि भले ही रिट याचिका 2018 में दायर की गई, लेकिन पिछले आठ सालों में कुछ नहीं हुआ। कोर्ट ने कहा कि एक आदर्श नियोक्ता (Model Employer) के तौर पर राज्य की ज़िम्मेदारी थी कि वह याचिकाकर्ता के रिटायरमेंट पर पेंशन के कागज़ात तेज़ी से निपटाए, और ऐसा नहीं किया गया।
बेंच ने कहा,
"इसके विपरीत, याचिकाकर्ता के 20.07.2009 से 30.11.2010 तक शायद अनुपस्थित रहने का एक ऐसा मुद्दा उठाया गया, जिसका कोई आधार नहीं था। इसके परिणामस्वरूप एक प्रोविज़नल आदेश जारी हुआ। जल्द ही विभाग को अपनी गलती का एहसास हुआ और उन्होंने उसे सुधार लिया।"
कोर्ट ने रिकॉर्ड से यह जानकर हैरानी जताई कि रिटायरमेंट के बाद दस सालों तक, बिना किसी गलती के, याचिकाकर्ता को उसके रिटायरमेंट से जुड़े बकाया पैसे नहीं दिए गए।
कोर्ट ने कहा,
"हम न केवल हैरान हैं बल्कि पूरी तरह से स्तब्ध हैं कि ऐसा उस कर्मचारी के साथ हो सकता है जिसने 32 साल तक समर्पित सेवा दी हो। यह नहीं भूलना चाहिए कि याचिकाकर्ता ने एक चपरासी के तौर पर नौकरी शुरू की थी और उसी पद से 31.07.2016 को रिटायर हुआ। इस कोर्ट ने कई बार कहा कि पेंशन न तो कोई इनाम है और न ही दान, बल्कि यह पहले दी गई सेवाओं के लिए बाद में किया जाने वाला भुगतान है। दूसरे शब्दों में, इसका मतलब है कि हर महीने मिलने वाली सैलरी का एक हिस्सा रोक लिया जाता है और कर्मचारी के रिटायर होने के बाद उसका भुगतान किया जाता है। याचिकाकर्ता के साथ बहुत अन्याय हुआ है। हम इस मामले को यहीं खत्म करने को तैयार नहीं हैं। ऐसी दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति किसी और कर्मचारी के साथ नहीं होनी चाहिए।”
कोर्ट ने यह भी गौर किया कि याचिकाकर्ता ने 32 साल तक सेवा की थी, वे 71 साल के हैं और कई तरह की स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रहे हैं। कोर्ट ने इस बात पर दुख जताया कि विभाग ने “याचिकाकर्ता के मामले में बिल्कुल भी परवाह नहीं दिखाई और हमारे दखल के बाद ही उनके वाजिब बकाया और एरियर का भुगतान किया गया।”
इसलिए बेंच ने उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव को निर्देश दिया कि वे 31.12.2026 तक या उससे पहले एक रिपोर्ट सौंपें। इस रिपोर्ट में यह बताया जाए कि याचिकाकर्ता के रिटायरमेंट के तुरंत बाद पेंशन के कागज़ात क्यों मंज़ूर नहीं किए गए; देरी की वजह क्या है और अलग-अलग चरणों में कौन से अधिकारी/कर्मचारी इसके लिए ज़िम्मेदार हैं। ज़िम्मेदार लोगों के खिलाफ क्या कार्रवाई करने का प्रस्ताव है और याचिकाकर्ता के अधिकारों के गंभीर उल्लंघन के लिए राज्य उन्हें कैसे मुआवज़ा देने का प्रस्ताव रखता है, इस पर भी जवाब मांगा गया। साथ ही ज़रूरी आदेश या स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (SOP) जारी करने के निर्देश भी दिए गए हैं ताकि यह पक्का किया जा सके कि याचिकाकर्ता जैसे कर्मचारी, जो पेंशन पाने के हकदार हैं, उनकी पेंशन के कागज़ात में एक दिन की भी देरी न हो।
आदेश की एक कॉपी इलाहाबाद हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार को भेजने का निर्देश दिया गया ताकि इसे चीफ जस्टिस के सामने रखा जा सके। उनसे अनुरोध किया गया कि वे देखें कि क्या पेंशन न मिलने से जुड़े मामलों को जल्द निपटाने के लिए प्राथमिकता दी जा सकती है।
इस मामले की अगली सुनवाई 04.01.2027 को होगी।
Case Title : Jagdish Prasad Tripathi v State of UP through its Principal Secretary & Ors