सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में सभी राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों के मुख्य सचिवों को 'कारण बताओ नोटिस' जारी किया। यह नोटिस फेयर प्राइस शॉप्स (उचित मूल्य की दुकानों) के ज़रिए सैनिटरी नैपकिन बांटने से जुड़े मामले में जवाब या अनुपालन हलफनामा (compliance affidavit) दाखिल न करने पर जारी किया गया।

चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्य कांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच ने यह आदेश पारित किया। बेंच ने मुख्य सचिवों से कारण बताने को कहा कि हलफनामा दाखिल न करने के लिए राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों पर 25,000 रुपये का जुर्माना क्यों न लगाया जाए।

संक्षेप में मामला

यह मामला फेयर प्राइस शॉप्स के ज़रिए सैनिटरी नैपकिन बांटने से जुड़ा है। याचिकाकर्ता सोशल एक्टिविस्ट हैं। वह चाहते हैं कि 'प्रधानमंत्री भारतीय जनऔषधि परियोजना' के तहत बनाए और सप्लाई किए जाने वाले 'जनऔषधि सुविधा ऑक्सो-बायोडिग्रेडेबल सैनिटरी नैपकिन' को फेयर प्राइस शॉप नेटवर्क के ज़रिए 'राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम, 2013' के तहत आने वाले राशन कार्ड धारकों को उपलब्ध कराया जाए।

याचिका में बताया गया कि भारत सरकार ने 4 जून 2018 को 'जनऔषधि सुविधा ऑक्सो-बायोडिग्रेडेबल सैनिटरी नैपकिन' योजना शुरू की थी। इसके तहत पर्यावरण के अनुकूल सैनिटरी पैड देश भर के जनऔषधि केंद्रों पर 2.50 रुपये प्रति पैड की दर से उपलब्ध कराए गए। बाद में 27 जुलाई 2018 को सैनिटरी नैपकिन को GST से छूट दी गई और 27 अगस्त 2019 को इनकी कीमत घटाकर 1 रुपये प्रति पैड कर दी गई।

हालांकि, याचिकाकर्ता का कहना है कि योजना का मकसद पूरी तरह हासिल नहीं हो पाया, क्योंकि जनऔषधि केंद्र (19,294 आउटलेट) मुख्य रूप से शहरी और अर्ध-शहरी इलाकों में ही हैं। इस बात पर ज़ोर दिया गया कि इसके विपरीत, पब्लिक डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम (PDS) के तहत 4,78,773 फेयर प्राइस शॉप्स हर गांव और इलाके में मौजूद हैं। ये दुकानें उन लोगों तक पहुंचती हैं, जिन्हें NFHS-5 ने सबसे ज़्यादा वंचित आबादी के तौर पर पहचाना है।

याचिका में कहा गया,

"सरकार की अपनी योजना इन लोगों तक इसलिए नहीं पहुंच पाई कि सोच में कोई कमी थी, बल्कि इसलिए कि डिलीवरी सिस्टम उस इंफ्रास्ट्रक्चर तक नहीं फैला है, जो पहले से ही हर महीने उन तक पहुंचता है।"

याचिकाकर्ता संविधान के आर्टिकल 14, 15(3), 21, 21A और 47 के तहत अधिकारियों की संवैधानिक ज़िम्मेदारियों और नेशनल फ़ूड सिक्योरिटी एक्ट, 2013 के तहत कानूनी ज़िम्मेदारियों पर ज़ोर देती हैं। वह डॉ. जया ठाकुर बनाम भारत सरकार मामले के फ़ैसले का भी ज़िक्र करती हैं, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने मासिक धर्म से जुड़ी सेहत के अधिकार को आर्टिकल 21 का अहम हिस्सा माना था।

यह बताया गया कि जया ठाकुर मामले का फ़ैसला सिर्फ़ स्कूल सिस्टम तक ही सीमित था। NFHS-5 के आंकड़ों का हवाला देते हुए याचिकाकर्ता का कहना है कि सरकारी कोशिशों के कारण सैनिटरी नैपकिन का इस्तेमाल तो बढ़ा है, लेकिन अभी भी लगभग आधी किशोर लड़कियाँ कपड़े का इस्तेमाल करती हैं। ग्रामीण और शहरी इलाकों के बीच 17 प्रतिशत अंकों का अंतर बना हुआ।

याचिका में कहा गया,

"समस्या मांग की नहीं, बल्कि पहुँच की है।"

Case: SAROJ BALA v. GOVERNMENT OF INDIA & ORS., WP(C) No. 691/2026

अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

Tags: