'संवेदनशील मुद्दा': गोद लेने से पहले बच्चों के DNA वेरिफिकेशन और लापता बच्चों के बचाव के उपायों की मांग वाली PIL पर सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका (PIL) दायर की गई है, जिसमें लापता और तस्करी का शिकार हुए बच्चों के बचाव और पुनर्वास से जुड़े राहत उपायों की मांग की गई। अन्य बातों के अलावा, याचिकाकर्ता ने यह प्रार्थना की है कि अवैध गोद लेने और तस्करी को रोकने के लिए, गोद लिए जाने वाले बच्चों की पहचान के DNA वेरिफिकेशन को अनिवार्य किया जाए।
इस मामले को चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की खंडपीठ के समक्ष सूचीबद्ध किया गया। खंडपीठ ने याचिकाकर्ता दीपक कंसल से कहा कि वह PIL में उठाए गए मुद्दों और समस्याओं के समाधान सुझाएं।
CJI ने याचिकाकर्ता के वकील से कहा,
"यह एक बहुत ही संवेदनशील मुद्दा है और हम इस बात की सराहना करते हैं कि आपने इस नेक काम को अपने हाथ में लिया। हालांकि, अपने जूनियर वकीलों से कहें कि वह थोड़ा 'होमवर्क' (तैयारी) करके आएं। हमें एक रूपरेखा (Framework) दें... कि इसका समाधान क्या होना चाहिए... समस्या तो हम समझ ही गए हैं। समाधान के लिए सरकारी तंत्र या इधर-उधर देखने के बजाय, हम चाहते हैं कि आप ही हमें इसका समाधान सुझाएं। सोचिए कि अलग-अलग तरह की संस्थाएं आपस में कैसे सहयोग कर सकती हैं... उन्हें एक साझा मंच पर कैसे लाया जा सकता है..."
संक्षेप में मामला
इस PIL में लापता और बचाए गए बच्चों के लिए 'राष्ट्रीय DNA और बायोमेट्रिक पहचान प्रणाली' (National DNA and Biometric Identification System) की मांग की गई। इस प्रणाली में उचित कानूनी सुरक्षा उपाय शामिल होंगे, ताकि बच्चों की पहचान का वैज्ञानिक मिलान किया जा सके और उनकी पहचान को बहाल किया जा सके।
इसके अलावा, याचिका में यह निर्देश देने की भी मांग की गई कि बचाए गए सभी ऐसे बच्चे जिनकी पहचान नहीं हो पाई और लापता बच्चों के ऐसे जैविक माता-पिता/अभिभावक जो इसके लिए सहमत हों, उनका DNA सैंपल लेना अनिवार्य किया जाए। यह प्रक्रिया उचित सुरक्षा उपायों और सहमति प्रोटोकॉल के अधीन होगी। इसका सीमित उद्देश्य केवल बच्चों का उनके परिवारों से पुनर्मिलन कराना और उनकी पहचान की पुष्टि करना होगा।
इसके अतिरिक्त, याचिकाकर्ता ने यह भी प्रार्थना की कि बच्चों की सुरक्षा से जुड़े मौजूदा सभी डेटाबेस—जैसे कि पुलिस रिकॉर्ड, आश्रय गृह (shelter homes), बाल कल्याण समितियां और मानव तस्करी विरोधी इकाइयां—को एक केंद्रीकृत और 'रियल-टाइम' (तत्काल अद्यतन होने वाले) राष्ट्रीय ढांचे के तहत आपस में जोड़ा जाए और उनके बीच आपसी तालमेल (Interoperability) सुनिश्चित किया जाए।
याचिका में मांगी गई अन्य राहतें इस प्रकार हैं:
- एक 'राष्ट्रीय और राज्य-स्तरीय बाल संरक्षण एवं मानव तस्करी विरोधी कार्यबल' (Task Force) का गठन किया जाए। इसका उद्देश्य राज्यों के बीच अनिवार्य समन्वय सुनिश्चित करना तथा लापता और तस्करी का शिकार हुए बच्चों की जांच, बचाव और पुनर्वास की प्रक्रिया को समय-सीमा के भीतर पूरा करना होगा।
- बचाए गए बच्चों की पहचान (ट्रेसिंग), DNA जांच, परिवारों से पुनर्मिलन, पुनर्वास, मुआवजे और उनकी दीर्घकालिक निगरानी के लिए 'मानक संचालन प्रक्रिया' (SOP) तैयार की जाए; - यह निर्देश कि किसी भी गोद लेने की प्रक्रिया पूरी होने से पहले, गोद लिए जाने वाले बच्चे के DNA का राष्ट्रीय रिकॉर्ड से अनिवार्य रूप से सत्यापन किया जाए; यह सत्यापन एक विनियमित और निजता-अनुकूल (Privacy-Compliant) ढांचे के तहत किया जाए, ताकि बच्चों की पहचान की प्रामाणिकता सुनिश्चित हो सके और अवैध गोद लेने, तस्करी या गलत पहचान बताने जैसी घटनाओं को रोका जा सके।
- प्रतिवादियों को यह निर्देश कि वे सुप्रीम कोर्ट के समक्ष समय-समय पर अनुपालन हलफनामे (Compliance Affidavits) दाखिल करें, जिनमें लापता बच्चों की संख्या, एकत्र किए गए DNA सैंपल्स और मिले हुए मिलानों (Matches) का विस्तृत विवरण दिया गया हो।
Case Title: REEPAK KANSAL Versus UNION OF INDIA AND ORS., W.P.(C) No. 509/2026