बाल तस्करी आरोपी को जमानत देने के 'लापरवाह' आदेश पर सुप्रीम कोर्ट की इलाहाबाद हाईकोर्ट को फटकार, यूपी सरकार से पूछा—चुनौती क्यों नहीं दी?

Update: 2026-01-23 09:05 GMT

सुप्रीम कोर्ट ने आज (23 जनवरी) बाल तस्करी के एक आरोपी को इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा दी गई जमानत रद्द कर दी। न्यायालय ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि हाईकोर्ट ने आरोपों की गंभीरता और प्रकृति पर विचार किए बिना यांत्रिक ढंग से जमानत आदेश पारित किया, जो स्वीकार्य नहीं है। साथ ही, कोर्ट ने यह सवाल भी उठाया कि उत्तर प्रदेश सरकार ऐसे मामलों में जमानत रद्द कराने को लेकर गंभीर क्यों नहीं है।

जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस विनोद के. चंद्रन की खंडपीठ ने यह आदेश एक एनजीओ की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अपर्णा भट्ट की संक्षिप्त दलीलों के बाद पारित किया।

सुनवाई की शुरुआत में अपर्णा भट्ट ने बताया कि प्रतिवादी संख्या 2 तुलसी के खिलाफ अनैतिक देह व्यापार (निवारण) अधिनियम, 1956 के तहत गंभीर आरोप हैं। इसके बावजूद हाईकोर्ट ने केवल इस आधार पर जमानत दे दी कि आरोपी पांच वर्ष से जेल में है और सह-आरोपियों के साथ समानता (parity) का आधार मौजूद है। उन्होंने कहा कि हाईकोर्ट का आदेश पूरी तरह सतही और जल्दबाजी में पारित किया गया।

भट्ट ने आगे बताया कि वर्तमान आरोपी की संलिप्तता दो अन्य बाल तस्करी मामलों की जांच के दौरान सामने आई, जिनमें कम उम्र की बच्चियों को जबरन वेश्यावृत्ति में धकेला गया था। उन्होंने यह भी कहा कि पीड़िता ने विशेष रूप से आरोपी की पहचान की थी।

उन्होंने दलील दी कि आरोपी हर बार जमानत पर बाहर आकर दोबारा बच्चों की तस्करी और वेश्यावृत्ति के धंधे में लिप्त हो जाती है और वाराणसी के रेड लाइट इलाके में एक कुख्यात तस्कर के रूप में जानी जाती है। भट्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में विभिन्न अदालतों द्वारा जमानत दिए जाने से तस्करी विरोधी संगठनों के लिए स्थिति संभालना मुश्किल हो गया है।

जब भट्ट ने हाईकोर्ट के जमानत आदेश की ओर पीठ का ध्यान दिलाया, तो न्यायमूर्ति संजय कुमार ने टिप्पणी की कि यह एक “मैकेनिकल ऑर्डर” है, जो एक ही टेम्पलेट पर आधारित है। उन्होंने कहा कि दुर्भाग्यवश वे एक ही न्यायाधीश द्वारा पारित ऐसे कई जमानत आदेश देख चुके हैं, जिनमें जेलों की भीड़ और Satendra Kumar Antil के फैसले का हवाला देकर बिना मामले की प्रकृति देखे जमानत दी जाती है—चाहे मामला धारा 376 का हो या 302 का।

प्रतिवादी की ओर से यह दलील दी गई कि आरोपी लंबे समय से जेल में है और एनजीओ की छवि वैसी नहीं है जैसी बताई जा रही है। इस पर जस्टिस कुमार ने स्पष्ट किया कि पीड़िता द्वारा आरोपी की पहचान किया जाना एक अत्यंत महत्वपूर्ण तथ्य है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

अपने आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इलाहाबाद हाईकोर्ट के 19 मई 2025 के आदेश में आरोपों की गंभीरता पर बिल्कुल विचार नहीं किया गया। अदालत ने कहा कि भले ही हाईकोर्ट पर कार्यभार अधिक हो, फिर भी बाल तस्करी जैसे गंभीर अपराधों में न्यायिक विवेक और सोच-विचार अनिवार्य है।

कोर्ट ने यह भी नोट किया कि आरोपी वर्ष 2005 से अब तक पांच आपराधिक मामलों का सामना कर रही है, जिनमें से अधिकांश अनैतिक तस्करी से संबंधित हैं। पीठ ने कहा कि पीड़िता, जिसने PW-1 के रूप में गवाही दी, ने स्पष्ट रूप से आरोपी की भूमिका बताई है। ऐसे में जमानत आदेश को बनाए रखने का कोई आधार नहीं है।

अदालत ने जमानत आदेश को निरस्त करते हुए आरोपी को एक सप्ताह के भीतर आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया। साथ ही, कोर्ट ने यह कहते हुए आश्चर्य जताया कि राज्य सरकार अब आकर जमानत रद्द कराने की मांग कर रही है।

आदेश पारित करने के बाद जस्टिस कुमार ने मौखिक टिप्पणी करते हुए कहा,

“ऐसा प्रतीत होता है कि न्यायाधीश एक-दूसरे से इस बात की प्रतिस्पर्धा कर रहे हैं कि एक दिन में कितनी जमानत याचिकाएं निपटाई जा सकती हैं।”

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी उल्लेख किया कि कई पीठें पहले ही बाल तस्करी मामलों में हाईकोर्ट द्वारा दी जा रही जमानतों और राज्य सरकारों की निष्क्रियता पर चिंता जता चुकी हैं। हाल ही में एक पीठ ने लापता बच्चों की बरामदगी के लिए एक समान SOP बनाने की मंशा भी जताई थी।

इसके अलावा, इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा बाल तस्करी मामलों में जमानत दिए जाने के खिलाफ दाखिल अपीलों पर सुप्रीम कोर्ट की एक अन्य पीठ लगातार सुनवाई कर रही है और समय-समय पर जमानत रद्द करते हुए राज्य सरकार को सतर्क रहने की चेतावनी देती रही है।

वर्तमान मामले में भी सुप्रीम कोर्ट ने मुकदमों की त्वरित सुनवाई, छह महीने में ट्रायल पूरा करने और बाल तस्करी मामलों में लंबित ट्रायल से संबंधित डेटा हाईकोर्ट से तलब करने जैसे सामान्य निर्देश जारी किए हैं।

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