'पासपोर्ट जारी करने की प्रक्रिया भी निजी एजेंसियों को सौंपी गई है': SIR में आधार के उपयोग का विरोध करने वाली याचिका पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी

Update: 2026-01-28 11:43 GMT

सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision – SIR) में आधार को सत्यापन दस्तावेज़ के रूप में उपयोग किए जाने पर उठाई जा रही आपत्तियों पर सवाल उठाए। अदालत ने टिप्पणी की कि आज कई सार्वजनिक कार्य निजी एजेंसियों के माध्यम से किए जा रहे हैं, जिनमें पासपोर्ट जारी करने की प्रक्रिया भी शामिल है।

चीफ़ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की खंडपीठ उन याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी, जिनमें चल रहे SIR अभ्यास को चुनौती दी गई है। इनमें अश्विनी उपाध्याय द्वारा दायर याचिका भी शामिल है, जिसमें देशभर में सभी राज्यों में मतदाता सूचियों के पुनरीक्षण की मांग की गई है।

आधार के उपयोग पर आपत्ति

याचिकाकर्ता अश्विनी उपाध्याय की ओर से पेश सीनियर एडवोकेट विजय हंसारिया ने SIR प्रक्रिया में आधार को सत्यापन दस्तावेज़ के रूप में स्वीकार किए जाने का विरोध किया। उन्होंने दलील दी कि आधार निजी तौर पर संचालित आधार केंद्रों के माध्यम से जारी किया जाता है, इसलिए इसे भरोसेमंद दस्तावेज़ नहीं माना जा सकता।

हंसारिया ने कहा:

“आधार निजी तौर पर संचालित केंद्रों से जारी किया जाता है। इसे SIR के लिए प्रासंगिक दस्तावेज़ नहीं माना जा सकता।”

अदालत की प्रतिक्रिया

इस पर जस्टिस बागची ने कहा कि आज कई सार्वजनिक सेवाएं निजी एजेंसियों के जरिए दी जा रही हैं।

उन्होंने सवाल किया:

“क्या आपको पता है कि पासपोर्ट जारी करने की प्रक्रिया भी एक निजी कंपनी को आउटसोर्स की गई है?”

जब हंसारिया ने यह तर्क दिया कि आधार में पर्याप्त प्रमाणीकरण (authentication) नहीं होता, तो न्यायमूर्ति बागची ने कहा कि निजी संस्थाओं की भागीदारी मात्र से कोई दस्तावेज़ अविश्वसनीय नहीं हो जाता।

उन्होंने कहा:

“किसी भी दस्तावेज़ की जालसाजी हो सकती है। पासपोर्ट भी जाली बनाया जा सकता है। आधार जारी करते समय निजी व्यक्ति एक सार्वजनिक कर्तव्य का निर्वहन कर रहा होता है।”

नागरिकता बनाम पहचान

हंसारिया ने स्पष्ट किया कि उनकी आपत्ति जालसाजी की आशंका पर आधारित नहीं है। उन्होंने कहा कि आधार भले ही सही तरीके से जारी किया गया हो, लेकिन इस पर पर्याप्त नियंत्रण नहीं है और भारत में रहने वाला कोई भी व्यक्ति आधार प्राप्त कर सकता है।

उन्होंने दलील दी:

“आधार नंबर या उसका प्रमाणीकरण अपने आप में न तो नागरिकता का प्रमाण है और न ही अधिवास (डोमिसाइल) का।”

इस पर प्रतिक्रिया देते हुए जस्टिस बागची ने दोहराया कि अदालत ने लगातार आधार को एक वैध पहचान दस्तावेज़ माना है, लेकिन नागरिकता का प्रमाण नहीं।

उन्होंने कहा:

“आधार एक मान्य पहचान दस्तावेज़ है। हमने कभी यह नहीं कहा कि आधार नागरिकता का आधार हो सकता है। हमने हमेशा कहा है कि चुनाव आयोग आधार का सत्यापन कर सकता है।”

SIR दस्तावेज़ों की प्रकृति

पीठ ने यह भी कहा कि SIR के लिए निर्धारित दस्तावेज़ों की सूची का हर मामले में नागरिकता से सीधा संबंध होना आवश्यक नहीं है।

जस्टिस बागची ने टिप्पणी की:

“ये 11 दस्तावेज़ हमेशा नागरिकता से सीधे जुड़े हों, यह ज़रूरी नहीं है। ये विभिन्न प्रकार के हो सकते हैं, यह इस बात पर निर्भर करता है कि चुनाव आयोग अपने पूर्णाधिकार (plenary powers) का प्रयोग किस उद्देश्य से कर रहा है। आपकी दलील वास्तव में चुनाव आयोग के रुख के विपरीत जा रही है।”

इसके जवाब में हंसारिया ने कहा कि आधार का उपयोग अधिकतम मतदाता सूची में दोहराव रोकने के उद्देश्य से ही किया जा सकता है।

राजनीतिक उद्देश्य के आरोप

सीनियर एडवोकेट ने SIR अभ्यास को लेकर लगाए गए राजनीतिक उद्देश्य के आरोपों पर भी जवाब दिया। उन्होंने कहा कि मतदाता सूचियों से नाम हटाए जाने की प्रक्रिया सभी राजनीतिक दलों के मतदाताओं पर लागू हुई है।

उन्होंने कहा:

“हर राजनीतिक दल ने नाम हटाए जाने के बावजूद चुनाव जीते हैं। यह नहीं कहा जा सकता कि यह प्रक्रिया किसी एक दल को लाभ पहुंचाने के लिए की गई। चुनाव आयोग पर कोई मंशा आरोपित नहीं की जा सकती।”

आगे की सुनवाई

अदालत ने आज SIR का विरोध करने वाले अन्य याचिकाकर्ताओं की दलीलें भी सुनीं।

मामले की सुनवाई कल भी जारी रहेगी।

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