सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को गाजियाबाद पुलिस कमिश्नर को हलफनामा दाखिल कर यह स्पष्ट करने का निर्देश दिया कि पत्रकार अभिषेक उपाध्याय के सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'X' (पूर्व में Twitter) से किस तरह की जानकारी मांगी गई है और वह जानकारी किस FIR की जांच के लिए आवश्यक है।

यह मामला उपाध्याय के खिलाफ दर्ज एक रोड-रेज FIR से जुड़ा है। उन्होंने गाजियाबाद पुलिस की FIR को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है। इसी मामले में उन्होंने हाल ही में UP Police द्वारा 'X' को भेजे गए नोटिस को भी चुनौती दी थी, जिसमें उनके सोशल मीडिया अकाउंट से जुड़ी जानकारी मांगी गई थी।

मामले की सुनवाई CJI सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ कर रही थी।

'रोड-रेज केस में डिजिटल फुटप्रिंट की जरूरत क्यों?'

सुनवाई के दौरान जस्टिस बागची ने राज्य से सवाल किया कि—

“रोड-रेज मामले में आपको आरोपी के डिजिटल फुटप्रिंट की जरूरत क्यों है?”

पीठ ने मुख्य रूप से इस बात पर सवाल उठाया कि पुलिस ने सोशल मीडिया अकाउंट से कितनी व्यापक जानकारी मांगी है और उसका संबंधित FIR की जांच से क्या संबंध है।

कोर्ट ने अपने आदेश में गाजियाबाद पुलिस कमिश्नर को यह स्पष्ट करने को कहा कि 'X' से मांगी गई जानकारी संबंधित FIR या पत्रकार के खिलाफ पहले दर्ज किसी अन्य FIR की जांच के लिए किस उद्देश्य से आवश्यक है।

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि ऐसी कोई जानकारी सार्वजनिक नहीं की जानी चाहिए।

पत्रकार की ओर से डिजिटल अधिकारों की सुरक्षा का मुद्दा

याचिकाकर्ता की ओर से सीनियर एडवोकेट प्रदीप राय ने दलील दी कि UP Police का नोटिस बहुत व्यापक है। उनके अनुसार, 18 अगस्त की कथित रोड-रेज घटना से जुड़ी FIR के बावजूद पुलिस ने 1 जून से सोशल मीडिया अकाउंट से संबंधित जानकारी मांगी है।

न्होंने यह भी कहा कि अकाउंट में लॉग-इन करने के लिए इस्तेमाल किए गए मोबाइल डिवाइस की जानकारी तक मांगी गई है।

वरिष्ठ अधिवक्ता ने आशंका जताई कि इस तरह की जानकारी मांगने का इस्तेमाल पत्रकार के स्रोतों (journalistic sources) तक पहुंचने के लिए किया जा सकता है। उन्होंने सोशल मीडिया और डिजिटल जानकारी तक पुलिस की पहुंच को लेकर स्पष्ट दिशानिर्देश बनाने की मांग की।

CJI ने भी Privacy को लेकर चिंता जताई

CJI सूर्यकांत ने डिजिटल जानकारी जुटाने की सीमा और उससे जुड़े Privacy concerns पर सवाल उठाया।

उन्होंने कहा कि यदि जांच के दौरान पुलिस के हाथ कोई confidential information लगती है और उसे रिकॉर्ड पर लाया जाता है, तो इससे व्यक्ति की निजता प्रभावित हो सकती है।

पीठ ने इस बात पर जोर दिया कि डिजिटल फुटप्रिंट की जांच की सीमा और उसके लिए उचित guidelines क्या होनी चाहिए, इस पर विचार किया जाना जरूरी है।

UP सरकार ने कहा—FIR की जांच जरूरी है

UP के Additional Advocate General ने कहा कि याचिका मूल रूप से FIR रद्द करने की मांग कर रही है और शिकायतकर्ता की चोटों से संबंधित Medico-Legal Case (MLC) रिपोर्ट भी मौजूद है, जिसके आधार पर जांच की आवश्यकता है।

उन्होंने यह भी बताया कि पत्रकार के खिलाफ दो अन्य FIRs भी दर्ज हैं।

वहीं, पत्रकार की ओर से कहा गया कि वह जांच में सहयोग करने के लिए तैयार हैं। उनके वकील ने राज्य के Additional Advocate General के साथ इस मुद्दे पर चर्चा करने की भी इच्छा जताई।

पहले ही मिल चुकी है अंतरिम सुरक्षा

गौरतलब है कि पिछले महीने सुप्रीम कोर्ट ने अभिषेक उपाध्याय को coercive action से अंतरिम संरक्षण दिया था और पुलिस को FIR की कॉपी उपलब्ध कराने का निर्देश दिया था।

हाल ही में दाखिल एक अन्य हलफनामे में उपाध्याय ने आरोप लगाया था कि UP Police की एक टीम उनकी तलाश में पूर्व दिल्ली मेयर फरहाद सूरी के आवास में दाखिल हुई थी। उन्होंने दावा किया कि इस घटना को उनके खिलाफ पुलिस की अन्य कार्रवाइयों के साथ देखा जाए तो जांच शक्तियों के कथित चयनात्मक या अनुपातहीन इस्तेमाल की न्यायिक जांच जरूरी है।

अब सुप्रीम कोर्ट ने गाजियाबाद पुलिस कमिश्नर से X से मांगी गई जानकारी की प्रकृति और उसके जांच से संबंध को स्पष्ट करने वाला हलफनामा मांगा है।

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